सरिता विशेष

लोग आशंकाओं और दुश्चिंताओं के बीच साल 2017 का स्वागत कर रहे हैं. उन के उत्साह पर एक ग्रहण है और यह अनिश्चितता भी, कि अब क्या होगा. नया साल अच्छे से बीते, आप स्वस्थ रहें, धन और वैभव आप के पास रहें, आप खुश रहें जैसी शुभकामनाएं अगर बेमन से दी और ली जा रही हैं तो यकीन मानें, सबकुछ ठीकठाक नहीं है, कोई बड़ी गड़बड़ जरूर है. यह गड़बड़, दरअसल, 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के साथ ही शुरू हो गई थी जब लोग यह भूल गए थे कि लोकतंत्र में केवल सत्तारूढ़ दल चुन लेने से ही वोट देने की सार्थकता सिद्ध नहीं हो जाती. इस में एक मजबूत विपक्ष की भी जरूरत होती है जो सत्तारूढ़ दल या गठबंधन पर नियंत्रण रखे. उस चुनाव में लोगों ने अब तक का सब से कमजोर विपक्ष चुन कर संसद में भेजा. उस के दुष्परिणाम अब सामने आने लगे हैं.

2001-2002 या उस के बाद के सालों की तो बात करना ही बेमानी है. शायद ही कोई 2015 की किसी उल्लेखनीय घटना को बता पाए जिस ने सीधे सामाजिक जीवन पर सकारात्मक असर छोड़ा हो. लेकिन 8 नवंबर, 2016 लोगों को जिंदगीभर याद रहेगी, ठीक वैसे ही जैसे 25 जून, 1975 याद है. नोटबंदी पर बहस जारी है. सत्तारूढ़ दल कह रहा है, धैर्य रखते इस के दूरगामी चीजों का इंतजार करो और उलट इस के, बिखरा विपक्ष चिल्ला रहा है कि यह घोटाला है, अदूरदर्शिता है, मनमानी है. इस से किसी को कोई फायदा नहीं होने वाला वगैरावगैरा. कौन सच्चा, कौन झूठा है, यह कोई तय नहीं कर पा रहा. नवंबर 2016 में नोट बदली के लिए लगी लाइनें इतिहास में दर्ज हो चुकी हैं. नोट बदलने में हुई परेशानियां इस दौर के लोग चाह कर भी भुला नहीं सकते. एक समृद्ध, संपन्न विकासशील देश की जनता पास में पैसे होते हुए भी जरूरी चीजों की मुहताज हो गई. देश का गरीब और किसान फिर कुदरत के भरोसे हो गया. आम मध्यवर्गीयों से भी खुश होने के मौके छिन गए. 2016 की यही कुछ इकलौती उपलब्धियां रहीं. 30 दिसंबर का इंतजार करते लोगों को बगैर किसी जानकार या विशेषज्ञ के समझाए समझ आ गया है कि पैसा वाकई किसी का सगा नहीं होता. कड़कड़ाती ठंड में देररात जेब में एटीएम कार्ड लिए यहां से वहां भटकते लोगों की बेचारगी और मुंह चिढ़ाती एटीएम मशीनें, कैसे जनजीवन अस्तव्यस्त कर गईं और क्यों लोगों ने इस से समझौता कर लिया, इन सवालों के जवाब अब कभी कहीं मिलेंगे, ऐसा लग नहीं रहा. नोटबंदी ने कैसेकैसे लोगों की खुशियां और उल्लास छीने, यह अब किसी से छिपा नहीं रह गया है. लेकिन इस का जिम्मेदार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कुछ लोग ठहराने से कतरा रहे हैं तो इस की वजह समझनी जरूरी है. कहीं यह डर तो नहीं और अगर यह डर ही है, तो बात देश और समाज के लिहाज से चिंता की है. कुछ लोग मोदी की भक्ति करें, यह बात उतनी नुकसानदेह नहीं है जितनी यह, कि लोग मारे डर के अवसाद में जीने लगें.

कौन है जिम्मेदार

सवा 2 साल में देश में कुछ खास बदलाव नहीं आए हैं. कोई नेता अपने भारीभरकरम, लुभावने चुनावी वादों पर खरा न उतरे, इस की आदत लोगों को पड़़ चुकी है और इसीलिए वे शायद सत्तारूढ़ दल से इस बाबत ज्यादा उम्मीदें भी नहीं रखते. नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद पर बैठाने के लिए वोट देते वक्त लोगों के मन में खुशी और उत्साह के साथसाथ कुछ आशंकाएं भी थीं. अब खुश होने की तो कोई वजह नहीं, लेकिन आशंकाएं नएनए तरीकों से सिर उठा रही हैं. संसद के शीतकालीन सत्र का ठप पड़ जाना इन आशंकाओं को और बढ़ा गया. इस से यह भी साबित हुआ कि सत्तारूढ़ दल की ताकत उतना नुकसान नहीं पहुंचाती जितनी कि विपक्ष की कमजोरी पहुंचाती है. यह विपक्ष भी उन आम लोगों का चुना हुआ है जो अपनी रोजमर्राई परेशानियों को ले कर हायहाय कर रहे हैं. चौराहों और सोशल मीडिया पर बहस का सब से पसंदीदा विषय आज भी राजनीति ही होता है हालांकि सौ में से 8 लोगों को भी नहीं मालूम कि लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के नेता क्रमश: मल्लिकार्जुन खड़गे और गुलाम नबी आजाद हैं.

इस से पहले, कांग्रेस जब भी विपक्ष में बैठी तब बड़ी दमदारी से सत्तारूढ़ दल के कान उमेठती थी और यही लोकतंत्र की खूबी भी है कि विपक्ष, सत्तारूढ़ दल को मनमानी न करने दे. भाजपा में यह खूबी थी कि वह विपक्ष में रहते हमेशा गलत फैसलों पर कांग्रेस को घेरने में कामयाब रहती थी और झुकने को मजबूर भी कर देती थी. अब कांग्रेस ऐसा न कर पा रही तो इस का जिम्मेदार कौन है राहुल गांधी, सोनिया गांधी या वह जनता जो अब अपनी ही चुनी हुई सरकार के फैसलों के सामने नतमस्तक होने लगी है. यानी दिक्कत की एक बात यह भी है कि आज भी कांग्रेस का मतलब गांधी परिवार होता है. कोई स्वतंत्र विचारधारा वाला दल नहीं. नरेंद्र मोदी ने इस परिवारभक्ति या दबदबे पर प्रहार कर ही सत्ता हासिल की थी और अब कह रहे हैं, ‘‘मैं तो फकीर हूं, प्रधानमंत्री नहीं, प्रधान सेवक हूं, जनता के कष्ट हरूंगा, पापियों का नाश करूंगा, गरीबों को उन का हक दिला कर रहूंगा, पर दिक्कत यह है कि मुझे संसद में बोलने नहीं दिया जाता, इसलिए मैं जनसभाओं में बोलता हूं.’’ क्या यह मजाक नहीं कि पूर्ण बहुमत से चुनी गई सरकार का मुखिया ऐसा कहे? दरअसल, नोटबंदी के मसले पर बोलने को कुछ बचा नहीं है सिवा अफरातफरी और आर्थिक अनिश्चितता के, जिस के चलते लोग देश की मूल समस्याएं तो भूल ही गए हैं, साथ ही, अपनी व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक व आर्थिक समस्याओं के चक्रव्यहू में ऐसे फंस गए हैं कि उन की सोचनेसमझने की ताकत खत्म सी होती जा रही है.

सामाजिक अवसाद के माने

सामाजिक अवसाद के माने बहुत साफ हैं कि जिस में एक पूरा वर्ग या समूह खुद को असहाय और असुरक्षित समझने लगे. आतंकवाद, कालाधन, भ्रष्टाचार या नकली नोट कभी सामाजिक अवसाद की वजह नहीं बने क्योंकि ये आम लोगों की रोजमर्राई जिंदगी पर कोई सीधा प्रभाव नहीं डाल रहे थे. सरकारी एजेंसियां इन से लड़ती हैं. पुलिस भ्रष्ट ही सही लेकिन अपराधियों को पकड़ती तो है, सेना सरहद पर दुश्मनों के मंसूबों को कामयाब नहीं होने देती. यह बात लोगों की बेफिक्री देने वाली होती है. लेकिन नोटबंदी ने जो हलचल मचाई उस का कोई तोड़ किसी के पास नहीं है. लाइन में लगे करोड़ों लोगों ने अपनी व्यथा बताई पर वे मन की बात व्यक्त नहीं कर पाए, सरकार और नरेंद्र मोदी को कोस कर खुश हो लिए.

लोकतंत्र में सरकार का एक अहम काम जनता को सुरक्षा की गारंटी देना भी है, जिस में मौजूदा सरकार लगातार असफल साबित हो रही है. अब हालत यह है कि लोग नकदी को ले कर सहमे हुए हैं कि कल को घर में कोई बीमार पड़ गया तो इलाज और दवाइयों के लिए कहां भटकते रहेंगे. एक अंदाजे के मुताबिक, नोटबंदी के बाद 2 लाख शादियां टल गईं. यानी लोगों से खुशी का एक मौका छिन गया. कैसे लोग सामाजिक अवसाद की गिरफ्त में आ रहे हैं, इसे 8 नवंबर के बाद से होने वाले घटनाक्रमों से आसानी से समझा जा सकता है. पहले लोग सुबह उठते थे और अपने कामकाज में लग जाते थे, किसान खेत में चले जाते थे, नौकरीपेशा दफ्तरों में और व्यापारी अपनी दुकानों, संस्थानों में नजर आते थे. इन लोगों के चेहरों से कोई तनाव या चिंता जाहिर नहीं होते थे. बड़ी दिक्कत यह नहीं है कि कारोबार ठप पड़ गया है या बुआई नहीं हो रही है या फिर कामकाज रुक गए हैं. बड़ी दिक्कत यह है कि ये धीरेधीरे रुक रहे हैं और सरकार के आश्वासन व वादे एक के बाद एक खोखले साबित हो रहे हैं.

पहले लोगों से कहा कि गया कि 2-4 दिनों की बात है, फिर जिल्लतभरे इन दिनों की मियाद 50 दिन कर दी गई. इतना ही नहीं, बारबार पैसे निकालने के नियम बदले गए. अब धीरेधीरे बात नकदीरहित लेनदेन पर आ पहुंची है. जबकि 20 फीसदी से भी ज्यादा लोग भी उस तकनीक से नहीं जुड़े हैं जिस का सरकार ढिंढोरा पीट रही है. अर्थव्यवस्था, सूचकांक, वैश्वीकरण और जीडीपी जैसे भारीभरकम शब्दों से परे सच यह है कि मुद्रा का प्रवाह ही नहीं, बल्कि उत्पादन बंद हो गया है. और यह सब इतने धीमे हो रहा है कि लोग खुद को रोज नई दुश्ंिचता में फंसा महसूस कर रहे हैं. आतंकवाद ज्यों का त्यों है. और तकनीक आई जरूर है लेकिन आम लोगों से पहले उसे आर्थिक अपराधियों ने अपना लिया. इसलिए 2 हजार रुपए के नकली नोट 15 नवंबर को ही बाजार में आ गए थे. रोज कहीं न कहीं नया काल धन पकड़ा जा रहा है. जिन बैंक वालों को कभी नरेंद्र मोदी ने सैल्यूट ठोंका था वे आज थोक में आर्थिक अपराधियों से सांठगांठ कर रहे हैं. मजदूरों को काम नहीं मिल रहा. बड़े शहरों में दूर से भले ही सबकुछ ठीक ठाक और चमकदमक भरा दिख रहा हो पर हालत यह है कि वहां के रोज कमानेखाने वाले लोग अपने राज्यों की तरफ पलायन करने लगे हैं. इस से असुविधा बड़े शहर वालों को तो हो ही रही है, साथ ही, जो लोग वापस गांवों की तरफ पलायन कर रहे हैं उन के लिए पेट भरने लायक रोजगार की कोई व्यवस्था ही नहीं है.

फिर किस गरीब, मजदूर, किसान के कल्याण की बात की जा रही है और किस मुंह से की जा रही है, बात समझ से परे है. 2016 इसलिए याद किया जाएगा कि इस में कोई भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ था, धार्मिक आडंबर बंद नहीं हुए थे, कालाधन खत्म नहीं हो गया था, जाली नोटों की पैदावार बंद नहीं हो गई थी, बल्कि याद इसलिए किया जाएगा कि इस सब की आड़ में लोगों का जीना दुश्वार हो गया था और लोग एक आशंका में रह रहे थे. आशंका यानी एक सामूहिक अंर्तद्वंद्व, अनिर्णय की स्थिति और आर्थिक असुरक्षा जिस से नजात दिलाने में सरकार इसलिए असफल रही कि ये हालात एक के बाद उसी ने पैदा किए थे. पुरानी समस्याएं छुआछूत, पाखंड, भेदभाव और घूसखोरी कुछ समय के लिए दब गई थीं जो अब फिर सिर उठा रही हैं. यानी समस्याओं की संख्या बढ़ गई है जबकि वादा और इरादा उन्हें खत्म करने का जताया गया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद अनिर्णय की मानसिकता के शिकार हैं, इसलिए पुराने निर्णयों की असफलता ढकने के लिए नएनए फैसले करते जा रहे हैं. दिक्कत तो यह है कि इन में से एक भी सटीक या कारगर साबित नहीं हुआ है. कैशलैस की असफलता के बाद वे क्या फरमान जारी करेंगे, तय कर पाना मुश्किल है. सोने और जमीन, जायदाद का उन का दांव भी एक बेसुरा आलाप ही साबित हुआ है.

यत्र तत्र सर्वत्र

सामाजिक अवसाद का यह माहौल हैरतअंगेज तरीके से देशभर में किस तरह फैला और पसरा है, इस का जायजा चुनिंदा राज्यों के हालात देख लगता है कि नए साल की शुभकामनाएं रस्मअदायगी में सिमट कर रह गई हैं. देश के सब से बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव सिर पर हैं. 2017 की शुरुआत चुनावों से होना कोई उत्साह या उत्सुकता लोगों के मन में नहीं भर पा रही. पहली बार यहां का चुनाव नीरस और उबाऊ प्रचार के साथ नजर आ रहा है. ऐसा लगता है कि लोग सियासी दीवार पर टंगा कलैंडर देख सोच रहे हैं कि क्या करें, बदलें या रहने दें. सीधेसीधे कहा जाए तो लोग तमाम दलों और नेताओं से नाउम्मीद हो चुके हैं. लोकतंत्र की सब से बड़ी ताकत चुनाव को ले कर लोगों में निराशा का भाव साफ दिख रहा है. आम लोग राजनीति और राजनेताओं से विरक्त हो रहे हैं तो जाहिर है यह स्थिति चिंताजनक है. दरअसल, इस की एक बड़ी वजह राजनीतिक पार्टियों से सामाजिक विचारधारा का खत्म होना है. भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस इस की अपवाद नहीं रह गई हैं. मुख्यमंत्री कौन होगा, कौन सा दल सत्ता में आएगा जैसी बातें अपना महत्त्व खोती नजर आ रही हैं. किसी भी संभावित गठबंधन से लोग घबराए हुए हैं और किसी एक को सत्ता न सौंपने की तरफ बढ़ रहे हैं तो इसे निराशा यानी अवसाद ही कहा जाएगा. कभी जिस कांग्रेस पर व्यक्तिवाद का आरोप लगता था, अब हर पार्टी उस की गिरफ्त में है.

सत्ता की लड़ाई और लोलपुता ने सामाजिक सरोकार हाशिए पर डाल दिए हैं. यह लोगों की उत्साहीनता की एक बड़ी वजह है. लोगों को यह समझ आ रहा है कि चुनावों से उन का कोई भला नहीं होने वाला, फिर क्या खा कर वे 2016 के अवसाद से उबर कर 2017 का स्वागत करें. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कई कल्याणकारी योजनाएं चलाईं लेकिन परिवार की कलह उन के किएधरे पर पानी फेर रही है. बसपा प्रमुख मायावती के तेवर हालांकि आक्रामक हैं पर उन का मकसद साफ नहीं, कांग्रेस दौड़ से बाहर है और भाजपा दौड़ में बने रहने के लिए कुछ भी करने तैयार है.

इन हालात का फर्क लोगों पर पड़ना स्वाभाविक है. अस्पष्ट राजनीतिक परिदृश्य एक बड़ी दुविधा है. नोटबंदी के मारे लोगों को कोई सहारा राजनीति में अब नहीं दिख रहा. चुनावी हल्ला कानों में चुभने लगा है. चुनाव से कतराते लोगों के दिलों में 2017 को ले कर आशंका अस्वाभाविक नहीं है. बात ‘कोई नृप होए हमें का हानि’ में सिमटती जा रही है, तो साफ दिख रहा है कि निराशा हर स्तर पर है जिसे उत्साह और उमंग में बदलने के लिए खुद लोगों को पहल करनी पड़ेगी वरना चुनावी नतीजों के मुताबिक, जो भी सरकार सत्ता पर काबिज होगी वह कलैंडर का पन्ना बदलने वाली जैसी बात होगी कि लो, अब 2017 में हम आ गए. बिहार में कमोबेश सबकुछ ठीकठाक चल रहा था लेकिन नोटबंदी ने आम लोगों का ध्यान अपनी दूसरी परेशानियों की तरफ भी खींचा. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का शराबबंदी का फैसला बिलाशक एक अच्छी पहल थी. बावजूद इस के, लोगों का ध्यान राजनीति से हमें क्या मिला, वाली बात पर गया तो नतीजा यही निकला कि जदयू, राजद और कांग्रेस के महागठबंधन वाली सरकार भी ठोस कुछ नहीं कर पाई है. राजनीति आज भी गुमराह करने और लोगों को असल मुद्दों से भटकाने का नकारात्मक काम बदस्तूर कर रही है. ऐसा क्यों, इस सवाल के जवाब में मगध विश्वविद्यालय के प्रोफैसर अरुण कुमार प्रसाद कहते हैं, ‘‘पिछले कुछ सालों में जनता में विरोध करने की क्षमता में काफी कमी आई है. हर कोई परेशानी झेलने की आदत का शिकार हो चला है. हालत यह है कि सड़कों पर पानी जमा हो तो लोग अपनी पतलून उठा कर किनारे से बचतेबचाते निकल जाएंगे पर कोई नगरनिगम में जा कर शिकायत दर्ज नहीं कराएगा.’’ बहुत छोटी पर अहम परेशानियों पर फोकस करते वे बताते हैं, ‘‘अस्पतालों से डाक्टर गायब हैं, स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, सड़कों पर गड्ढे हैं और स्ट्रीटलाइट खराब हैं, इन सब की चिंता किसी को नहीं है.’’

बहुत से छोटेछोटे तनाव मिल कर कैसे एक बड़े फैसले से अवसाद में तबदील हो जाते हैं, यह अरुण कुमार की बात से समझ आता है. लेकिन इस असमंजस का हल किसी के पास नहीं, कि पहल कौन करेगा. वे जो परेशान हैं या वे जिन्होंने परेशानियों को दूर करने की संवैधानिक जिम्मेदारी ली हुई है. विधानसभाओं और संसद में यही होता है. आमलोगों के हित की बात कोई नहीं करता. सवाल करने वाला गायब तो जवाब देने वाला भी नदारद है. इस पर भी एकदूसरे पर आरोप मढ़ना बहुत बड़ी चालाकी है. लोग यह समझने लगे हैं पर खुद को असहाय महसूस करते हैं. तो कोई वजह नहीं कि यथास्थितिवाद से छुटकारा पाने के लिए कोई बड़ा बदलाव होगा. पटना की समाजविज्ञानी किरण कुमारी की मानें तो जनता की महती परेशानियों को दूर करने की चिंता किसी दल को नहीं है. रोटी,  पड़ा, मकान और शिक्षा जैसे अहम मसले कभी शराबबंदी तो कभी नोटबंदी जैसे फैसलों की भेंट चढ़ जाते हैं. इन सब के बीच भौचक्क जनता नेताओं का मुंह ताकती रह जाती है और हर चुनाव में किसी न किसी दल को आजमाती है. जीतने के बाद सभी एक ही थैली के चट्टेबट्टे साबित होते हैं.

जाहिर है लोग राजनीति और नेताओं से बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं रखते पर यह भी नहीं चाहते कि परेशानियां पैदा करने के लिए फैसले उन पर थोपे जाएं जिन से रोजमर्राई जिंदगी में खलल पड़ता हो. पश्चिम बंगाल देश का पहला राज्य था जहां नोटबंदी के फैसले का बडे़ पैमाने पर सार्वजनिक विरोध हुआ, जिस की अगुआई खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने की, अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी उन के निर्देश थे कि वे हैरानपरेशान आम लोगों के बीच जा कर इस के दुष्परिणाम बताते विरोध करें. दरअसल, यह मनोवैज्ञानिक राजनीति का उदाहरण था जिस से लोग खुद को असहाय नहीं समझते, उन्हें लगता है कि उन की बात और आवाज उठाने वाला कोई है. तमिलनाडू की दिवंगत मुख्यमंत्री जयललिता की तरह ममता हर मुश्किल घड़ी में जनता के साथ होती हैं यानी लोगों को पौलिटिकल गार्जियनशिप देने में भरोसा करती हैं. इस का फायदा भी उन्हें मिलता है.

नरेंद्र मोदी को उन्होंने दिल्ली और पटना में भी घेरा और उन पर घोटाले व मनमानी करने के आरोप भी लगाए तो उन में मोदी का विकल्प भी देखा जाने लगा. हालांकि यह अभी बहुत दूर की कौड़ी है लेकिन हैरानी नहीं होनी चाहिए अगर धीरेधीरे विपक्ष अपनी हठ छोड़ कर उन के साथ नजर आने लगे. जिस मनोवैज्ञानिक शैली में नरेंद्र मोदी जनता से संवाद स्थापित करते हैं, ठीक वही शैली ममता की भी है. और यही इकलौती बात है जो नेता में जनता का भरोसा बढ़ाती है. बंगाल को ले कर भाजपा की दुविधा और परेशानी हर पल दिखती है लेकिन जिस तरह विपक्ष देशभर में मोदी की लोकप्रियता पर संयुक्त प्रहार नहीं कर पा रहा उसी तरह भाजपा भी ममता का कोई तोड़ नहीं ढूंढ़ पा रही. मध्य प्रदेश में पूरी तरह भाजपा का कब्जा है. खुश यहां के लोग भी नहीं हैं. 2016 के उज्जैन सिंहस्थ कुंभ में सामाजिक समरसता के नाम पर भाजपा ने दलितों को स्नान कराया था तो इस से जातिवाद बजाय कम होने के और बढ़ा ही था. नतीजतन, राज्य में दलित अत्याचार की घटनाओं की बाढ़ सी आ गई थी. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान धर्म के जरिए सत्ता चला रहे हैं या सत्ता के जरिए धर्म थोप रहे हैं, बात एक ही है.

आमतौर पर शांत माने जाने मध्य प्रदेश में जब दीवाली के दूसरे दिन भोपाल के सैंट्रल जेल की दीवार को फांद कर सिमी के 8 कैदी बड़े इत्मीनान और सहूलियत से भाग गए थे तो लोगों का दहशत में आना स्वभाविक बात थी. सवाल सरकार का सुरक्षा की गारंटी पर खरा न उतरने का था. हालांकि एक प्रायोजित एनकाउंटर में ये कैदी मारे गए थे पर खौफ लोगों के दिलोदिमाग में छा गया है.

घातक विकल्पहीनता

अवसाद और हताशा का अंत कहां जा कर होगा, यह अंदाजा किसी को नहीं. लेकिन बात राजनीति की करें तो नरेंद्र मोदी का कोई सशक्त विकल्प पैदा न हो पाना भी लोगों की परेशानी व तनाव की वजह है. सवाल दोनों अहम हैं कि मोदी मजबूत क्यों हैं और विपक्ष कमजोर क्यों है और क्यों कोई राष्ट्रीय स्तर का नेता नहीं गढ़ा जा पा रहा. नरेंद्र मोदी की खूबियां किसी सुबूत की मुहताज नहीं कि वे लोगों को बहलानेफुसलाने की कला में माहिर हैं. वे पुरानी परेशानियां तो हल नहीं कर पाते उलटे, नईनई परेशानियां खड़ी करते हैं और फिर उन से बचने के तरीके बदलते रहते हैं. नोटबंदी के पहले सबकुछ कमोबेश ठीकठाक था, तब बात सांप्रदायिकता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कश्मीर जैसे मुद्दों के इर्दगिर्द सिमटी थी. लेकिन जब मुखिया ही अपराधबोध ग्रस्त हो कर अव्यावहारिक फैसले लेने लगे तो निचले स्तर तक परेशानियां खड़ी होनी तय है. भाजपा अब देश का सब से बड़ा राजनीतिक दल है, उस के कार्यकर्ता कुछ और करें न करें, पूजापाठ और यज्ञहवन जरूर करते रहते हैं. आरएसएस भी इन कामों में उस के साथ रहता है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपनी मां सोनिया गांधी की जिद, डर और मोह के चलते खुद को वजनदार नेता के रूप में स्थापित नहीं कर पा रहे हैं. अस्वस्थ चल रहीं सोनिया घोषित तौर पर उन्हें कांग्रेस का नेतृत्व नहीं दे पा रही हैं. राहुल गांधी बोलते हैं और नरेंद्र मोदी से जूझने की क्षमता भी उन में है पर उन का दायरा बेहद छोटा हो चला है. कम हैरानी की बात नहीं कि गांधीनेहरू परिवार के इस युवा की सारी ऊर्जा खुद का अस्तित्व बचाए रखने में जाया हो रही है.

कांग्रेस के पराभाव से क्षेत्रीय दल थोक में उभरे. उन के कुछ नेता लोकप्रिय भी हैं. लेकिन एक राज्य विशेष में सिमटे रहने के चलते न तो वे राष्ट्रीय छवि बना पाते हैं और न ही लोग उन्हें राष्ट्रीय नेता के रूप में स्वीकार करते हैं. नोटबंदी के बाद पसरते सामाजिक अवसाद को 2 नेताओं दिल्ली और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों क्रमश: अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी ने समझा और दिल्ली दहलाने की कोशिश की थी. अरविंद केजरीवाल को भाजपा ने उपराज्यपाल नजीब जंग के जरिए ऐसा जकड़ दिया है कि उन का विरोध लोगों को पूर्वाग्रही लगने लगा है. आम आदमी पार्टी के भीतर की फूट और भ्रष्टाचार भी अब दूसरे दलों की तरह हो चले हैं, इस से लोगों ने अरविंद केजरीवाल से उम्मीद छोड़ दी है. ममता बनर्जी जरूर गरजीं, बरसीं और नरेंद्र मोदी का कोई लिहाज उन्होंने नहीं किया तो उन्हें भी तरहतरह से परेशान किया गया. इस के बाद भी लोग उन में मोदी का विकल्प देखने लगे हैं तो यह ममता की खूबी है. ममता की राह में रोड़े राज्यों के छोटे दल ही हैं. बिहार जा कर उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को नोटबंदी के मामले में साथ न देने पर गद्दार कहा तो नीतीश को अपना रवैया थोड़ा सुधारना पड़ा. बावजूद इस के, ममता को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित होने और खुद को विकल्प जताने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी, जिस में वे कितना सफल होंगी, अभी इस पर कहना मुश्किल है.

उत्तर प्रदेश में चुनावी माहौल है और कोई दल स्पष्ट बहुमत ले जाने की स्थिति में नहीं दिख रहा. बसपा का दलित वोटबैंक दरक चुका है. इस के बाद भी वह दौड़ में है. सपा की हालत और यादव परिवार की कलह उजागर है जिस से उस का नुकसान होना तय है. इसलिए वह कांगे्रस की तरफ झुक रही है.

जयललिता की मौत के बाद तमिलनाडू में भी हालत असमंजस के हैं. एआईएडीएमके बगैर किसी सशक्त और सर्वमान्य नेतृत्व के अभाव में कब मिट जाए, कहा नहीं जा सकता. भाजपा ने वहां खुद को मजबूत करने की कवायद शुरू कर दी है. तमिलनाडू के लोग तो 2-2 अवसाद में जी रहे हैं, पहला नोटबंदी का और दूसरा जयललिता के साथ ही ब्राह्मण विरोधी द्रविड़ आंदोलन के खत्म हो जाने का, जिस से सवर्ण सामंती ताकतों के सिर उठाने का खतरा फिर से वहां मंडराने लगा है. सार में यह कि किसी भी क्षेत्रीय दल के मुखिया के राष्ट्रीय नेता बनने के आसार नजर नहीं आ रहे और कोई प्रभावी राष्ट्रीय नेता मौजूद नहीं है जो नरेंद्र मोदी को कठिन चुनौती दे पाए. ऐसे में विपक्ष अगर अपनी जिम्मेदारियों और उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहा तो गलती राजनीतिक दलों के साथसाथ आम लोगों की भी है जिन्होंने मोदी के सम्मोहन के चलते सशक्त विपक्ष न देने की चूक कर दी और अब उस का खमियाजा भी भुगत रहे हैं. नरेंद्र मोदी लगातार अनियंत्रित और निरंकुश होते जा रहे हैं, हालांकि उन की दबंगई के सामने उन की पार्टी के कद्दावर नेता भी कुछ नहीं बोल पा रहे. लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे बुजुर्ग और अनुभवी नेताओं को उन्होंने वक्त रहते ही किनारे कर दिया था.

कम नहीं दूसरी मुश्किलें

ऐसा भी नहीं कि सिर्फ नोटबंदी ही देशभर में पसरते सामाजिक अवसाद की वजह हो, बल्कि महंगे धार्मिक समारोहों से भी 2016 लबरेज रहा. सिंहस्थ कुंभ इस का बेहतर उदाहरण था जिस की एक खास बात दलितों को समारोहपूर्वक स्नान कराना थी. यह काम भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संयुक्त रूप से किया था. बाबा लोग हर शहर में पंडाल बिछाए दिखे और अपनी दुकान चलाते रहे. अवसाद का अंगरेजी में मतलब डिप्रैशन है. दलितों के लिए इस शब्द का इस्तेमाल अंगरेज शासक डिप्रैस्ड कह कर करते थे यानी दबीकुचलीशोषित जातियां या वर्ग. कुंभ नहा लेने से इस वर्ग का अवसाद बजाय कम होने के और बढ़ा. उन पर अत्याचार की घटनाएं पहले से कहीं ज्यादा हो गईं. देश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के आ जाने से बदला कुछ नहीं. भ्रष्टाचार ज्यों का त्यों है. छुआछूत, जातिगत भेदभाव बराबर हैं और नकली नोट भी छप रहे हैं. घपलेघोटाले भी हो रहे हैं, हिंदूमुसलिम बैर और बढ़ रहा है. आतंकवाद कम होने का नाम नहीं ले रहा. देश की शाश्वत समस्या घूसखोरी भी यथावत है और इंस्पैक्टर राज विस्तार ले रहा है. पंडेपुजारियों का कारोबार ऐसे हालात से भी बढ़ता ही है. वे हैरानपरेशान लोगों की समस्याएं दूर करने का दावा कर पैसे ऐंठते हैं. यह 2016 का हाल था जो 2017 में भी रहा तो हम कितने पिछड़ जाएंगे, इस का अंदाजा लगाना मुश्किल है.

– साथ में लखनऊ से शैलेंद्र सिंह, पटना से बीरेंद्र बरियार, कोलकाता से साधना शाह

लोगों का स्ट्रैस लैवल विमुद्रीकरण के बाद बढ़ा है

विमुद्रीकरण और कमजोर विपक्ष का प्रभाव आम लोगों के मानसिक तनाव की भी वजह बन रहा है. इस बारे में भोपाल के जानेमाने मनोचिकित्सक विनय मिश्रा बताते हैं कि उन के पास आने वाले मरीजों की संख्या 25 प्रतिशत तक बढ़ी है. उन मरीजों से काउंसलिंग में पता चला है कि नोटबंदी का असर उन के दिलोदिमाग पर गहरे तक हुआ है. अधिकांश नए मरीज किस वर्ग के हैं, इस सवाल के जवाब में वे कहते हैं कि सभी वर्गों के हैं पर व्यापारी वर्ग औरों से ज्यादा अवसादग्रस्त हैं. आने वाले अधिकांश मरीज तनाव, अनिद्रा, चिंता और घबराहट के शिकार हैं. वे साफतौर पर नोटबंदी सरकार के नोटबंदी के आदेश को इस की वजह मानते हैं.  ऐसी हालत क्यों, इस सवाल के जवाब में वे बताते हैं कि लोग अनिश्चतता के माहौल में जी रहे हैं. उन्हें नहीं मालूम कि अब आगे क्या होगा. वे महिलाएं खासतौर से ज्यादा परेशान हैं जिन के यहां इफरात से नकदी आती है. उन्होंने जो बचा कर रखा था, उस के रद्दी हो जाने का फर्क उन पर पड़ा है. सोने की हद की बात से भी वे दहशत में हैं. लोगों का स्ट्रैस लैवल विमुद्रीकरण के बाद बढ़ा है. बकौल विनय मिश्रा, ‘‘यह चिंताजनक स्थिति है जिस पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा.’’

करें स्वागत 2017 का विनय मिश्रा

क्या नया साल भी हमें इसी हताशा, निराशा और अवसाद में मनाना चाहिए. इस सवाल का जवाब साफ है कि नहीं, हमें नया साल बजाय समस्याओं और परेशानियों को नियति मानने के, उन से लड़ते हुए उल्लास और उत्साहपूर्वक मनाना चाहिए. कठिन और मुश्किल होती जिंदगी को खुशनुमा बनाने की कई वजहें और तरीके मौजूद हैं. इन में से एक है अपने स्तर पर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ना. हमें किसी सरकार की मनमानी के आगे घुटने नहीं टेकना है, न ही कमजोर विपक्ष के भरोसे रहना है जो खुद बैसाखियों पर घिट रहा है. जरूरत इस बात की है कि देश के लोग संगठित हों और गलत का विरोध करने में हिचकिचाएं या डरे नहीं. देश हमारा है, हम से चलता है, मुट्ठीभर नेताओं या बाबाओं से नहीं जो हमें अपनी मरजी के मुताबिक नचाते रहते हैं.

खुशियों पर लगा ग्रहण किसी दानदक्षिणा या टोटके से दूर नहीं होगा, बल्कि खुशियां बढ़ाने से ही दूर होगा. लोकतंत्र में आम आदमी के अधिकार असीमित होते हैं. संविधान हमें अपनी बात निसंकोच कहने का हक देता है. इस का इस्तेमाल न करना ही अवसाद और परेशानियों को बढ़ावा देता है. बात या सलाह किसी क्रांति या लड़ाई की नहीं, बल्कि अपने तरीके से जीने की है. हुआ यह है कि हम सरकारों, राजनीतिक दलों और धर्मगुरुओं के तरीकों से जीने के आदी हो गए हैं जो हमारी राह में सिर्फ कठिनाइयां भर पैदा करते हैं. सरकार हमारे सहयोग की मुहताज है, हम सरकार के मुहताज नहीं. इसलिए, पहला काम दिलों से डर निकाल कर निर्भीक हो कर जीना है. 2016 एक सबक था जो हमें हमारी कमजोरियां बता गया है. संकल्प इस बात का लिया जाए कि 2017 में उन्हें नहीं दोहराना है. अवसाद की 3 अहम वजहें सामने हैं, अनिश्चतता, भय और अंर्तद्वंद्व. इन से खुद को छुटकारा खुद हम ही दिला सकते हैं. यही कोशिश उत्साह, उमंग और उल्लास दे सकती है. यथास्थितिवाद और समझौते वाली मानसिकता छोड़ें, कुछ नया करें. यानी पुराने को छोड़ें जो सड़ा गला हो चला है लेकिन वह नया बना कर हम पर थोपा जा रहा है. सो, होशियार रहें और स्वागत करें नए वर्ष का.