सरिता विशेष

एमसीडी चुनाव में भाजपा की जीत पर इतना शोर समझ से परे है. मीडिया का ज्यादातर हिस्सा 'आप' पर पिल पड़ा है. भाजपा ने तीनों नगर निगम किसी से छीने नहीं हैं, यहां भाजपा पहले से आसीन थी. यह जीत उसने बरकरार रखी है. इसमें 'आप' की हार कहां हुयी? आप ने तो एमसीडी में पहली बार 48 सीटों के साथ जीत हासिल की है.

दिल्ली विधान सभा चुनाव में 'आप' की प्रचंड जीत (70 में से 67 सीटें) के बाद जब लोकसभा चुनाव हुए तब भाजपा ने दिल्ली की सातों सीटें जीत ली थी तब इतना हल्ला नहीं मचा कि केजरीवाल हार गए? दिल्ली में 'आप' की हार नहीं बताया गया. एमसीडी, विधानसभा और लोकसभा चुनाव हर जगह कमोवेश अलग-अलग मुद्दों पर लड़े जाते हैं. दिल्ली में भी तीनों चुनावों के मुद्दे अलग-अलग हैं. 

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असल में यह 'आप' की हार नहीं, जीत है. यह जंतर-मंतर के उस जन आंदोलन; जनाक्रोश की जीत है जिसने कांग्रेस और भाजपा को अपनी भ्रष्ट, गलत नीतियों को बदलने पर जबरन मजबूर कर दिया. वरना तत्कालीन सत्तारूढ़ कांग्रेस और भाजपा दोनों मिल कर उस जन आंदोलन का विरोध कर रही थी, कुचलने पर आमादा थी. केजरीवाल उसी आंदोलन के अगवाओं में एक थे. देश भर से उमड़े जनसैलाब के गुस्से का सन्देश भाजपा को उसी समय समझ में आ गया था और वह जनोन्मुखी ईमानदार नीतियों पर चलने पर विवश हुई.

मनमोहन सिंह के समय सब मंत्री बेलगाम दिखते थे, सत्ता के गलियारों में दलालों का बोलबाला था. आज केंद्र में मोदी के अलावा दूसरे मंत्रियों की आवाजें गुम हैं. इसलिए कि जनाक्रोश के डर से मंत्रियों सहित नौकशाहों पर लगाम कसी दिख रही है. यह उस जन आंदोलन का सुपरिणाम है. दिल्ली के मतदाता अच्छी तरह समझते हैं कि केंद्र शासित दिल्ली की केजरीवाल सरकार के हाथ में ज्यादा ताकत नहीं है. उसे हर फैसले के लिये केंद्र के बैठाये एलजी का मुंह ताकना पड़ता है. वह असहाय है. 

आज की तारीख में केंद्र में बैठी भाजपा ज्यादा पावरफुल है, दिल्ली के वोटर यह जानते हैं, इसलिये भाजपा को जीताना ज्यादा मुनासिब समझा गया. यह तो केजरीवाल की नीतियों की जीत है जिस के चलते भाजपा को अपने तमाम पुराने पार्षदों की जगह सभी नए चेहरों को मैदान में उतारना पड़ा. इनमें कई भ्रष्ट और निकम्मे थे. 

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