सरिता विशेष

पाकिस्तानी सीमा में अवैध प्रवेश से शुरू हुआ सरबजीत का सफर यातना भरी सजा, माफी की गुहार और भारत व पाकिस्तान के अस्पष्ट रवैए के उलझे गलियारों से गुजरता हुआ दर्दनाक मौत पर खत्म हुआ. पर क्या यह मौत सच में शहादत थी?

‘‘वह अपने देश जिंदा वापस नहीं लौट सका.’’ भारतीय रक्षा क्षेत्र में बसे एक गांव वाह तारा सिंह में रहने वाले 70 वर्षीय हट्टेकट्टे सरदार गुरदीप सिंह ने 23 साल पहले घटी इस घटना को कुछ इसी तरह बयां किया. गुरदीप सरबजीत के उन खास दोस्तों में हैं जिन के साथ सरबजीत का अधिकांश समय गुजरता था.

अमृतसर से लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित जिला तरनतारन के भिखीविंड गांव का निवासी 24 वर्षीय सरबजीत एक खूबसूरत और हट्टाकट्टा नौजवान था. उस के परिवार में उस के पिता, पत्नी सुखप्रीत कौर, 2 बेटियां स्वप्नदीप कौर व पूनम के अलावा उस की बड़ी बहन दलबीर कौर थी जबकि मां का देहांत हो चुका था. बाद में बेटे के सदमे में पिता की भी मौत हो गई.

जब वह पाकिस्तान सीमा पर नशे की हालत में पकड़ा गया उस समय उस की बड़ी बेटी स्वप्नदीप 3 वर्ष की और छोटी बेटी पूनम 23 दिन की थी. पकड़े जाने के बाद सरबजीत को शुरुआती दिनों में इस बात का पूरा यकीन था कि उसे सरहद पार करने की बड़ी सजा नहीं मिलेगी और वह जल्दी ही छूट कर अपने घर वापस आ जाएगा. लेकिन पाकिस्तान में सरबजीत पर भारतीय जासूस होने का आरोप लगा कर मुकदमा चलाया गया और उस के साथ शत्रुओं जैसा व्यवहार किया गया.

उसे वर्ष 1990 में फैसलाबाद व लाहौर में हुए सीरियल बम धमाकों का आरोपी मंजीत सिंह बता कर 14 लोगों की मौत का जिम्मेदार ठहराया गया. सरबजीत खुद को निर्दोष बताता रहा लेकिन पुलिस ने उस की एक  नहीं सुनी.

वर्ष 1991 में सरबजीत को फांसी की सजा सुनाई गई. पिछले 23 सालों से वह लाहौर की कोट लखपत जेल में सजा काट रहा था. इस बीच सरबजीत की रिहाई के लिए दाखिल की गई हर दया याचिका को खारिज कर दिया गया. 2008 में तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने भी उस की दया याचिका ठुकरा दी. सरबजीत की रिहाई के लिए भारत पाकिस्तान से बात करता रहा.

इस बीच भारत सहित अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की सहानुभूति भी सरबजीत के साथ जुड़ चुकी थी. वर्ष 2008 में पाकिस्तान सरकार ने सरबजीत की फांसी पर अनिश्चितकालीन रोक लगा दी थी. शायद इसलिए कि वह जानती थी कि मामला ?ाठा और नकली है.

सरबजीत की रिहाई के लिए उस के परिवार समेत, भारत सरकार व भारतपाक के कई मानवाधिकार संगठन लगातार प्रयास कर रहे थे लेकिन वह रिहा नहीं किया गया. 26 अप्रैल, 2013 को सरबजीत के साथ जेल में सजा काट रहे कैदियों में से 2 कैदियों अमीर आफताब व मुदस्सर ने किसी बात पर कहासुनी के बाद सरबजीत पर ईंट व ब्लेड से जानलेवा हमला कर दिया. इस हमले में सरबजीत के सिर पर गंभीर चोटें आईं और वह कोमा में चला गया. 2 मई को लाहौर के जिन्ना अस्पताल में सरबजीत ने दम तोड़ दिया.

उस के शव को तिरंगे में लपेट कर विशेष भारतीय विमान से स्वदेश लाया गया. पंजाब सरकार द्वारा उस के पैतृक  गांव भिखीविंड में पूरे राजकीय सम्मान के साथ उस का अंतिम संस्कार किया गया और 3 दिन के राजकीय शोक की घोषणा क ी गई. पंजाब सरकार ने उस के परिवार को 1 करोड़ रुपए की आर्थिक मदद देने व उस की दोनों बेटियों को सरकारी नौकरियां देने का वादा किया.

अपने वादे के मुताबिक 11 मई को पंजाब सरकार ने सरबजीत के परिवार को 1 करोड़ रुपए की राशि का चैक भी दे दिया और बड़ी बेटी को नायब तहसीलदार और छोटी बेटी को टीचर की नौकरी देने की भी घोषणा की गई. प्रधानमंत्री राहत कोष से उस के परिवार को 25 लाख रुपए की मदद देने की घोषणा की गई. गांव में सरबजीत के नाम पर एक सरकारी अस्पताल बनाए जाने पर विचार चल रहा है. राजनीतिक दल लोगों की इन भावनाओं को अपनेअपने पक्ष में भुनाने के प्रयास में सरबजीत को ले कर एक से बढ़ कर एक बयान दे रहे हैं. सत्ता व विपक्ष में बैठी सरकार में इस मुद्दे पर श्रेय लेने की होड़ सी दिखी.

पाकिस्तान पुलिस की बर्बरता

2  मई को एक भारतीय नागरिक सरबजीत की अर्थी भारत की सीमा में लाई गई

 तो 10 मई को एक पाकिस्तानी बाशिंदे सनाउल्लाह का जनाजा पाकिस्तान भेजा गया. सरबजीत पाक जेल में और सनाउल्लाह भारत की जेल में सजा काट रहे थे. दोनों देशों की जेल अधिकारियों की मौजूदगी में उन पर जानलेवा हमले कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया.

दरअसल, हर देश की जेलों में कैदियों के साथ पुलिस व कैदियों द्वारा अमानवीय व्यवहार होते हैं जैसा सरबजीत व सनाउल्लाह के साथ हुआ. हमारे देश में भी ऐसा है. यदि सरबजीत नशीली दवाओं की तस्करी में पकड़ा गया था या गलती से भटक कर पाकिस्तान पहुंच गया था या जासूस था तो उसे अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत सजा मिलनी चाहिए थी और उस के बाद उसे रिहा कर देना चाहिए था.

लेकिन पाक पुलिस 23 साल तक उस के साथ बर्बर व्यवहार करती रही. उसे मानसिक व शारीरिक यातनाएं दी गईं. बहन दलबीर बताती हैं कि सरबजीत उन्हें अपनी आपबीती सुनाता था कि किस तरह पुलिस उलटा लटका कर उस के तलवों को डंडों से पीटा करती थी और उसे अधमरी हालत में यों ही लटका हुआ मरने के लिए छोड़ जाते थे. उसे सर्दियों में कंबल नहीं दिया जाता था. कभी सिर में लगाने को तेल नहीं देते थे, साबुन नहीं देते थे. सूखा खाना देते थे जो गले के नीचे नहीं उतरता था.

सरिता विशेष

सरबजीत की बेटी स्वप्नदीप ने बताया कि जब वह वर्ष 2008 में अपने पिता से मिलने गई तो जेल अधिकारियों का रवैया सरबजीत व उन के प्रति अच्छा था. जेल अधिकारियों ने खुद उन्हें बताया था कि सरबजीत अच्छा इंसान है और वे चाहते हैं कि वह जल्द ही छूट कर अपने देश वापस चला जाए. सरबजीत की पत्नी सुखप्रीत के अनुसार, वे जो कुछ सामान भी सरबजीत के लिए भेजतीं अथवा ले कर जातीं, सरबजीत सब को बांट देता था. जेल में वह सब की मदद करता था. जेल के लोग मानते थे कि वह एक अच्छा कारीगर है जो हर काम कर लेता है. सरबजीत के वकील औवेस शेख कहते हैं,‘‘सरबजीत सिंह एक नेक इंसान था. वह बहुत शांत और अच्छे व्यवहारेशा तैयार रहता था.’’

लुधियाना के पुरुषोत्तम सिंह का कहना है कि वर्ष 1973 में वे जासूस के तौर पर सेना में भरती हुए थे. वर्ष 1974 में भिखीविंड कालड़ा छीना पोस्ट से वतन लौटते समय पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. उन्हें कोट लखपत जेल में रखा गया. वर्ष 1986 को उन्हें रिहा कर दिया गया. करीब 12 सालों तक जेल में अनेक यातनाएं सहने वाले पुरुषोत्तम कहते हैं, ‘‘मु?ो वहां अंधेरी कोठरी में रखा जाता था, जहां दिनभर सिर्फ गालियां और 2 रोटियां मिलती थीं.’’

गुरदासपुर के ही कस्बा भैणी मियां खां केगोपाल दास वहां की जेलों में 27 साल कैदी रहे. वर्ष 2011 में रिहा हो कर वे भारत लौटे हैं. वे बताते हैं, ‘‘पाक जेलों में कैदियों के साथ इतना बुरा बरताव किया जाता है कि वे पागल हो जाते हैं.’’

अपना देश हो या विश्व के देश, सभी जेलों में कैदियों के साथ इसी तरह के अमानवीय व्यवहार किए जाते हैं, जिन की घोर निंदा होनी चाहिए.

इधर देशवासी सरबजीत की मौत पर आंसू बहा रहे हैं कि सरबजीत जंग जीत कर चला गया, शहीद हो गया. उस ने पाकिस्तान में एक भारतीय नागरिक होने की सजा भुगती. उस की 60 वर्षीय बहन दलबीर कौर पाकिस्तान के खिलाफ जंग आरंभ करने का आह्वान कर रही हैं और भारत सरकार को कोस रही हैं कि उस ने राष्ट्रीय अस्मिता और जनता की भावनाओं को नहीं सम?ा. पंजाब सरकार ने भी लगे हाथों सरबजीत को शहीद घोषित कर के दलित किसानों की सहानुभूति हासिल कर ली. राष्ट्रीय नेताओं ने सरबजीत को सलामी दी. बस, फिर क्या था, देश की मीडिया ने भी उसे हीरो बना दिया.

सरबजीत की इस तथाकथित शहीदी पर देश की राजनीतिक पार्टियां अपने वोटों की खातिर चुप हैं और जनता पाकिस्तान की हरकतों के कारण आहत व क्रोधित है.

शहीद कौन

देश की रक्षा और उस की अस्मिता की रक्षा के लिए प्राणों की बलि देने वाला सैनिक शहीद कहलाया जाता है. सरबजीत ने अपनी छोटी सी भूल की बड़ी सजा भुगती, पाकिस्तान पुलिस के ?ाठे आरोप और अत्याचार सहे. इसलिए उस के साथ सब की सहानुभूति तो अवश्य होनी चाहिए लेकिन यह सम?ा से परे है कि जिस शख्स के हाथ में न बंदूक थी और न ही सिर पर कफन बांध कर वह देश के लिए लड़ा, महज पाकिस्तान सीमा में अवैध रूप से पकड़े जाने, जेल में 23 साल कैद रहने और पुलिस की बर्बरता सहने से वह शहीद कैसे बन गया?

शहीद कहलाने के लिए इतना ही जरूरी नहीं है कि कोई देशवासी उस देश में मारा गया जिस के साथ हमारे संबंध कभी सौहार्दपूर्ण नहीं रहे. ऐसे में यह राष्ट्रीय अस्मिता और जनता की भावनाओं का मुद्दा कैसे बन गया?

अगर सरकार और देश उसे शहीद मान रहे हैं तो फिर सरकार को यह स्वीकार करने में भी ?ि?ाकना नहीं चाहिए कि वह हमारा जासूस था. उस की पूरी कहानी देश के सामने लानी चाहिए. कब, कैसे और कहां उसे ट्रेनिंग दे कर और किस मिशन के लिए पाकिस्तान भेजा गया था. लेकिन अगर सरकार उसे जासूस नहीं मान रही है तो फिर शहीद किस आधार पर मान बैठी है? उसे पाकिस्तान सरकार के जुल्मों का शिकार माना जा सकता है पर देशसेवा नहीं. सरकार के इन 2 विरोधाभासी विचारों में राजनीतिक दांवपेंच की बू आती है. 

वह भिखीविंड गांव का एक आम दलित किसान था जो यहां के अधिकांश मर्दों की तरह खेतों पर काम करता था और शाम ढलते ही नशा करता था. उसे अपनी इसी गलती का खमियाजा भुगतना पड़ा. यही नहीं, खबरों के मुताबिक वह पाकिस्तान की जेल में अपनी सारी कमाई सिगरेट में उड़ा देता था और अपने साथी कैदियों से पैसे उधार ले कर सिगरेट पीता था.

सरबजीत के पिता उत्तर प्रदेश सड़क परिवहन विभाग में नौकरी करते थे व अपने परिवार के साथ आगरा में रहते थे. नौकरी से रिटायर्ड होने के बाद वे परिवार के साथ भिखीविंड गांव आ बसे. सरबजीत की बड़ी बहन दलबीर कौर पढ़ीलिखी थी तो खादी ग्रामोद्योग में नौकरी करने लगी लेकिन सरबजीत 10वीं जमात भी पास नहीं कर पाया. फेल हो जाने के बाद उस ने पढ़ाईलिखाई छोड़ दी.

उस के बाद वर्ष 1983 में पड़ोस के गांव की सुखप्रीत कौर से उस की शादी कर दी गई. जल्द ही वह 2 बेटियों का पिता बन गया.

वह गांव के जाट सिख सरदार मजेंदर सिंह के खेतों में मजदूरी करता था. मजेंदर सिंह और सरबजीत हमउम्र होने के कारण अच्छे दोस्त बन गए थे. दोनों का उठनाबैठना, खानापीना आदि साथ होता था. गांव में जाट सिखों की तूती बोलती है. उन की खेती की लंबीचौड़ी जमीनों पर दलित किसान मजदूरी कर के अपना पेट पालते हैं. यहां के ऊंचेऊंचे मकान जाट सिखों की पहचान हैं और कच्चे मकान बदहाल दलित किसानों की कहानी कहते हैं. गांव के कुछ खेत बौर्डर से मिले हैं जहां इस गांव के लोगों क ो सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक खेतों में काम करने की इजाजत मिलती है. यहां के लोगों की जीविका का साधन अधिकतर खेतीबाड़ी ही है.

सरबजीत का परिवार गांव में ही एक किराए के मकान में रहता था. उस की मां का देहांत हो चुका था. वह अपने पिता, बहन, पत्नी व दोनों बेटियों के साथ रहता था.

पंजाब की लस्सी के साथसाथ यहां के लोगों की दारू की लत भी दूरदूर तक मशहूर है. हर घर में शाम ढलते ही मर्द शराब के नशे में चूर हो जाते हैं. स्थानीय लोग कहते हैं कि मनोरंजन आदि के साधनों की यहां कमी है. इसलिए खेतों पर काम कर के थकेहारे किसान थोड़ीबहुत मौजमस्ती के लिए शाम को शराब पीते हैं. गांव की नई पीढ़ी भी इस नशे की चपेट में लगभग पूरी तरह फंस चुकी है. अधिकतर युवा बेरोजगार हैं जो दिनभर खाली घूमते हैं. ऐसे में वे नशे की लत के शिकार आसानी से हो जाते हैं.

शराब के अलावा नशे की अन्य सामग्री तथाकथित तौर पर पंजाब की सरहद से भारत में पहुंचाई जाती है.

संभव है कि इन नशीली सामग्री को कुछ स्थानीय लोगों द्वारा गांव में ला कर बेचा जाता है. यह भी संभव है कि कुछ बेरोजगार युवक इस में लिप्त हों और उन्होंने इसे अपना धंधा बना लिया हो.

 स्थानीय लोग इस नशे के आदी होने के पीछे पाकिस्तान का हाथ बतातेहैं. वे कहते हैं कि पाकिस्तान पंजाब की आने वाली नस्ल को नशे में डुबो देना चाहता है तो क्या किसी दूसरे देश की सरहद में नशे का यह कारोबार दशकों तक एकतरफा चलता आ रहा है? उधर से मुफ्त में गांजा, अफीम, चरस वगैरा इधर फेंका जाता हो, ऐसा संभव नहीं है. अगर वे उधर से नशे की पुडि़यां भारत की सरहद में फेंकते हैं तो इधर से पैसों की पुडि़यां भी अवश्य फेंकी जाती होंगी.

स्थानीय लोगों की मानें तो बौर्डर सिक्योरिटी फोर्स की नाक के नीचे यह सब चलता हो और उन्हें पता भी न चले, यह संभव नहीं, इसलिए उन की मिलीभगत के बिना यह धंधा उस क्षेत्र में पनपना नामुमकिन है, जहां चिडि़या भी पर न मार सके या हम यह मानें कि हम भारतीय सरहद पर भी दलाली खाते हैं और जब कोई नशे में सरहद पार चला जाता है तब हल्ला मचाते हैं और पाकिस्तानी सरकार को बहाना मिल जाता है यह कहने का कि उन्होंने एक गुप्तचर पकड़ लिया. सरबजीत के परिवार का दर्द स्वाभाविक है, लेकिन अब सरबजीत की कैद और मौत से बहन दलबीर भाई की इस तथाकथित शहादत के नाम पर राजनीति में अपने लिए नई राहें भी तलाशने का प्रयास कर रही हैं. कई राजनीतिक पार्टियों की तरफ से उन्हें चुनाव लड़ने के लिए प्रस्ताव भी मिल रहे हैं जिन पर वे विचार कर रही हैं. भविष्य में वे सरबजीते क ो अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उठाने की बात कह रही हैं. लगता है कि वे भविष्य में भी देशवासियों की संवेदनाओं को भुनाती रहना चाहती हैं.

हालांकि दलबीर कौर के लिए राजनीति कोई नई बात नहीं है. वर्ष 1980 में वे कांग्रेस पार्टी से जुड़ी थीं और अपने गांव में कांग्रेस के लिए कार्य करती थीं. इस के बाद कांग्रेस से उन का मोह भंग हुआ और उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया.

दलबीर कौर केअनुसार, जब वे कांग्रेस छोड़ कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुईं तो कांग्रेस ने उन से खुन्नस निकालने के लिए उन के परिवार के साथ एक गंदा खेल खेला.

दलबीर के शब्दों में, यदि कांग्रेस ने मेरे परिवार के साथ यह गंदा खेल न खेला होता तो मेरा भाई आज इस तरह घर नहीं लौटता. हालांकि वह गंदा खेल क्या है, इस पर दलबीर कुछ नहीं कहना चाहतीं. लेकिन एक बार फिर वे कांग्रेस के गले लग कर फूटफूट कर रोईं. कांग्रेस ने भी उन्हें सरबजीत के बहाने ही सही, गले लगाने में देर नहीं लगाई. इधर, नरेंद्र मोदी भी सरबजीत के लिए आंसू बहा रहे हैं.

एक तरफ सरबजीत के मुद्दे को विभिन्न राजनीतिक पार्टियां अपनेअपने फायदे के लिए भुनाने में लगी हुई हैं तो दूसरी तरफ दलबीर कौर पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय जनता के आक्रोश का इस्तेमाल अपने लाभ के लिए कर रही हैं. करीबी लोगों का कहना है कि दलबीर कौर राजनीति में आ कर सरबजीत जैसे लोगों के लिए कुछ करना चाहती हैं जो पाकिस्तान की जेलों में बंद हैं. सवाल यह है कि इन 23 सालों में सरबजीत की आवाज मीडिया के द्वारा देश ही नहीं पाकिस्तान में भी खूब सुनाई दी लेकिन क्या कभी दलबीर कौर ने सरबजीत के अलावा किसी और बेगुनाह के बारे में बात की जो पाकिस्तान की जेलों में कैद हैं.

सरबजीत के मुद्दे को ले कर सरकार की चुप्पी कई बड़े सवाल खडे़ करती है. आखिर इस मसले पर सरकार इतनी नरम क्यों है? आखिर वह दलबीर कौर के सामने घुटनों के बल क्यों खड़ी है? यदि सरबजीत को शहीद कहा जा रहा है तो वह भारतीय जासूस था और अगर वह  जासूस था तो प्रत्येक  देश अपने देश की जासूसी करने वाले के साथ नरम रुख से पेश नहीं आता. यदि वह मादक पदार्थों की तस्करी में लिप्त था तो वास्तव में वह गैरकानूनी काम कर रहा था. लेकिन यदि यह मान लिया जाए कि वह नशे की हालत में पाकिस्तान की सीमा में घुस गया तो यह सरबजीत की स्वयं की गलती या बेवकूफी है जिस की  सजा उस ने भुगती. इस के लिए कोई और नहीं वह खुद और उस का परिवार दोषी है. इस में राष्ट्रभावना अथवा देश का बहादुर बेटा होने का कोई तुक नहीं.

वैसे, किसी भी बेगुनाह, चाहे वह किसी भी देश का हो, को सजा मिलना न्याय के खिलाफ  और अमानवीय है, इस की कड़े शब्दों में निंदा होनी चाहिए. यदि विश्व का इतिहास देखें तो कितने ही बेगुनाहों ने दूसरे देशों की जेलों में सिर्फ संदेह की बिना पर आजीवन कारावास व मौत की सजाएं भुगती हैं. कोई किसी देश की सरहद में अवैध रूप से दाखिल होता है तो निसंदेह उसे लंबी सजाएं काटनी पड़ती हैं. हाल ही में भारतीय नागरिक चमेल सिंह की पाक जेल में पिटाई के बाद मौत हो गई. इसलिए यह एक अकेले सरबजीत की कहानी नहीं है.

भारत और पाकिस्तान की जेलों में सजा काट रहे सैकड़ों कैदी हैं, इन में कितने गुनाहगार हैं और कितने बेगुनाह, कोई नहीं जानता. विदेशों की ही नहीं, यदि हम अपने देश की जेलों में बंद कैदियों की बात करें तो हजारों कैदी सिर्फ शक के  आधार पर लंबी सजाएं काट रहे हैं. वर्षों उन पर मुकदमे चलते हैं और जब वे बेगुनाह साबित होते हैं तब तक उन की आधे से अधिक जिंदगी जेल की कोठरियों में गुजर चुकी होती है.

कई बार भटक कर लोग गलती से दूसरे देशों की सीमा में पहुंच जाते हैं. उन के साथ कू्रर व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए. पाकिस्तान के एक स्थानीय वकील ने एक मामले को उजागर करते हुए बताया कि किस तरह मानसिक  रूप से विक्षिप्त चंडीगढ़ का एक व्यक्ति अपनी पत्नी से ?ागड़ा करने के बाद पाकिस्तान के पेशावर में पकड़ा गया. वहां पूछताछ में उस ने पुलिस को बताया कि वह अफगानिस्तान जा रहा था. उसे वापस भारत भेज दिया गया.

इसी तरह एक 11 वर्षीय पाकिस्तानी लड़का भारतीय सीमा में पकड़ा गया जो शाहरुख खान से मिलने के लिए भारत आ रहा था. ऐसे हजारों मामले हैं जिन के बारे में कभी किसी को पता ही नहीं चलता और लंबे समय तक बेगुनाह लोग दूसरे देश की जेलों में सड़ते रहते हैं.

हाल ही में पाकिस्तान ने भारत की विभिन्न जेलों में बंद अपने 47 कैदियों को रिहा करने की मांग की है, जिन की सजा पूरी हो चुकी है. भारत व पाकिस्तान के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के संयुक्त प्रयास से भारतीय जेल में 13 सालों से बंद 3 पाकिस्तानी मछुआरों को मार्च 2013 में रिहा कर दिया गया. इन मछुआरों पर धारा 120बी, 121,121ए, 489 ए, सैक्शन 25ए व फौरनर्स ऐक्ट के तहत आरोप तय किए गए थे.

पूर्व राजनयिक व उपराज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी ने अपने एक लेख में एक ऐसे व्यक्ति का जिक्र किया है जिसे शक के चलते पिछले 4 सालों से दार्जिलिंग के करेक्शनल होम में रखा गया है. इस लेख में गोपालकृष्ण ने इस करेक्शनल होम में बिताए गए अपने 1 घंटे के अनुभवों को बांटते हुए लिखा है कि साल 2006 में जब उन्होंने इस होम में लगभग 1 घंटा बिताया तो देखा कि यहां 60 लोगों को रखा गया था जिन में अधिकतर अंडरट्रायल थे. इन 60 में से 6 आईएसआई के एजेंट होने के संदिग्ध थे. इन में 2 पाकिस्तानी थे. इन 2 में से 1 हैदराबाद सिंध का था जिस ने अपनी कहानी सुनाते हुए बताया कि वह वैध तरीके से वाघा बौर्डर से भारत अपने रिश्तेदारों से मिलने और अजमेर शरीफ देखने आया था. उस ने बताया कि उस की गलती सिर्फ इतनी थी कि वह वीजा खत्म हो जाने के 1 दिन बाद अपने देश लौट रहा था और इसलिए उसे गिरफ्तार कर लिया गया.

ऐसा भारत या पाकिस्तान में ही नहीं, हर देश में हो रहा है, जहां संदिग्ध लोग सजाएं काट रहे हैं. पुलिस उन के साथ बर्बर व्यवहार करती है. उन का गलत इस्तेमाल कर उन पर अनेक ?ाठे आरोप लगा देती है.

ऐसे बहुत कम मामले हैं जब लोग बेगुनाह होने पर रिहा कर दिए जाते हैं. अधिकांश तो उन्हीं देशों में मर जाते हैं. विश्व के कई हिस्सों में मछलियां पकड़ते समय जलीय सीमा को ले कर असमंजस की स्थिति में मछुआरे दूसरे देश की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं जहां उन्हें गिरफ्तार कर के उन के साथ युद्धबंदियों जैसा सुलूक किया जाता है. दो देशों के बीच आपसी रिश्ते मधुर न होने के कारण इन मछुआरों को खोजा नहीं जाता और ये वहां जेलों में सड़ते रहते हैं. पिछले 60 सालों से पाकिस्तान व भारत के मछुआरे भी अनजाने में एकदूसरे की जलीय सीमा में घुस जाते हैं जहां वे कैद कर लिए जाते हैं और लंबा समय जेलों में बिताते हैं.

अपनी जान को जोखिम में डाल कर दूसरी सीमा में मछलियां पकड़ने के लिए निकलना क्या मूर्खता नहीं है. दार्जिलिंग में जो पाकिस्तानी व्यक्ति पिछले 4 सालों से सिर्फ इसलिए कै द है कि वह वीजा खत्म होने के बाद अपने देश लौटने की कोशिश कर रहा था तो इसे सरासर बेवकूफी कहा जाए तो गलत नहीं होगा. 

ऐसे मामले ही सरकार का निकम्मापन दर्शाते हैं. यदि सरकार कठोर प्रयास करती तो सरबजीत व पाकिस्तान जेलों में कैद उस जैसे अन्य कैदी रिहा हो सकते थे. लेकिन सरकार ने इस मुद्दे को कभी गंभीरता से लिया हो, ऐसा लगता नहीं. न्यूयार्क में 16 सितंबर 2005 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ की मुलाकात में एक मुद्दा सरबजीत की रिहाई का भी उठा था. मुशर्रफ 5 सालों से परवेज मुशर्रफ से ले कर आसिफ अली जरदारी तक किसी पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने भारत की ओर से की गई अपील पर सुनवाई नहीं की.

बीते साल अप्रैल में भारत आए पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के आग्रह और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद भारत ने अजमेर जेल में बंद पाक नागरिक डाक्टर खलील चिश्ती को तो रिहा कर पाकिस्तान भेज दिया लेकिन मनमोहन सिंह व आसिफ अली जरदारी की मुलाकात में सरबजीत पर किए गए भारतीय आग्रह पर पाकिस्तान ने फैसला नहीं किया. वर्ष 2012 में तत्कालीन विदेश मंत्री एस एमात्मक  नतीजे आ सकते हैं. लेकिन भारत की ओर से की गई हर कोशिश नाकाम साबित हुई. पाकिस्तान सरबजीत के मामले में भारत को हर बार गच्चा देता रहा. सरबजीत का परिवार और अधिकांश लोग इस के लिए सरकार के ढुलमुल रवैए को दोषी मानते हैं.

एक दैनिक अखबार के संपादकीय में पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में सरबजीत पर हुए हमले पर लिखा गया, ‘सरबजीत की मौत पर पाकिस्तान यह नहीं कह सकता कि लाहौर की कोट लखपत जेल में उसे गैर सरकारी तत्त्वों ने निशाना बनाया क्योंकि जेल अधिकारियों की मिलीभगत के बगैर उस पर ऐसा संगीन हमला संभव नहीं था.’

संपादकीय में आगे लिखा है, ‘भारत सरकार ने कभी भी ऐसा प्रदर्शित नहीं किया कि सरबजीत की सुरक्षा या उस की रिहाई उस के एजेंडे में है. सरकार अपने नागरिकों की परवा नहीं करती, बल्कि वह अपने मानसम्मान की भी फिक्र नहीं करती तो फिर सीधे तौर पर यह हमारी सरकार की नाकामी है.’

दरअसल, दोनों देशों के हाई कमीशन निकम्मे हैं जो अपने देश के बेगुनाह लोगों के लिए कुछ ठोस उपाय नहीं कर सकते. यदि सरबजीत बेकुसूर था तो 23 सालों के लंबे वक्त में हमारी सरकार के विदेश मंत्रालय ने एक भी ईमानदार पहल क्यों नहीं की? इसे मानवीय पहलू से देखने के बजाय सिर्फ राजनीतिक लाभहानि की दृष्टि से देखा गया. ऐसे मामलों में दोनों देशों की कूटनीतिक विफलता सामने आती है.

जानेमाने स्तंभकार हृदयनारायण दीक्षित सरबजीत के मामले में हीलाहवाली के लिए देश की सरकार को दोषी मानते हैं. उन्होंने लिखा है, ‘‘पाकिस्तान भारत में घुसपैठ कराता है, पाकिस्तान में आतंकी  ट्रेनिंग कैंप हैं, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की बात भी स्वत: सिद्ध है, बावजूद इस के भारत निरीह, लाचार, असहाय और बेबस क्यों है?’’

उन्होंने आगे लिखा है, ‘‘पाकिस्तानी जेलें भारत के निर्दोष कैदियों से भरी हुई हैं. कुछ समय पहले तत्कालीन विदेश मंत्री एस एम कृष्णा ने राज्यसभा में बताया था कि पाकिस्तान की जेलों में 793 भारतीय बंद हैं. इन में 582 गरीब मछुआरे हैं, शेष 211 साधारण नागरिक हैं. इन निर्दोष लोगों को पाकिस्तानी जेल में सड़ने देना और भारतपाक शीर्ष वार्त्ताओं में मजे लेना भारतीय राजनयिकों की लत है.’’

वे आगे लिखते हैं, ‘‘सैकड़ों भारतीय कैदी अब भी पाकिस्तान की जेलों में यातनाओं के शिकार हैं. मूलभूत प्रश्न है कि भारत सरकार ने इन के लिए क्या किया? डाक्टर खलील चिश्ती की रिहाई के लिए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने भारतीय प्रधानमंत्री से वार्त्ता की थी. सरबजीत के लिए डा. मनमोहन सिंह ने क्या प्रयास किए? असल में भारत की पाक नीति में ही सारा दोष है. दिल्ली के सिंहासन की कमजोरी ने राष्ट्र को आहत किया है.’’

सरबजीत की मौत पर बुद्धिजीवी वर्ग के साथसाथ पूरे देश की यही प्रतिक्रिया है कि सरकार ने यदि ठोस प्रयास किए होते तो सरबजीत की रिहाई मुमकिन थी.  सरबजीत सिंह गुनाहगार था या बेगुनाह, यह कोई नहीं जानता. दोनों देशों के अपनेअपने तर्क हैं. लेकिन सरबजीत अब तथाकथित शहीद है. उसे वह दर्जा दे दिया गया है जो पजांब के स्वतंत्रता सेनानी शहीद भगत सिंह को दिया गया है. अब शहीद सरबजीत सिंह और भगतसिंह में कोई अंतर नहीं है. भविष्य में स्कूलों में शहीद सरबजीत सिंह की जीवनी का भी एक चैप्टर शामिल किया जा सकता है अथवा स्वतंत्रता दिवस पर सरबजीत सिंह की समाधि पर जा कर सरकारी व गैरसरकारी लोग श्रद्धांजलि अर्पित करें तो हैरानी की बात नहीं. यानी समय बदलने के साथसाथ शायद शहीद के माने भी बदल गए हैं.

पाकिस्तानी सीमा में अवैध प्रवेश से शुरू हुआ सरबजीत का सफर यातना भरी सजा, माफी की गुहार और भारत व पाकिस्तान के अस्पष्ट रवैए के उलझे गलियारों से गुजरता हुआ दर्दनाक मौत पर खत्म हुआ. पर क्या यह मौत सच में शहादत थी? पढि़ए बुशरा की यह रिपोर्ट.

भारत व पाकिस्तान की सरहद जिस के दोनों ओर बसे नजदीकी गांवों के लोग जब कभी उसे पार करने की गलती कर बैठते हैं तो उन का सकुशल वापस लौटना मुश्किल होता है.

एक शहीद सैनिक की तरह तिरंगे में लिपटा सरबजीत का शव कई सवाल खड़े करता है.

(बाएं से दाएं) दलबीर कौर (बहन), सुखप्रीत कौर (पत्नी), पूनम व स्वप्नदीप (बेटियां) : नशा करने से पहले सरबजीत ने काश एक बार अपनों के बारे में सोचा होता. क्या भाई की मौत में दलबीर कौर अपना राजनीतिक भविष्य तलाश रही हैं? सरबजीत की अंतिम यात्रा देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि समय बदलने के साथसाथ शहीद के माने भी बदल गए हैं. सरबजीत का दोस्त सरदार मजेंदर सिंह. सरबजीत का दोस्त सरदार मजेंदर सिंह. भिखीविंड स्थित सरबजीत का घर, जहां अब उस की यादें ही रह गई हैं.