बंगला मिला न्यारा
राजनीति में कब कौन क्या बन जाए, कहना मुश्किल है. लेकिन मनमोहन सिंह अगले प्रधानमंत्री नहीं होंगे, यह जरूर दिखने लगा है. दिल्ली के 3, मोतीलाल नेहरू मार्ग का एक बंगला इन दिनों सजायासंवारा जा रहा है क्योंकि उस में 30 अप्रैल के बाद कभी भी मनमोहन सिंह रहने आ सकते हैं. उन की पत्नी गुरुशरण कौर ने भी इस बाबत हामी भर दी है.
वर्ष 1920 में बने इस बंगले में बीती फरवरी तक शीला दीक्षित रहती थीं. साढ़े 3 एकड़ में फैले इस शानदार बंगले में 4 शयनकक्ष हैं, दफ्तर है और एक जैव विविधता पार्क है. बंगले का सर्वे कर सुरक्षा एजेंसियां सुनिश्चित कर चुकी हैं कि वह सुरक्षा के लिहाज से ठीक है. 10 साल तक देश संभाल चुके मनमोहन सिंह को तय है कि यह बंगला रास आएगा लेकिन उन्हें 7, रेसकोर्स वाले बंगले की याद आती रहेगी.
 
धर्मगुरुओं की राजनीति
जनता तो चाहने लगी है लेकिन वे राजनेता ही हैं जो राजनीति को धर्म के मकड़जाल से मुक्त नहीं होने देना चाहते. मुद्दत बाद नेहरूगांधी परिवार से कोई शाही इमाम के यहां गया तो तुरंत फतवा जारी हो गया कि मुसलमान कांगे्रस को वोट दें.
यह चर्चित डील वैसी ही है जैसी रामदेव व भाजपा के बीच हुई है. वोट मांगने का तरीका अलग है. इस के बाद भी कोई लोकतंत्र में धर्मनिरपेक्षता की बात करे तो उसे मूर्ख ही कहा जा सकता है. विकास, रोजगार, बुनियादी सहूलियतें जैसी बातों और वादों की हकीकत को लोग नहीं देख रहे कि लड़ाई सुशासन देने सेवा करने या भ्रष्टाचार मिटाने के लिए नहीं, बल्कि धर्म थोपने के लिए लड़ी जा रही है जिस से लोग हर स्तर पर कंगाल होते रहे हैं. इसलिए, वोट जरूर डालें.
 
मुलायम की परेशानी
जब भी मुलायम सिंह परेशान होते हैं तो वे तीसरे मोरचे का बेसुरा राग अलापने लगते हैं जो उन के अचेतन मन में गहरे तक बैठ चुका है. तीसरा मोरचा एक आदर्श परिकल्पना है जिस के बारे में सोचते रहने से फायदा यह होता है कि मुलायम भी नरेंद्र मोदी की तरह खुद को प्रधानमंत्री पद की कुरसी पर बैठा पाते हैं.
राजनीति चुनाव के दिनों में रेखागणित की तरह हो जाती  है जिस में अगर, मगर और मान लो जैसे सूत्रों से काम चलाना पड़ता है. इस में भी दिक्कत यह है कि अगर एनडीए सत्ता में आया तो उत्तर प्रदेश में भाजपा दोबारा मजबूत हो जाएगी जिस से अगली विधानसभा में सपा का दबदबा दरक जाएगा.
 
कहां गए केजरीवाल 
चुनाव के ऐलान के वक्त हीरो बना दिए गए आम आदमी पार्टी यानी ‘आप’ के मुखिया अरविंद केजरीवाल को समझ आ गया होगा कि मीडिया जब सजा देता है तो आदमी कहीं का नहीं रह पाता. न्यूज चैनल्स पर चौबीसों घंटे छाए रहने वाले केजरीवाल छोटे परदे से गायब हुए तो इसे मीडिया की साजिश ही कहा जाएगा कि उन्हें तबतब ही दिखाया जबजब किसी ने थप्पड़ मारा.
ऐसा दुनिया में हर कहीं होता है कि सड़क चलते आदमी को जनता सत्ता दे देती है. मीडिया निष्पक्ष न हो तो विवादों और सूचनाओं का आदानप्रदान महानगरों के यातायात सरीखा हो जाता है जिस में वाहनों की भीड़ तो दिखती है पर चालकों का चेहरा नजर नहीं आता. ‘आप’ के प्रत्याशी तो हर कहीं दिख रहे हैं पर केजरीवाल से परहेज किया जा रहा है.
-भारत भूषण श्रीवास्तव द्य
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