लेखक-कल्पना मनोरमा

सब्जी की दुकान में न जाने कहाँ से इतनी भीड़ टूट पड़ी थी .“कमला तुम झोला लेकर ज़रा मेरे आगे-आगे चलना .मैंने अपनी गृह सहायिका को बोला ही था कि एक सज्जन ने मुझे घूरते हुए कहा “मैडम सुना नहीं आपने, अपना काम अब खुद करने की आदत डाल लीजिए .क्यों भई? मैंने उनसे पूछा .“कोरोना का आदेश है बहन जी .अपना काम स्वयं करो, नहीं तो मरो .कहते हुए उन्होंने ठठा कर हँस दिया .बेवक्त की हँसी ने मेरे मन को झुंझलाहट से भर दिया था .फिर भी मैंने आहिस्ता से उनसे कहा, “हाँ भई हाँ ! जानती हूँ .“वैसे आपको बता दूँ कमला मेरे परिवार की सदस्य जैसी ही है .बचपन से मेरे साथ जो रहती आ रही  है .”

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