Hindi Poem : आज-कल फोन कम, कान ज्यादा बजते हैं
लगता जैसे बार-बार हमें पुकारा जा रहा हो
लेकिन ये महज भ्रम मात्र होता,
छोटी से छोटी बात पर हमें आवाज देने वाले
निकल पड़े है, भविष्य सवारने
जैसे हम निकले थे...!

मैं करछी तेज-तेज चलाने लगती हूँ
समझने की कोशिश करती हूं,
मनस्थिति अपनी...!
दिमाग समझदार ठहरा, सब समझता है
पर कान..? कान नहीं समझता
वह बजता रहता, मौका-मौका

उकताहट होती है, दिन भर में कई-कई बार
जानती हूँ, ये वक्त नहीं है, फोन के बजने का
फिर भी कभी भी कुछ भी हो सकता है,,
फोन को हमेशा पास रखने लगी हूँ
कि अब कुछ नहीं तो बच्चों के व्हाट्सएप की
डीपी देखकर ही खुश होती रहती,,,
सोशल मीडिया के नये नये एप्प डाउनलोड कर रखी है
कि वहां से देख सकूँ
अपने बच्चों के पोस्ट,,,

कह नहीं पाती के अब मन नहीं लगता
किसी कविता कहानी में
कि अब मेरी जिंदगी रोशन हो रही है
दूर किसी शहर में,,
सब अच्छा है...सुंदर है....खुश है....
पर मैं ठीक नहीं हूं....
यह सच है,,,,,पर इसे गणित की तरह
हेन्स प्रूफ नहीं होने दूंगी....

मन कसमसा के कहता
सब अच्छा तो मैं भी अच्छी
और शायद फिर फोन बजने
जैसा लगने लगता
दौड़ कर फोन लपकती हूँ
शायद बच्चों का कॉल है.

लेखिका : प्रतिभा

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