संजय दत्त को अपराध करने के 20 साल बाद सजा देने और जेल में जाने के फैसले को न्याय नहीं अन्याय कहा जाएगा. यह अन्याय संजय दत्त के साथ नहीं, पूरे देश और उस की जनता के साथ है कि एक ऐसा व्यक्ति जिस ने हथियार रखने जैसा अपराध किया और 19 साल तक आजाद घूमता रहा. अगर वह अपराधी संजय दत्त न हो कर कोई पेशेवर अपराधी होता तो क्या जनता के लिए गंभीर खतरा न होता? क्या हजारों ऐसे अपराधी खुलेआम नहीं?घूम रहे होंगे?

विवाद इस बात का नहीं है कि संजय दत्त को माफी दी जाए या नहीं बल्कि इस बात पर उठना चाहिए कि न्याय करने में देर करने वालों को समाज और उस का कानून अपराधी क्यों नहीं माने. किसी भी अपराध के पीडि़तों को पहला सुकून तब मिलता है जब अपराधी को सजा मिल जाए और सजा ऐसी कि वह पीडि़त को दोबारा प्रताडि़त न कर सके. अगर समाज ऐसी न्याय व्यवस्था नहीं तैयार कर पा रहा जिस में पीडि़त को संतोष मिल सके और जनता को भरोसा मिले कि देश में कानून का राज चल रहा है तो दोषी सरकार, पुलिस, नेता, अदालतें और न्यायाधीश सभी हैं.

संजय दत्त और उस जैसे दूसरों को इस तरह के मामलों में राहत मिलनी चाहिए जिन में मामले वर्षों चलते रहे हों और पुरानी गवाहियों के आधार पर फैसले दिए जाने हों. इन मामलों में जमानत पर वर्षों से छूटे लोगों को जेल भेजना बिलकुल गलत है चाहे वह डाकू मंगल सिंह हो, सुखराम हो या संजय दत्त. जब वर्षों तक एक अपराधी समाज में खुलेआम घूम रहा हो पर समाज के लिए खतरा न हो तो उसे सजा दे कर कानूनी कागजी कार्यवाही करना, मरी मक्खी मारने जैसा है.

देश की अदालतों में लाखों ऐसे मुकदमे भी लंबित हैं जिन में वर्षों से अभियुक्तों पर अपराध सिद्ध नहीं हुआ पर जमानत न मिलने के कारण वे जेलों में सड़ रहे हैं. यह भी अमानवीय है, जनता के साथ अपराध है. संजय दत्त का मामला तो सिर्फ झकझोरने के लिए है कि 20 वर्ष बाद अपराधी या निरपराधी सिद्ध करने का आखिर अर्थ क्या है? हम किसी संवैधानिक, कानून के राज में रह रहे हैं या काले राज में, जहां पुलिस, जेल और कानून की धौंस चलती हो, जो मनमरजी करते हों.

होना तो यह चाहिए कि इस तरह के सभी अपराधियों को सस्पैंडेड सजा दी जाए यानी जब तक वे फिर गुनाह न करें, आजाद रहें. उन्हें अपराधी माना जाए पर जेल काटना ही इकलौता उपाय न हो. क्या ऐसा कानून बनाना कठिन है