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‘क्या कह रही हो तुम, मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा,‘ सुजाता बोली. ‘हमारे साथ रहेगी तो धीरेधीरे सब समझ जाएगी,‘ आभा सयानों की तरह बोली और वहां उपस्थित सभी छात्राओं ने ऐसा ठहाका लगाया जैसे आभा ने कोई चुटकुला सुना दिया हो. सुजाता रोमा के बुलाने पर पहली बार इस समूह में शामिल हुई थी. अत: उस ने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी.

सुजाता और रोमा एकसाथ ही सत्या के घर से निकली थीं. ‘तूने तो कहा था कि आंटी ने अनुमति दे दी है,‘ बाहर निकलते ही रोमा ने प्रश्न किया. ‘वह तो मैं उन सब को टालने के लिए कह रही थी. सच तो यह है कि मैं स्वयं ही सोच रही थी कि पिकनिक पर जाऊं या नहीं.‘ कहीं मुझ जैसी साधारण रंगरूप वाली लड़की के साथ जाने से अत्याधुनिक सुंदरियों की नाक ही न कट जाए,‘ सुजाता मुसकराई.

‘समझी, तो तूने छिप कर सब सुन लिया.‘ ‘मैं न तो छिप कर सुनने में विश्वास करती हूं न ही छिप कर कुछ कहने में, पर क्या करूं, मैं वहां पहुंची तो वहां मेरी ही प्रशंसा के पुल बांधे जा रहे थे. अत: मैं वह वार्त्तालाप सुनने का लोभ संवरण नहीं कर पाई. तू जिस तरह मेरा बचाव कर रही थी, वह भी सुना.‘

‘बहुत बुरा लगा होगा न.‘ रोमा ने सुजाता का हाथ थामते हुए भीगे स्वर में कहा. ‘उतना बुरा भी नहीं लगा. बहुत साधारण रूपरंग है मेरा, यह तो मैं बचपन से जानती हूं. पर जिस ढंग से पीठ पीछे ये बातें कही जा रही थीं, वह थोड़ा अखर गया. पर हर घने, काले बादल के पीछे चमकीली श्वेत किरण भी छिपी होती है, यह भी आज पता चल गया.‘

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