उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने इस बार न के बराबर प्रचार किया था, लेकिन जितना किया उस में अपनी जिंदगी से ताल्लुक रखती एक अहम बात यह बताई थी कि राजनीति के शुरुआती दिनों में जब वे गांवगांव घूमते मुचैराह गांव पहुंचे थे, तो वहां उन्होंने छोटी जाति वालों का दिया गुड़ खा लिया था. इस पर उन के गांव वालों ने उन का और उन के परिवार का बहिष्कार कर दिया था. बाद में ग्राम प्रधान की दखलअंदाजी के चलते मामला आयागया हो गया था.

यह दीगर बात है कि मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री रहते कभी इस अहम वाकिए का जिक्र नहीं किया, लेकिन तकरीबन 40 साल बाद गांवदेहातों और एक हद तक शहरों से भी इस तरह

की छुआछूत बंद हो गई है, यह न तो मुलायम सिंह यादव कह सकते हैं और न ही बसपा प्रमुख मायावती ही दावा कर सकती हैं, फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तो किसी तरह की उम्मीद करना ही बेकार है.

दरअसल, जातिगत छुआछूत व भेदभाव और जोरजुल्म धर्म की देन हैं. नेता तो इस के तवे पर अपनी रोटियां सेंकते हैं. साल 2016 में नेताओं में तो होड़ सी लग गई थी कि कौन दलितों के घर जा कर ज्यादा से ज्यादा खाना खाता है. इस में भी खास मुकाबला भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बीच था. दोनों ने ही दलितों के घर जा कर खाना खाया था और यह जताने की कोशिश की थी कि वे ही दलितों के सच्चे हमदर्द हैं.

दलितों के घर जा कर उन की औरतों के हाथ का बना खाना खा कर की जाने वाली सियासत इस लिहाज भी गौर करने के काबिल है कि ऊंची जाति वाले नेता ही दलितों के घर गए.

दूसरी बात यह कि आज भी गांवदेहातों में दलितों के साथ दूसरी ज्यादतियों के साथसाथ खानेपीने में भी भेदभाव किया जाता है, जिस से उन में उन के दलित यानी शूद्र और पिछले जन्म के पापी होने का डर भरा रहे.

मायावती, रामविलास पासवान या कोई और दलित नेता किसी दलित के घर जा कर खाना खाता, तो ज्यादा तो क्या तनिक भी हल्ला नहीं मचता.

दूसरे लफ्जों में कहें, तो हल्ला इसलिए मचता है कि ऊंची जाति वाले नेता दलितों के घर जा कर खाना खाते हैं यानी उन पर एहसान करते हैं. ठीक वैसे ही जैसे राम ने एक दलित औरत शबरी के दिए जूठे बेर खा कर उस पर एहसान किया था.

हो जाता है धर्म भ्रष्ट

दलित के घर गुड़ खाने पर मुलायम सिंह यादव के परिवार का बहिष्कार सैफई गांव में हुआ था, यह बात कतई हैरानी की नहीं है. ऐसा आज भी इफरात से होता है कि दलित के घर खाना तो दूर की बात है, ऊंची जाति वाले उन के सामने पड़ने से भी कतराते हैं, क्योंकि धार्मिक किताबों में लिखा है कि सुबहसुबह उन का चेहरा देखने से धर्म भ्रष्ट हो जाता है.

मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में एक महल्ला है, जिस का नाम साहू महल्ला है. अब से तकरीबन 20 साल पहले तक इस बड़े शहर के लोग सुबहसुबह इस महल्ले से हो कर नहीं गुजरते थे, क्योंकि सुबह साहू यानी तेलियों का चेहरा देखने से दिन अच्छा नहीं गुजरता, यह माना जाता है. साहू या तेली जाति पूरी तरह से अछूतों की जमात में नहीं आती है, बल्कि उस की गिनती पिछड़े तबके में होती है.

आज उसी जबलपुर समेत देशभर के लोग सुबहसुबह जब टैलीविजन देखते हैं, तो उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा देखने में परहेज नहीं होता, उलटे देशभर में लोग उन के पैर पड़ते हैं.

हालांकि लोगों के दिलोदिमाग में बैठी छुआछूत की हकीकत केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने उत्तर प्रदेश चुनाव प्रचार के दौरान ही यह कहते हुए बताई थी कि चूंकि वे छोटी जाति के हैं और प्रधानमंत्री बन गए हैं, तो कइयों को यह नागवार गुजरता है.

इधर देहातों में आलम यह है कि अगर कोई दलित सामने पड़ जाए, तो ऊंची जाति वाले नाकभौं सिकोड़ लेते हैं. हर गांव में बिजली और सड़क आ जाने के बाद भी दलित महल्ले अलग हैं, क्योंकि दलितों को ऊंची जाति वालों के बराबर रहने का हक आज भी नहीं है.

विदिशा के पास के एक गांव ढोलखेड़ी में अब एक ही ब्राह्मण परिवार बचा है, जिस के एक नौजवान का कहना है कि आज भी उस के पिता या चाचा को मजबूरी में अगर दलित महल्ले से हो कर गुजरना पड़ता है, तो वे घर आ कर नहाते हैं.

इस नौजवान के मुताबिक, जब ऊंची जाति वालों के यहां तेरहवीं होती है, तो छोटी जाति वालों को पूजापाठ की जगह से बहुत दूर बैठा कर खाना खिलाया जाता है, जिस से भगवान का और ऊंची जाति वालों का धर्म भ्रष्ट न हो.

दलितों को खाना तो अलग दूर बैठा कर खिलाया ही जाता है, पर इस पर भी शर्त यह है कि दलित अपने बरतन अलग से लाएं, जिस से उन के जूठे बरतन धोने का पाप ऊंची जाति वालों को न लगे.

गांवों में तेरहवीं में पूरे गांव को न्योता देना आम बात है, जिस में छुआछूत की नुमाइश खुलेआम होती है. अपने बराबरी वालों को तंबू में बैठाया जाता है, पर दलितों को दूर रखा जाता है.

दलित क्यों ऊंची जाति वालों के यहां तेरहवीं में खाना खाने जाते हैं, यह हालांकि अलग बहस की बात है, पर भोपाल के नजदीक बैरसिया के रहने वाले एक दलित मंशाराम की मानें, तो यह रिवाज पीढि़यों से चला आ रहा है. अगर वे उन के यहां न जाएं, तो उन पर और ज्यादा जुल्म ढाए जाते हैं.

बात अजीब है, पर है सच कि जिस के पीछे मंशा यह है कि दलितों को बेइज्जत करने और उन्हें उन के दलितपन का एहसास कराने का कोई मौका ऊंची जाति वाले नहीं छोड़ते.

तेरहवीं में तो बुलाते हैं, पर यही ऊंची जाति वाले शादीब्याह में दलितों को आमतौर पर नहीं बुलाते, क्योंकि यह शुभ और मांगलिक काम होता है.

दलित अगर महंगी शादी करें, तो भी आएदिन बवाल मचने की खबरें देशभर से आती रहती हैं. दलित दूल्हों के घोड़ी पर चढ़ने को ले कर हर कहीं उन्हें मारापीटा जाता है और डरायाधमकाया भी जाता है.

फर्क सियासत और धर्म में

धर्म के नाम पर दलितों पर जोरजुल्म करने की बीमारी कभी दूर होगी, ऐसा लग नहीं रहा. इस की वजह सियासत कम धर्म ही ज्यादा है.

नामी नेता दलितों के घर जा कर खाना खाते हैं, उन की मंशा भले ही सियासत की हो, पर कभी किसी शंकराचार्य या धर्मगुरु ने क्यों इस तरह की सुर्खियां बटोरने की कोशिश नहीं की?

इस सवाल का जवाब साफ है कि ऐसे लोग ही छुआछूत, भेदभाव और जातिगत अत्याचार बनाए रखना चाहते हैं. अगर वे भी नेताओं की तरह दिखावे के लिए ही सही दलितों के यहां खाना खाने लगेंगे, तो पंडों की दुकानें बंद हो जाएंगी, जो धर्म के नाम पर ही चलती हैं.

अमित शाह या राहुल गांधी के दलितों के घर खाना खाने पर मायावती तिलमिला कर कहती हैं कि खाना खाने के बाद वे घर जा कर नहाए थे, तो यह इलजाम सियासी हो सकता है, लेकिन हकीकत में मायावती एक सच भी कह रही होती हैं कि अभी भी सवर्ण किस हद तक दलितों से बैर रखते हैं.

यह वह दौर है, जब भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दलित होने के माने बदलने की कोशिश, जिसे साजिश कहना बेहतर होगा, रच रहे हैं कि पैसे वाले दलितों को ऊंची जाति का मान लिया जाए. इस से हिंदुओं की तादाद भी बढ़ेगी और पंडों को अच्छीखासी दक्षिणा भी मिलेगी.

इन की मंशा अगर वाकई समाज और देश से छुआछूत और जातिगत भेदभाव मिटाने की होती, तो ये पहले भीमराव अंबेडकर की तर्ज पर धार्मिक किताबें जलाने की बात करते, क्योंकि आदमी को आदमी न मानने का रोग आया तो इन्हीं किताबों से है.

दरअसल, भगवा ब्रिगेड को एक बड़ा डर यह सता रहा है कि अगर पढ़ेलिखे और पैसे वाले दलितों को वक्त रहते अपने पाले में नहीं लाया गया, तो ये लोग ऊंची जाति वालों को ही अछूत बना कर अपना एक अलग समाज बना लेंगे.

इस वजह से ऊंची जाति वाले अछूत और अल्पसंख्यक हो जाएंगे यानी इनसानियत या धर्म नहीं, बल्कि अलगथलग पड़ जाने का डर और दक्षिणा का लालच अब ऊंची जाति वालों को मजबूर कर रहा है कि वे अपना मन मारते हुए कुछ दलितों का हाथ थामें, लेकिन ऐसा सच में नहीं हो रहा है, बल्कि दिखावे के लिए ज्यादा हो रहा है, क्योंकि हजारों सालों से ऊंची जाति वाला होने का गरूर दूर होने में भी हजारों साल लग जाएंगे, इसलिए कुछ फीसदी पैसे वाले दलितों को घेरा जा रहा है, जिस से गरीब दलितों को लतियाया जा सके.