‘‘कोई ऐसा काम न करना जिस से हमारी बदनामी हो. तेरी दोनों बहनों की शादी भी करनी है,’’ मां ने कहा तो उस का मन पहली बार विरोध करने को आतुर हो उठा.
‘‘और मेरी? अच्छा मां, सच कहना, क्या मैं तुम्हारी बेटी नहीं हूं?’’
‘‘रिया, मां से कैसे बात कर रही है?’’ बाबूजी का स्वर गूंजा तो पलभर को उस का विरोध डगमगाया, लेकिन फिर जैसे भीतर से किसी ने हिम्मत दी. शायद, उन्हीं सतरंगी फूलों ने...
‘‘बाबूजी, आखिर क्यों मेरे साथ मां ऐसा व्यवहार करती हैं जैसे मैं...’’ उस के शब्द आंसुओं में डूबने लगे.
‘‘उस की मजबूरी है, बेटा. वह ऐसा न करे तो यह घर कैसे चले. तेरी कमाई है तो घर चल रहा है. बाकी और चार लोगों की जिंदगी बचाने के लिए वह तुझे ले कर स्वार्थी हो गई है ताकि कहीं तेरा मोह, तेरे प्रति उस की ममता उसे तुझे अपनी जिंदगी जीने देने की आजादी न दे दे.’’
उस ने मां को देखा. उन के दर्द से भीगे आंचल में उस के लिए भी ममता का सागर लहरा रहा था. फिर क्या करे वह. एक तरफ उस की उमंगें उसे दीपेश की ओर धकेल रही हैं तो दूसरी ओर मां की उस से बंधी आस उसे अपने को खंडित और अधूरा बनाए रखने के लिए मजबूर कर रही है. क्या वह कभी पूर्ण हो कर नहीं जी पाएगी? क्या उसे अपनी खुशियों के बारे में सोचने का कोई हक नहीं है? अपनी जिंदगी को रंगों से भरने की चाह क्या उसे नहीं है? लेकिन वह यह सब क्या सोचने लगी. दीपेश को ले कर इतनी आश्वस्त कैसे हो सकती है वह? उस ने तो खुल कर क्या, अप्रत्यक्ष रूप से भी कभी यह प्रदर्शित नहीं किया कि रिया को ले कर उस के मन में कोई भाव है. शायद वही अब अपनी अधूरी जिंदगी से ऊब गई है या शायद पहली बार किसी ने उस के मन के तारों को छुआ है.