थकीहारी चारु के चेहरे पर उस ने कभी भी तनाव की सुर्खी नहीं देखी थी, हमेशा मधुर मुसकान और निस्सीम पुलक के भाव ही देखे थे. उसे लगता, मां के उपदेशों से आहत हो कर चारु कभी भी मां का विरोध क्यों नहीं करती? विरोध न करे, प्रतिकार तो करे. एक दिन चारु को विश्वास में ले कर उस ने पूछा तो चारु के नेत्र सजल हो उठे थे. भर्राए स्वर में बोली थी, ‘हमेशा से मां ऐसी नहीं थीं, मधुकर. इस घर में रह कर मां ने जितना दुलार मुझे दिया है, शायद ही किसी दूसरे को मिला होगा. उन के ऋण से मैं कभी भी मुक्त नहीं हो सकूंगी. ‘कुछ दिनों पहले एक कार दुर्घटना में उन की दोनों टांगें जाती रहीं. उन के शरीर का निचला भाग चेतनाशून्य हो कर रह गया. हंसतीखेलती, चुस्तदुरुस्त गृहिणी का जीवन बिस्तर और डाक्टरों की दवाओं तक आ कर सिमट जाए तो उस की मनोदशा क्या होगी?

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