Dharma and Ethics: जिस लेखक को ‘धर्म’ शब्द के मूल अर्थ और उस के व्यापक दार्शनिक संदर्भ का ही ज्ञान न हो और जो धर्म को केवल लोगों की धार्मिक मान्यताओं तक सीमित कर दे, उस से धर्म पर गंभीर विमर्श की अपेक्षा करना कठिन है. ऐसी स्थिति में समस्या केवल अज्ञान की नहीं, बल्कि उस अज्ञान के आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत किए जाने की है.
भारतीय परंपरा में ‘धर्म’ का अर्थ महज पूजा-पद्धति, कर्मकांड या किसी विशेष धार्मिक पहचान से कहीं व्यापक है. यह कर्तव्य, नैतिकता, आचरण, न्याय और जीवन में उचितअनुचित के विवेक से जुड़ी अवधारणा है. रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ इसी विवेक को विकसित करने वाले आख्यान हैं. इन के प्रसंग हमें केवल ‘अच्छे’ और ‘बुरे’ पात्रों की कहानियां नहीं सुनाते, बल्कि परिस्थितियों, कर्तव्य, निर्णय, नैतिक दुविधाओं और उन के परिणामों के बीच अंतर करना सिखाते हैं. यही अध्ययन किसी भी बुद्धिमान व्यक्ति के चरित्र और दृष्टिकोण के निर्माण में सहायक हो सकता है.
इसी तरह पुराणों का महत्त्व केवल धार्मिक आख्यानों तक सीमित कर के देखना भी हमारी बौद्धिक विरासत को अत्यंत संकीर्ण दृष्टि से देखना है. भारतीय ज्ञान-परंपरा में साहित्य, दर्शन, खगोल, गणित, चिकित्सा, भूगोल और अनेक अन्य विषयों का आपस में गहरा संबंध रहा है. नारद पुराण जैसे ग्रंथों में गणित और ज्यामिति से संबंधित सामग्री का उल्लेख इस व्यापक ज्ञान-परंपरा की ओर संकेत करता है. इन विषयों का अकादमिक अध्ययन इसलिए नहीं रोका जाना चाहिए कि आज के कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी अपने इतिहास और उस की जटिलताओं को समझने के बजाय उस के प्रतीकों और राजनीतिक रंगों में ही उलझे रहना पसंद करते हैं.
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