नए साल की पहली सुबह थी. बच्चों ने बिस्तर छोड़ने के साथ ही मुझे और आकाश को नए साल की मुबारकबाद दी. रसोई में जा कर मैं ने नववर्ष का विशेष व्यंजन बनाने के लिए सामग्री का चुनाव किया. फिर चाय ले कर मैं बाबूजी के कमरे में गई. आकाश वहीं पिता से सट कर बैठे थे. मैं ने स्टूल पर चाय रखी और आकाश से मुखातिब हो कर कहा, ‘‘चाय पी कर बाजार निकल जाइए, सब्जी वगैरह ले आइए.’’

‘‘नए साल की शुरुआत गुलामी से?’’ आकाश ने आंखें तरेर कर कहा.

मैं कुछ कहती इस से पूर्व ही बाबूजी ने कहा, ‘‘घर का काम करना खुशी की बात होती है, गुलामी की नहीं.’’चाय पी कर ज्यों ही मैं उठने को हुई, चंदनजी का स्कूटर सरसराता हुआ आ कर रुक गया.

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‘‘नए साल की बहुतबहुत बधाई हो,’’ कह कर उन्होंने आकाश, बाबूजी एवं मुझे नमस्कार किया.

बाबूजी ने कहा, ‘‘नए साल का पहला मेहमान आया है. मुंह मीठा कराओ, दुलहन.’’

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‘‘जी, बाबूजी, अभी लाई,’’ कह कर ज्यों ही मैं उठने लगी, चंदनजी ने 2 प्लास्टिक के थैले मुझे पकड़ाते हुए कहा, ‘‘एक में मिठाई है बच्चों के लिए, दूसरे में चिकन है, आकाश साहब के लिए.’’

‘‘और मेरे लिए?’’ बाबूजी ने शरारती बच्चों की तरह पूछा.

‘‘नए साल का कलैंडर और डायरी लाया हूं चाचाजी,’’ कह कर चंदनजी ने भारतीय जीवन बीमा निगम का एक खूबसूरत कलैंडर अपने थैले से निकाल कर दीवार पर टांग दिया. राजस्थानी वेशभूषा से सुसज्जित 8-10 युवतियां, परंपरागत आभूषणों से लदी नृत्य कर रही थीं. पृष्ठभूमि में चमकीली रेत और रेत पर पड़ती सूर्य की सुनहरी किरणें बहुत आकर्षक लग रही थीं. डायरी भी बेहद खूबसूरत थी.

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