लाजो आज घर से भूखे पेट ही काम पर निकली थी. कल शाम बंगलों से मिले बचे-खुचे भोजन को उसने सुबह बच्चों की थाली में डाल दिया था. बच्चे कुछ ज्यादा ही भूखे थे. जरा देर में थाली सफाचट हो गयी थी. लाजो के लिए दो निवाले भी न बचे. लाजो ने लोटा भर पानी हलक में उंडेला और काम पर निकल गयी. सोचा किसी बंगले की मालकिन से कुछ मांग कर पेट भर लेगी.

लाजो एक रिहायशी कॉलोनी के करीब बसी झुग्गी-बस्ती में रहती है. पास की पांच-छह कोठियों में उसने झाड़ू-पोंछे और बर्तन मांजने का काम पकड़ रखा है. पांच बरस पहले जब उसका पति ज्यादा शराब पीने के कारण मरा था तब उसका सोनू पेट में ही था. उसके ऊपर दो बिटियां थीं. तीन बच्चों का पेट पालना इस मंहगाई में अकेली लाजो के लिए कितना मुश्किल था, यह सिर्फ वो ही जानती है. किराए की झुग्गी है. बच्चों को पास के प्राइमरी स्कूल में डाल रखा है. घर के किराए, बच्चों के कपड़े, फीस, किताबों में उसकी सारी कमाई छूमंतर हो जाती है. महीने बीत जाते हैं बच्चों को दूध-दही का स्वाद चखे. घर में खाना कभी-कभी ही बनता है. सच पूछो तो बंगलों से मिलने वाली जूठन पर ही उसका परिवार पल रहा है.

लाजो, पहली कोठी में काम के लिए घुसी तो मेमसाहब ने कहा, ‘लाजो, आज बर्तन नहीं है, साफ-सफाई के बाद ये लिस्ट लेकर सामने किराने की दुकान पर चली जाना. यह सारा सामान ले आना. साहब बात कर आये हैं. आज से नवरात्रे हैं. साराउपवास का सामान है. हाथ अच्छी तरह धो कर जाना.’

लाजो थैला लेकर किराने की दुकान पर पहुंची तो लिस्ट में लिखा सामान लाला ने निकाल कर उसके सामने रख दिय. प्लास्टिक की थैलियों में भरे मखाने, छुहारे, राजगिरी, सूखे मेवे, आलू और अरारोट के चिप्स, पापड़, देसी घी के डिब्बे और न जाने क्या-क्या, जिनके बारे में लाजो ने न कभी सुना था और न ही देखा था. उपवास में ऐसा भोजन? इसका मतलब आज उसको इस घर से बचा-खुचा रोटी-दाल नहीं मिलने वाला. उसका मन भारी हो गया. बच्चों के भूखे चेहरे आंखों के सामने नाचने लगे. उसके बाद के दो घरों में भी व्रत-पूजा के कारण लाजो को रोटी नहीं मिली. बस एक घर में चाय ही मिल पायी, जो उसके पेट की आग का दमन करने में असमर्थ रही. लाजों को अब ज्यादा चिन्ता इस बात की होने लगी कि अगर किसी घर से बचा हुआ खाना न मिला तो दोपहर को घर लौट कर वह बच्चों की थाली में क्या रखेगी?

उसका ध्यान धोती के छोर में बंधे पैसों की ओर गया. उसने खोल कर देखा. एक दस का नोट और पांच के तीन नोट के साथ चंद सिक्के ही थे. पूरा महीना सिर पर था, यह पैसे भी खर्च नहीं कर सकती थी. वह तेजी से चौथे बंगले की ओर चल दी. मल्होत्रा साहब की कोठी थी. ये लोग आर्यसमाजी थे. लाजो ने उनके वहां धार्मिक कर्मकांड कभी नहीं देखे थे. उनकी औरत तो व्रत-उपवास भी नहीं करती थी. उसको उम्मीद थी कि वहां तो जरूर रोटी मिल जाएगी.

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तीसरी गली के बंगला नं. 5 के आगे भीड़ लगी थी. लोग कई कई गुटों में खड़े बातचीत कर रहे थे. लाजो का दिल किसी अनहोनी से धड़कने लगा. बाहर खड़ी एक महिला से पूछा तो पता चला मल्होत्रा साहब नहीं रहे. आज ग्यारह बजे उनका देहावसान हो गया. अंदर फर्श पर अर्थी पड़ी थी. घर की औरतें अर्थी को घेरे विलाप कर रही थीं. लाजो एक कोने में जाकर बैठ गयी. दो घंटे बीत गये. लोगों का तांता लगा हुआ था, अर्थी उठने का नाम ही नहीं ले रही थी. लाजो को खीज लगने लगी. उसकी आंतें भूख से कुलबुला रही थीं. उसे रह-रह कर अपने बच्चे भी याद आ रहे थे. कोठरी के दरवाजे पर मां का इंतजार करते भूखे बैठे होंगे.

दोपहर 2 बजे जाकर कहीं अर्थी उठी. मल्होत्रा मेमसाहब के दारुण क्रंदन से लाजो की आंखें भी भर आयीं. स्वयं के साथ घटित घटनाक्रम चलचित्र की तरह आंखों के सामने घूम गया, जब उसके पति की मृत्यु हुई थी. स्वयं का विलाप और दोनों बेटियों का हिचकियां लेकर रोना याद कर उसका गला रुंध गया.

अर्थी जा चुकी थी. घर में मरघर सा सन्नाटा पसरा था. रिश्तेदार अपने-अपने घर लौट गये थे. मेमसाहब बच्चों सहित अपने कमरे में बंद हो गयी थीं. जवानी में सुहाग उजड़ गया. छोटे-छोटे बच्चे थे. बेचारी. लाजो ने ड्राइंगरूम ठीक करना शुरू किया. सारा फर्नीचर जो अर्थी रखने के लिए इधर-उधर खिसका दिया गया था, लाजो ने अकेले खींच-खींच कर जगह पर लगाया. फिर पूरे घर में झाड़ू पोछा किया. सारा काम निपटाते-निपटाते साढ़े तीन बज गये. उसकी भूख भी खत्म हो चुकी थी, मगर बच्चों की भूख याद करके उसकी चिन्ता बढ़ती जा रही थी. काम खत्म करके वह मल्होत्रा साहब की बूढ़ी मां के पास आकर बैठ गयी. थोड़ी देर बाद बड़ी मुश्किल से बोली, ‘अम्माजी, मैं जाऊं क्या? कोई काम हो तो छह बजे तक फिर से आ जाऊंगी. बच्चे घर में अकेले मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे. भूखे होंगे.’

अम्माजी ने हामी भरी तो वह उठी. घर जाकर पहले नहाना होगा. फिर कुछ न कुछ तो पकाना ही पड़ेगा. चाहे पन्द्रह रुपये के चावल ही जाते वक्त खरीद लेगी. वह चलने को हुई तो पीछे से अम्माजी की आवाज आयी, ‘लाजो, जरा रुकना.

लाजो पलट कर उनके पास पहुंची तो बूढ़ी औरत ने धीमे स्वर में कहा, ‘लाजो, घर से मिट्टी उठी है, सूतक लगा है. आज दोपहर का भोजन तो पक चुका था. मगर खाएगा तो कोई नहीं. रसोई में पड़ा है. सारा तू ले जा.’

लाजो की आंखें एकबारगी चमक उठीं. भागते कदमों से रसोई में पहुंची. रसोई में कढ़ाई भर कर पत्तागोभी की सब्जी, दाल, पनीर का तरी वाली सब्जी, गर्म डिब्बे में रखी रोटियां, भात, पापड़, अचार और न जाने क्या-क्या रखा था. अम्माजी ने कुछ साफ पोलिथीन की थैलियां लाजो को पकड़ा दीं. लाजो ने फटाफट सारा खाना भर लिया. वह तेजी से दरवाजे की ओर बढ़ी कि जल्दी-जल्दी पहुंच कर बच्चों का पेट भर दे कि अचानक उसके कदम ठिठक गये. यह खाना उस घर का था, जहां से अभी-अभी एक अर्थी उठी थी. सूतक लगे घर का खाना. क्या यह खाना वह अपने बच्चों को खिलाएगी? कोई अपशगुन तो न हो जाएगा? वह सन्न खड़ी हो गयी कि सूतक लगे घर का खाना लेकर जाए या न जाए? बंगलों से बचा-खुचा ले जाना अभी तक उसकी नियति थी. उसकी परिस्थितियां ही ऐसी थीं. ऐसे में सूतक लगे घर का खाना ले जाना भी तो परिस्थितियों के साथ समझौता ही था. पेट के आगे क्या शगुन, क्या अपशगुन?

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दीवार घड़ी ने चार बजने के घंटे बजाए तो उसकी तंद्रा भंग हुई. कशमकश की दलीलों और तर्कों पर स्वयं उसकी और बच्चों की भूख हावी हो चुकी थी. हाथ में खाने का बड़ा सा पैकेट संभाले वह लंबे-लंबे डग भरते हुए घर की ओर भागी जा रही थी. आज मुद्दतों बाद उसको और उसके बच्चों को कम से कम दो वक्त भरपेट और अच्छा खाना नसीब होने वाला था. उसको याद नहीं पड़ता इससे पहले उसने रोटी, सब्जी, दाल, चावल इकट्ठे कब खाये थे?

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