सत्य निकेतन हादसा भ्रष्ट सिस्टम की देन है या सरकार की धार्मिक मानसिकता से भी इसका कोई कनेक्शन है यह सवाल संभव है असहजता पैदा करने बाला लगे लेकिन है वजनदार जिसका जबाव ढूंढने इस हादसे से परे कई पहलुओं पर चिंतन मनन करने से मिलता भी है. लेकिन इसके पेरेलल चलने बाला सच यह भी है कि सात मौतों की सीधी जिम्मेदारी एमसीडी और पीजी संचालकों की बनती है.
`नियमानुसार` हर साल की तरह इस साल भी दिल्ली में एमसीडी ने प्री मानसून सर्वे के तहत कोई 30 लाख इमारतों का सर्वे किया था. यह सर्वे रुटीनी तौर पर मार्च से जून के बीच किया जाता है जिसका मकसद बिल्डिंगों की फिटनेस आंकना और जांचना होता है. यह कम हैरत की बात नहीं कि इस अहम सर्वे में महज 62 इमारतों को ही खतरनाक स्तर का पाया गया था. लेकिन सत्य निकेतन इलाके की कोई भी बिल्डिंग उनमें से एक नहीं थी. एमसीडी ने अपनी शुरूआती रिपोर्ट में यह माना था कि इस कालोनी की प्रापर्टियों के खिलाफ कोई रिकार्ड बुकिंग या सीलिंग का नहीं है और कोई शिकायत भी नहीं मिली थी
बुकिंग और सीलिंग की शिकायत के न होने का सीधा सा मतलब यह होता है कि बिल्डिंगों में कोई अवैध निर्माण मसलन बिना इजाजत अतिरिक्त निर्माण, बेसमेंट में बदलाब और मंजिलों को बढ़ाना बगैरह नहीं थे. और न ही इस बाबत एमसीडी ने पहले कभी कोई काररवाई की थी. यानी एमसीडी के रिकार्ड में सत्य निकेतन इलाके की हरेक बिल्डिंग पाक साफ़ दर्ज है. अगर ऐसा कुछ होता तो एमसीडी इमारत को या उसके उस हिस्से को सील कर देता
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