पार्टी के शोरगुल और लोगों की भीड़भाड़ में चारु खुद को बेहद अकेला महसूस कर रही थी. खिलाखिला सा वातावरण भी मन की बोझिल परतों को राहत नहीं दे पा रहा था. बचपन से ही अंतर्मुखी रही है वह. न कभी किसी को आमंत्रण देती और न ही कभी स्वीकार करती थी. आज भी अणिमा की बात तो टाल ही गई पर आलोक की जिद को टाल नहीं पाई थी. तभी तो उस के कहने पर चली आई थी. भीड़ से दूर छिटक कर बाहर छोटी सी बगिया में आ गई थी. बेला और गुलाब के चटकीले रंगों और महकती सुरभि के बीच छोटीछोटी रंगीन कुरसियां पड़ी थीं, फुहारों से पानी झर रहा था. बीच में छोटा सा जलाशय था.

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