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वह हमेशा ही टुकड़ों में बंटी रही. दूसरों के हिसाब से जीने के लिए मजबूर किसी अधबनी खंडित मूर्ति की तरह. जिसे कभी तो अपने मतलब के लिए तराश लिया जाता, तो कभी निर्जीव पत्थर की तरह संवेदनहीन मान उस की उपेक्षा कर दी जाती. आज फलां दुखी है तो उसे उस के दुखों पर मरहम लगाना होगा. आज फलां खुश है तो उसे अपने आंसुओं को पी कर जश्न में शामिल होना होगा. आज फलां के जीवन में झंझावात आया है तो उसे भी अपने जीवन की दिशा बदल लेनी चाहिए. आज फलां की नौकरी छूटी है तो उसे उस की मदद करनी चाहिए. खंडित मूर्ति को अपने को संवारना सुनने में भी कितना अजीब लगता है. ऐसे में अपने पर खर्च करना फुजूलखर्ची ही तो होता है.

संपूर्णता वह कभी नहीं पा पाई. मूर्ति पर जब भी मिट्टी लगाई गई या रंग किया गया, तो उसे पूरी तरह से या तो सूखने नहीं दिया या फिर कई जगह ब्रश चलाना आवश्यक ही नहीं समझा किसी भी फ्रंट पर, इसलिए चाह कर भी वह संपूर्ण नहीं हो पाई क्योंकि उस से जो कडि़यां जुड़ी थीं, उस से जो संबंध जुड़े थे, उन्होंने उस की भावनाओं को नरम घास पर चलने का मौका ही नहीं दिया. उन की भी शायद कोई गलती नहीं थी. आखिर, ढेर सारा पैसा कमाने वाली लड़की भी तो किसी एटीएम मशीन से कम नहीं होती है. फर्क इतना है कि एटीएम में कार्ड डालना होता है जबकि उस के लिए तो मजबूरियों व भावनाओं का बटन दबाना ही काफी था.

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