उजलीउजली आज चांदनी
धीमेधीमे ढलने दो
 
महकीमहकी शबनमी बूंदें
रोज न यों उजली होती हैं
 
साथसाथ इन शहराहों में
मुझे हौलेहौले चलने दो
 
पलकों पर महके ख्वाब सजते हैं
आंखों में सतरंगी सपने पलते हैं
 
कुछ पल को घर में रुक जाओ
तुझे दीद का सदका करने दो
 
रेशमी तन पर अनूठी
नमी बिखरती है
 
तेरे चेहरे पर चंदनिया 
शर्मायी सी उतरी है
 
इन तारों को आज जमीं पर
मेरे साथसाथ ही चलने दो.
उर्मिला जैन ‘प्रिया’
 

आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें

डिजिटल

(1 साल)
USD10
सब्सक्राइब करें

डिजिटल + 24 प्रिंट मैगजीन

(1 साल)
USD79
सब्सक्राइब करें
और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...