लेखिका-   डा. क्षमा चतुर्वेदी 

अब सबकुछ सनी ही तो था नीरा के लिए जीने का एकमात्र सहारा. कैसे दूर कर देती उसे अपनेआप से. लेकिन अब उस के हाथ में कुछ नहीं था. निर्णय सनी का था. तीसरी बार फिर मोबाइल की घंटी बजी थी. सम झते देर नहीं लगी थी मीरा को कि फिर वही राजुल का फोन होगा. आज जैसी बेचैनी उसे कभी महसूस नहीं हुई थी. सनी भी तो अब तक आया नहीं था. यह भी अच्छा है कि उस के सामने फोन नहीं आया. मोबाइल की घंटी लगातार बजती जा रही थी. कांपते हाथों से उस ने मोबाइल उठाया-‘‘हां, तो मीरा आंटी, फिर क्या सोचा आप ने?’’ राजुल की आवाज ठहरी हुई थी.‘‘तुम फिर एक बार सोच लो,’’ मीरा ने वे ही वाक्य फिर से दोहराने चाहे थे.

Tags:
COMMENT