कैंपस सिलैक्शन में राहुल का चयन गुजरात की एक बहुत बड़ी कैमिकल ऐंड फर्टिलाइजर फैक्टरी में हो गया था. फैक्टरी की अपनी आवासीय कालोनी थी, मनोरंजन के सभी साधन थे, शहर जाने के लिए फैक्टरी की गाडि़यां थीं, कुछ लोगों से दोस्ती भी हो गई थी, फिर भी अभी राहुल का दिल नहीं लग रहा था. लेकिन कुछ सप्ताह से आवाज में मायूसी के बजाय उत्साह झलकने लगा था.

एक शाम यह सुन कर विशाल और मानसी ने राहत की सांस ली कि अगली सुबह विशाल टूर पर जयपुर जा रहा था. राहुल ने चहक कर कहा, ‘‘सच पापा, मजा आ गया.’’

‘‘जयपुर मैं जा रहा हूं, मजा तुझे किस खुशी में आ गया, भई?’’ विशाल ने चौंक कर पूछा.

‘‘अब क्या बताऊं पापा, आप फोन कौन्फ्रैंस मोड पर लगा दीजिए ताकि मम्मी भी सुन लें.’’

‘‘फोन कौन्फ्रैंस मोड पर ही है, बोल क्या सुना रहा है मुझे,’’ मानसी ने उतावलेपन में कहा.

‘‘मेरे बौस हैं न सलिल मेहरा, उन की ससुराल है जयपुर में, उन की साली भी मेरे साथ ही ट्रेनिंग ले रही है. सो, सलिल साहब के घर पर आनाजाना हो गया है. यह सुन कर कि पापा टूर पर जयपुर जाते रहते हैं, अर्पिता दीदी, मेरा मतलब है श्रीमती मेहरा ने कहा कि अब जब जाएं तो बताना, मम्मीपापा से कहूंगी उन से मिलने को. मैं उन को आप का मोबाइल नंबर दे देता हूं. प्रेम सर्राफ आप को फोन कर लेंगे, वे मेरे बौस के ससुर हैं, पापा.’’

‘‘सीधे से कह न, मेरे होने वाले ससुर हैं…’’

‘‘आप भी न पापा…’’ और राहुल ने फोन काट दिया.

‘‘थोड़े में ही बहुत कुछ कह गए, बरखुरदार,’’ विशाल ने उसांस ले कर कहा, ‘‘मगर यह रिश्तेविश्ते की

बात मुझ से नहीं होगी. तुम भी साथ चलो, मानसी.’’

इतने शौर्ट नोटिस पर और वह भी बेटे की संभावित ससुराल जाना, मानसी कैसे मान सकती थी. टालने के स्वर में बोली, ‘‘जब लड़की ही वहां नहीं है तो मैं जा कर क्या करूंगी?’’

‘‘यह बात भी ठीक है, मैं भी

काम का बहाना बना कर टालने की कोशिश करूंगा.’’

अगली सुबह प्लेन से बाहर आते ही जैसे विशाल ने अपना मोबाइल स्विच औन किया, घंटी बजने लगी.

‘‘नमस्कार विशाल सहगल साहब, मैं कामिनी सर्राफ बोल रही हूं. राहुल ने आप को बताया होगा कि मेरे पति प्रेम सर्राफ आप को फोन करेंगे लेकिन वे तो आजकल अजमेर गए हुए हैं, सो मैं फोन कर रही हूं.’’

विशाल आवाज की मधुरता और खनक से अभिभूत हो गया.

‘‘नमस्कार जी, बड़ी खुशी हुई आप से बात कर के. कहिए, मेरे लिए क्या हुक्म है?’’

‘‘गुजारिश करने की हिमाकत कर रही हूं,’’ कामिनी की हंसी ने विशाल के मनमस्तिष्क को एक बार फिर झंकृत कर दिया, ‘‘आज की शाम मेरे साथ बरबाद कीजिए.’’

‘‘हुक्म करिए, अपनी शाम संवारने के लिए कब और कहां हाजिर होना है?’’

‘‘जब आप को फुरसत हो, आप फोन कर दीजिएगा, मैं गाड़ी भिजवा दूंगी.’’

‘‘वैसे तो आप जब कहें फुरसत निकाल सकता हूं लेकिन 6 बजे के बाद तो खाली हूं.’’

‘‘आप जब, जहां कहें, गाड़ी पहुंच जाएगी.’’

‘‘मेरे पास बैंक की गाड़ी है, आप पता बता दीजिए, मैं शाम साढ़े 7 बजे हाजिर हो जाऊंगा.’’

‘‘रेलवे औफिसर कालोनी में किसी से भी चीफ इंजीनियर का घर पूछ लीजिएगा. शाम को मिलते हैं फिर, हैव ए गुड डे,’’ कह कर कामिनी ने फोन रख दिया.

विशाल सिटपिटा गया. गुड डे का आगाज जो कामिनी की आवाज से हुआ था, यह सुनते ही कि प्रेम सर्राफ रेलवे के चीफ इंजीनियर हैं, गायब हो गया. राहुल पर गुस्सा भी आया, बताना तो चाहिए था कि किस के यहां मिलने भेज रहा है ताकि वे उस के अनुरूप कपड़े तो लाता. अभी तो औफिस में पहनने वाले कपड़े ही लाया है. वैसे अमेरिकन बैंक मैनेजर के औफिस के कपड़े भी बढि़या ही रहते हैं, फिर भी किसी खास जगह जाने और खास हस्ती से मिलने के लिए तो कुछ खास होना चाहिए. खैर, अब जो भी हैं उन्हें कड़क प्रैस करवा लेगा.

गैस्ट हाउस पहुंच कर बैग खोलते ही वह फड़क उठा. मानसी ने खास कपड़ों के अलावा, दुबई के सूखे मेवों का गिफ्ट हैंपर भी रख दिया था. कमाल की व्यवहारकुशलता थी मानसी में. बगैर कहे वक्त की नजाकत को समझ कर वक्त के साथ चलना तो उस की खासीयत थी. लेकिन आज मानसी के बारे में सोचने के बजाय उसे कामिनी सर्राफ की आवाज के बारे में सोचना अच्छा लग रहा था. शाम को फुरसत मिलने पर जब मानसी को फोन किया तो यह तो बताया कि वह सर्राफ के यहां जा रहा है लेकिन यह बताना टाल गया कि प्रेम सर्राफ शहर में नहीं हैं.

कामिनी की आवाज ही आकर्षक नहीं थी, व्यक्तित्व में भी अजीब चुंबकीय कशिश थी. पहली बार संभावित समधी से अकेले मिलने की हिचक भी नहीं थी उस में जबकि विशाल को समझ नहीं आ रहा था कि क्या बात करे.

‘‘प्रेम साहब अकसर टूर पर रहते हैं?’’ न चाहते हुए भी घिसापिटा सा सवाल पूछा.

‘‘महीने में 2-3 बार जाना पड़ ही जाता है. सुना है आप अकसर जयपुर आते रहते हैं?’’

‘‘जी हां, जयपुर का जिस तेजी से विकास हो रहा है उस के मुताबिक हम भी अपने बैंक की सेवाओं का विस्तार कर रहे हैं. उसी सिलसिले में आता रहता हूं. कभीकभी मानसी भी साथ आ जाती है.’’

‘‘अगली बार उन्हें जरूर साथ लाइएगा,’’ कह कर कामिनी ने मेज पर रखा लैपटौप उठा लिया, ‘‘आप को उस फैक्टरी की तसवीरें तो दिखा दूं जहां आप का बेटा काम करता है.’’

लैपटौप पर फैक्टरी और कालोनी की तसवीरें थीं. कुछ देर बाद तसवीरों को आगे बढ़ाते हुए कामिनी बोली, ‘‘अब अपने बेटे को भी देख लीजिए, कालोनी के क्लब की तसवीरें हैं,

यह बैडमिंटन खेल कर आता हुआ आप का बेटा है और इस के साथ मेरी छोटी बेटी निकिता और यह रहा मेरा दामाद सलिल और यह बड़ी बेटी अर्पिता.’’

‘‘अरे, परिवार के मुखिया से तो मिलवाया ही नहीं?’’

‘‘अभी साइड टेबल पर रखी तसवीर ही देख लीजिए, फिर कोई सीडी लगाऊंगी.’’

तभी एक युवक और युवती आ गए. कामिनी ने परिचय करवाया, ‘‘मेरा भतीजा राघव और इस की पत्नी ऋतु, ये दोनों कोठारी कैपिटल में काम करते हैं यानी आप की तरह ही पैसे के लेनदेन का धंधा करने वाले.’’

‘‘आजकल तो चाची, बस, देने का ही काम रह गया है,’’ राघव हंसा.

‘‘ठीक कह रहे हैं, लेने का तो दूरदूर तक पता नहीं है,’’ विशाल ने जोड़ा.

‘‘इस लेनेदेने के लेखेजोखे में उलझने से पहले बेहतर रहे, राघव, कि तुम अजयजी से उन की पसंद पूछ लो,’’ कामिनी ने कहा, ‘‘विशालजी, ऋतु और राघव लजीज व्यंजन बनाने में माहिर हैं. बस अपनी पसंद बता दीजिए.’’

कुछ ही देर में बढि़या खानेपीने का सामान आ गया और बातचीत का दिलचस्प दौर भी चल पड़ा. एक फोन आने पर कामिनी चहकी, ‘‘हां भई, विशाल यहीं पर हैं. अरे नहीं, रूहअफजा से क्यों टालूंगी? पापा नहीं हैं तो क्या हुआ, अपनी पार्टी स्पैशलिस्ट राघव और ऋतु हैं न. हां, फुरसत तो उन्हें आज भी नहीं थी लेकिन मेरे आग्रह करने पर आ गए. ऋतु से बात कर ले. ऋतु, अर्पि का फोन है.’’

ऋतु मोबाइल ले कर बाहर चली गई और राघव व विशाल बातचीत में मशगूल हो गए.

‘‘लगता है आप को अपनी शख्सीयत के बारे में पूरी जानकारी नहीं है, कामिनीजी,’’ विशाल ने एक आह भर कर कहा.

‘‘आप का साथ हो तो मटके का पानी भी रंग जमा सकता है,’’ कामिनी शोखी से मुसकराई लेकिन उस के कुछ कहने से पहले ही राघव वापस आ गया. हालांकि विदा लेने से पहले विशाल ने कई बार मजेदार शाम और खाने के लिए कामिनी का शुक्रिया अदा किया था, फिर भी अगली सुबह उस ने धन्यवाद करने के लिए कामिनी को फोन किया.

‘‘आज का क्या प्रोग्राम है?’’ कामिनी ने पूछा.

‘‘दिनभर काम और शाम को एअरपोर्ट पर कल की शाम को याद करते हुए फ्लाइट का इंतजार.’’

‘‘फ्लाइट तो आप की रात को 10 बजे है न, उस से पहले आप यहां आ जाइए, मटके के पानी से

रंग जमाने,’’ कामिनी हंसी, ‘‘आप को 9 बजे एअरपोर्ट पहुंचाने की जिम्मेदारी मेरी.’’

‘‘वह मैं खुद पहुंच जाऊंगा, आप बस इतना याद करवा दीजिएगा कि एअरपोर्ट के लिए निकलने का टाइम हो गया है.’’

उस के पहुंचने से पहले ही कामिनी ने गजलों की सीडी लगा रखी थी. संगीत तो धीमा था लेकिन समय पंख लगा कर उड़ रहा था, जल्दी ही एअरपोर्ट के लिए निकलने का समय हो गया.

‘‘फिर कब आइएगा?’’ कामिनी के स्वर में औपचारिकता नहीं थी.

‘‘जल्दी ही. अभी तो जब तक हो सकता था, आना टाला करता था लेकिन अब लगता है खुद ही टूर बनाना पड़ा करेगा.’’

‘‘देखते हैं,’’ कामिनी शोखी से मुसकराई.

‘‘शौक से. जल्द ही फोन करूंगा बताने को कि कब आ रहा हूं.’’

‘‘बताने को ही क्यों, वैसे फोन नहीं कर सकते क्या?’’ कामिनी इठलाई. आज उस ने मानसी को साथ लाने का आग्रह नहीं किया. विशाल वापस आने के लिए रात 10 बजे की फ्लाइट में बैठ गया.

मानसी उसे लेने एअरपोर्ट आई हुई थी. बातचीत के क्रम में बोली, ‘‘यह सोच कर आ गई कि घर पहुंच कर तो तुम सोने की जल्दी में होगे सो ठीक से बताओगे नहीं कि समधियाना कैसा लगा? राहुल ने बताया कि तुम आज भी वहां गए थे.’’

‘‘जाना पड़ा मानसी, राहुल के बौस की बीवी फोन पर अपनी मां को न जाने क्या कहती रहती है. सर्राफ साहब टूर पर थे मगर फिर भी बेटी की जिद पर कामिनी ने अपने भतीजे और बहू को बुला कर मेरी खातिर करवाई. आज भी उस का कहना था कि उस के दामाद ने कहा है कि मुझे रेलवे क्लब दिखाए. मेरे कहने पर कि वह मैं ने देखा हुआ है, बोली, फिर भी आ जाइए, नहीं तो मेरा दामाद कहेगा कि मैं ने ठीक से बुलाया नहीं. क्लब तो खैर नहीं गया लेकिन एअरपोर्ट आते हुए कुछ देर के लिए घर चला गया था,’’ उसे स्वयं आश्चर्य हुआ कि वह किस सफाई से झूठ बोल रहा था. कामिनी के साथ कुछ देर नहीं 2 घंटे से ज्यादा रुका था, ‘‘अरे हां, राहुल की फैक्टरी की तसवीरें देखीं. बहुत बड़ी फैक्टरी है. कालोनी, क्लब वगैरह भी अच्छा है, राहुल की सेहत भी ठीक ही लग रही थी…’’

‘‘यानी उन लोगों को राहुल की तसवीर भी भेज दी गई. तुम्हें लड़की की फोटो दिखाई?’’

‘‘खासतौर पर तो नहीं लेकिन क्लब में राहुल का बौस, बीवी और साली के साथ था. ड्राइंगरूम में भी परिवार के सभी सदस्यों की तसवीरें रखी हुई थीं.’’

‘‘ड्राइंगरूम कैसा है?’’

‘‘बढि़या. जैसा रेलवे के चीफ इंजीनियर का होना चाहिए यानी बंगला भी और बीवी भी,’’ विशाल ने कहा और फिर कुछ सोच कर बोला, ‘‘बढि़या क्या, अच्छा भी न होता तो भी राहुल की पसंद के आगे हम क्या कहते, मानसी, सो, जो है ठीक ही है.’’

‘‘ऐसी बात है तो लड़की की तसवीर तो ले आते.’’

‘‘इस तरह की, मेरा मतलब है रिश्ते वाली, कोई बात ही नहीं की कामिनीजी ने तो मैं पहल कैसे करता?’’

‘‘यह बात भी ठीक है. वैसे अकेली औरत रिश्तेदारों के सामने यह बात करती भी कैसे?’’

‘‘तभी अगली बार तुम्हें भी जयपुर साथ लाने का आग्रह कर रही थीं.’’

‘‘मैं तो जब लड़की वहां आएगी तभी जाऊंगी. तुम्हें भी बारबार नहीं जाना चाहिए, ताकि समधियाने में दोस्ताना नहीं औपचारिकता बनी रहे.’’

विशाल क्या बताता कि समधियाना बनने से पहले ही दोस्ताना बन चुका था और उसे पुख्ता करने को वह तो अकसर वहां जाया करेगा.

कामिनी से अकसर रोज ही मोबाइल पर बात होने लगी, इस से पहले कि कामिनी उस से आने का आग्रह करती या विशाल स्वयं ही जाने की जुगाड़ भिड़ाता, कामिनी ने बताया, ‘‘हम लोग बच्चों के पास जा रहे हैं, प्रेम को बेटियों की बहुत याद आ रही है, निक्की को तो ट्रेनिंग के दौरान छुट्टी मिलेगी नहीं और अर्पि उसे अकेली नहीं छोड़ सकती, सो हम ही जा रहे हैं.’’

‘‘कितने रोज को?’’

‘‘अभी तो 3 सप्ताह का प्रोग्राम है, बच्चों ने रोका तो छुट्टी बढ़ा भी

सकते हैं.’’

‘‘ठीक है, आप के लौटने के बाद ही जयपुर का टूर बनाऊंगा. फोन पर तो खैर बात होगी ही.’’

‘‘वह तो होगी ही, मगर आप भी वहां क्यों नहीं आ जाते बेटे से मिलने?’’

विशाल फड़क उठा, ‘‘क्या कमाल का आइडिया है, कामिनीजी. मानसी तो उछल पड़ेगी सुन कर लेकिन राहुल से पूछना पड़ेगा कि उस के पास हमें ठहराने की सुविधा है या नहीं?’’

‘‘उस की फिक्र मत करिए, सलिल से कह कर मैं आप के लिए कंपनी के गैस्टहाउस में बढि़या इंतजाम करवा दूंगी. आप बस पहुंचिए वहां इस सप्ताहांत तक.’’

मानसी सुन कर खुश तो बहुत हुई लेकिन शंका भी जतला दी, ‘‘राहुल तो अभी ट्रेनीज हौस्टल में रहता है, हमें कहां रखेगा?’’

‘‘उस की फिक्र मत करो, उस का बौस है न सलिल मेहरा, वह कंपनी के गैस्टहाउस में हमारी व्यवस्था करवा देगा.’’

मानसी ने चौंक कर विशाल की ओर देखा, ‘‘कभी किसी का, खासकर औफिस के लोगों और रिश्तेदारों का एहसान न लेने वाले तुम राहुल के बौस का एहसान लेने को कहोगे?’’

विशाल सिटपिटा गया, ‘‘एहसान कैसा? कंपनी का गैस्टहाउस है, सलिल का निजी बंगला नहीं, फिर भी तुम्हें पसंद नहीं है तो जाने दो,’’ विशाल ने मायूसी से कहा, ‘‘राहुल को देखने को बहुत ही दिल कर रहा है, इसीलिए कह रहा था.’’

मानसी पिघल गई, ‘‘राहुल से पूछो, वह क्या कहता है.’’

‘‘ठीक है, शाम को बात करेंगे.’’

लेकिन राहुल से पहले विशाल ने कामिनी से बात की.

‘‘अरे वाह, आप के उसूलों का ही आईना दिखा दिया मानसीजी ने आप को,’’ कामिनी हंसी.

‘‘बेशक, लेकिन मुझे आजकल सब आईनों में आप का ही अक्स नजर आता है.’’

‘‘अच्छा,’’ कामिनी ने आह भर कर कहा, ‘‘हमें तो आईने की जरूरत भी नहीं पड़ती.’’

‘‘मगर मेरा काम अब तसव्वुर से नहीं चलता, रूबरू होने की तदबीर करो कुछ.’’

‘‘इतनी अच्छी तरकीब सुझाई तो थी. प्रेम तो वहां जा कर जीभर कर सोएंगे और मैं आप को गोल्फ, बिलियर्ड या ऐसे ही और किसी खेल में जिस में मानसीजी की दिलचस्पी न हो, अपना साथ देने के लिए बुला सकती हूं.’’

‘‘मानसी को किसी खेल में दिलचस्पी नहीं है, सुबह की सैर में भी नहीं. वह तो देर तक सोने में खुश रहती है.’’

‘‘अरे, मजा आ गया फिर तो, क्योंकि वहां कालोनी में सैर करने के लिए सुनसान रास्ते, हरेभरे पेड़ों के झुरमुट और एकदम रूमानी माहौल है.’’

‘‘मगर राहुल को भी अगर मानसी की बात सही लगी तो?’’

‘‘राहुल से अभी बात ही मत करो. मैं वहां जा कर राहुल से आप लोगों को बुलाने को कहूंगी और सलिल से आप के रहने का इंतजाम करवाने को.’’

‘‘क्या कमाल का आइडिया है, आप जा कब रही हैं?’’

‘‘कल शाम को. परसों राहुल से मिलूंगी और उस से आप को बुलाने के लिए कहूंगी.’’

‘‘और उस से 1-2 रोज के बाद हम आप की खिदमत में हाजिर हो जाएंगे.’’

शाम को उस ने मानसी से कहा कि अभी राहुल से आने के बारे में कुछ न कहे, एक जरूरी काम आ गया है, 2-3 रोज में उसे पूरा करने के बाद देखेगा कि छुट्टी मिलेगी या नहीं.

तीसरे रोज वह बेसब्री से शाम का इंतजार करने लगा क्योंकि राहुल तो हमेशा शाम के बाद ही फोन करता था. राहुल ने तो नहीं लेकिन शाम को कामिनी ने फोन किया.

‘‘मेरे पीए का फोन है,’’ कह कर विशाल बाहर आ गया और धीरे से बोला, ‘‘कैसी गुजर रही है?’’

‘‘राहुल आया हुआ है,’’  दूसरी ओर से आवाज आई.

‘‘कैसा लगा मेरा बेटा…’’

उस ने बात काटी, ‘‘फिलहाल तो बेटे से ज्यादा मेरी दिलचस्पी उस के बाप को यहां बुलाने में है जिस का कोई जुगाड़ नहीं बन रहा. मेरे इस सुझाव को कि सलिल आप के ठहरने की व्यवस्था कंपनी के गैस्टहाउस में करवा दे, अर्पि ने यह कह कर काट दिया कि सलिल राहुल का बौस जरूर है लेकिन इतना बड़ा अफसर नहीं कि अपने निजी मेहमानों को कंपनी के गैस्टहाउस में ठहरा सके.

‘‘निक्की और राहुल एकदूसरे को पसंद करते हैं, यह बात अभी फैक्टरी या कालोनी में किसी को पता न चल जाए. इसलिए सलिल ने राहुल को अपने पापा के दोस्त का बेटा बताया हुआ है ताकि उस के हमारे घर आने पर कोई उंगली न उठा सके.

‘‘मैं ने मौका लपका कि पापा के दोस्त को तो वह अपने घर पर भी ठहरा सकता है तो अर्पि और निक्की भड़क गईं कि घर में जगह कहां है उन्हें ठहराने को. और फिर उन से मिलने की इतनी जल्दी क्यों? राहुल अपने पापा को आप लोगों को मिलने का कह कर यह बता ही चुका है कि उस ने अपने लिए लड़की पसंद कर ली है. सो, अब मिलनामिलाना जब सगाईशादी करनी होगी तब करना.

‘‘मैं ने राहुल से पूछा कि मम्मीपापा से मिलने को दिल नहीं करता तो उस ने कहा कि करता तो है लेकिन मिलूंगा तो ट्रेनिंग खत्म होने पर ही. मैं ने फिर मौका लपका कि वह आप लोगों को यहां बुला ले, ठहरने का इंतजाम हम करवा देंगे तो उस ने साफ मना कर दिया कि पापा को यह सुझाव दे कर डांट नहीं खाएगा. तुम और तुम्हारे उसूल.’’

विशाल ने गहरी सांस ली, ‘‘उन्हें ताक पर रख कर बैंक के काम के बहाने से अहमदाबाद आ जाता हूं. फिर वहां से राहुल को देखने के बहाने जिसे देखना है उसे भी देख लूंगा.’’

‘‘मगर जल्दी.’’

विशाल को उस की बेचैनी अच्छी लगी. मानसी किसी से फोन पर बात कर रही थी, उसे देखते ही बोली, ‘‘पापा आ गए हैं, उन से बात कर.’’

‘‘कैसे हो बेटे?’’ उस ने मुश्किल से अपने को पूछने से रोका, ‘‘अपनी ससुराल से इतनी जल्दी कैसे आ गए?’’

‘‘ठीक हूं, पापा. मम्मी कह रही थीं कि आप मुझ से मिलने आना चाह रहे हैं तो अभी 15-20 रोज तक तो मत आइए, प्लीज.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘जब रूम से फोन करूंगा तब बताऊंगा. अभी मैं बाहर हूं.’’

‘‘तो अभी फोन क्यों किया?’’ उस ने चिढ़े स्वर में पूछा.

‘‘फोन मैं ने नहीं, मम्मी ने किया था,’’ कह कर राहुल ने फोन रख दिया.

विशाल ने दांत पीसे. यह मानसी भी… मना किया था राहुल से बात मत करना पर कर ली. अब बैंक के काम के बहाने भी गया तो राहुल शायद अपने पास न आने दे. अब क्या करे?

खाना खा कर वह टहलने के लिए बाहर निकल गया. जब लौट कर आया तो मानसी ने बताया कि राहुल का फोन आया था. सलिल मेहरा के सासससुर वहां आए हुए हैं. उन की सास के इस सुझाव पर कि राहुल भी अपने मातापिता को वहां बुला ले, सलिल मेहरा भड़क गए कि इस से तो फैक्टरी में लोगों को निकिता और राहुल के रिश्ते के बारे में शक हो जाएगा और उन दोनों के लिए ट्रेनिंग पूरी करनी मुश्किल हो जाएगी. मेहरा साहब ने तो जब तक उन के सासससुर वहां हैं, राहुल को अपने घर आने से भी रोक दिया है. सो, राहुल का कहना है कि ऐसे में अगर आप लोग आ गए तो मेहरा साहब समझेंगे कि राहुल ने उन की अवज्ञा की है.

विशाल का दिल अपना सिर पीटने को किया. अगली दोपहर कामिनी का फोन आया, ‘‘मिलने की बात तो छोड़ो, यहां तो फोन करने का मौका मिल जाए तो गनीमत है. मैं सुबह सैर के बहाने निकला करूंगी और एकांत में तुम से बात किया करूंगी.’’

‘‘ठीक है, मैं भी सुबह की सैर शुरू कर देता हूं.’’

और फिर सुबह की सैर के इंतजार में रात की नींद भी हराम हो गई मगर फिर भी सारा दिन इतनी मस्ती और चुस्ती रहती थी कि मानसी कहे बगैर नहीं रह सकी, ‘‘तुम्हें सैर में मिलता आनंद देख कर मैं सोच रही हूं कि मैं भी तुम्हारे साथ चलना शुरू कर दूं.’’

‘‘लेकिन मेरे कदम से कदम मिला कर तेज चलने की प्रैक्टिस पहले अपने बगीचे में करो, फिर मेरे साथ चलना,’’ विशाल ने बड़ी सफाई से उसे टाला.

एक रोज कामिनी ने बताया कि सलिल के पापा ने उसे किसी जरूरी काम के लिए दिल्ली बुलाया है और अर्पिता भी सलिल के साथ जा रही है. सो, कल सुबह का नाश्ता बनाने के चक्कर में उसे घर पर ही रहना पड़ेगा. फोन तो जरूर करेगी लेकिन देर से.

मगर लंच से पहले ही कामिनी के बजाय सलिल का फोन आया.

‘‘अंकल, आप से अभी कुछ जरूरी बात करनी है, थोड़ा लंबा लंचब्रेक ले सकते हैं?’’

‘‘हां, मेरे साथ घर पर चलिए, साथ में लंच करेंगे और बातचीत भी. कहां से पिक करूं आप लोगों को?’’ विशाल ने उत्साह से पूछा.

‘‘घर पर आंटी के सामने नहीं, अंकल. आप से अकेले में बात करनी है.’’

‘‘ठीक है, इंडिया इंटरनैशनल सैंटर पर आ जाइए. मैं लंच के लिए टेबल बुक करवा देता हूं,’’ कह कर विशाल ने फोन रख दिया. सोचा, लगता है सलिल के पापा किसी वित्तीय संकट में हैं. सो, सलिल उस के बैंक से ऋण लेना चाह रहा होगा. कामिनी का दामाद है, सो उस के लिए कुछ तो करना ही होगा.

‘‘अचानक कैसे आना हुआ, आप के मम्मीपापा तो ठीक हैं?’’ विशाल ने पूछा.

‘‘जी हां, अभी उन से मिल कर ही आ रहे हैं. आप के साथ लंच ले कर एअरपोर्ट चले जाएंगे और 5 बजे की फ्लाइट से वापस अहमदाबाद,’’ सलिल ने बताया.

‘‘ऐसा क्या जरूरी काम था जो इतनी जल्दी पूरा हो गया और आप वापस भी जा रहे हैं?’’ विशाल ने हैरानी से पूछा.

‘‘काम मुझे नहीं अर्पि को है, अंकल, मैं तो बस इस की मुहब्बत में इस के साथ चला आया हूं.’’

‘‘ओह, आई सी, मिशन मुहब्बत…’’

‘‘आप ने बिलकुल ठीक कहा, अंकल,’’ अब तक चुप अर्पिता ने बात काटी, ‘‘मिशन मुहब्बत ही तो है यह. चलिए, खाना खाते हुए बात करते हैं.’’

‘‘राहुल और निकिता दोनों आजकल अमेरिका के विभिन्न संस्थानों में एमबीए में दाखिले के लिए आवेदन कर रहे हैं और अपनी तनख्वाह भी जोड़ रहे हैं ताकि ट्रेनिंग के बाद नौकरी न करने पर फैक्टरी को उस के एवज में बौंड का पैसा दे सकें,’’ सलिल खाना खाते हुए बोला, ‘‘ठीक भी है, भविष्य तो विदेशी डिगरी मिलने के बाद ही उज्ज्वल होगा.’’

‘‘बौंड का पैसा तो हम भी भर देंगे मगर ऐडमिशन भी तो मिलना चाहिए न,’’ विशाल ने कहा, ‘‘और फिर ये दोनों तो एक ही जगह पढ़ना चाहेंगे.’’

‘‘ऐसी कोई शर्त नहीं है, अंकल. दोनों ही को पहले तो कैरियर संवारना है फिर निजी जिंदगी के बारे में सोचना है. सो, जिसे भी जहां और जब ऐडमिशन मिल जाए, उन्हें मंजूर है.’’

‘‘और यह बहुत अच्छा रवैया है, अंकल,’’ अर्पिता ने गंभीर स्वर में कहा, ‘‘क्योंकि मुझे नहीं लगता कि जो खेल आप और मम्मी खेल रहे हैं, उस के चलते इन दोनों बेचारों की शादी हो भी सकेगी.’’

विशाल के चेहरे का रंग उड़ गया.

‘‘आप ने वह कहावत तो सुनी ही होगी, इश्क, मुश्क, खांसी, खुशी छिपाए नहीं छिपतीं. आजकल निकिता से ज्यादा इश्क की मदमस्ती में मम्मी हैं. फिलहाल तो सिवा मेरे किसी और ने ध्यान नहीं दिया और न ही मम्मी के मोबाइल की इनकमिंग या आउटगोइंग कौल्स चैक की हैं लेकिन कब तक, अंकल? इस से पहले कि पापा या मानसी आंटी को पता चले और 2 सुखी परिवार तहसनहस हो जाएं, मैं ने और सलिल ने आप से मिलना बेहतर समझा,’’ अर्पिता ने विशाल की आंखों में देखा.

‘‘बिलकुल सही किया, बच्चो,’’ विशाल ने बगैर नजरें चुराए कहा, ‘‘आप को अब कुछ और करने और कहने की जरूरत नहीं है, जो करना और कहना है मैं करूंगा. आप इत्मीनान से वापस जाओ. आप का मिशन मुहब्बत सफल रहा.’’

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