सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बिहार की टीम बिहार क्रिकेट एसोसिएशन यानी बीसीए के तहत रणजी ट्रौफी और अन्य घरेलू टूर्नामैंटों में हिस्सा लेगी.

वर्ष 2000 में बिहार का विभाजन होने के बाद अलग राज्य झारखंड बना. इस के बाद से बिहार क्रिकेट का भविष्य अंधकार में चला गया. 2001 में क्रिकेट झारखंड चला गया. इस के बाद बिहार में नए संघ की दावेदारी को ले कर घमासान शुरू हो गया.

काफी जद्दोजेहद के बाद 27 सितंबर, 2008 को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई की आमसभा की बैठक हुई और उस में बिहार क्रिकेट एसोसिएशन को एसोसिएट का दर्जा मिल गया. उस समय बिहार से खेलने वाले खिलाडि़यों को उम्मीद जगी कि अब भविष्य ठीक होने वाला है पर खेल पदाधिकारियों की राजनीति के कारण इन युवा खिलाडि़यों को फिर निराश होना पड़ा.

वर्ष 2010 में बिहार क्रिकेट एसोसिएशन 2 धड़ों में बंट गया. इस लड़ाई में खिलाडि़यों का भविष्य फिर अंधकारमय हो गया और पद की लड़ाई इतनी बढ़ी कि बात हाईकोर्ट तक जा पहुंची फिर सुप्रीम कोर्ट. आखिरकार कोर्ट ने 23 सितंबर, 2015 को बिहार क्रिकेट एसोसिएशन चुनाव कराया और इस के मुखिया अब्दुल बारी सिद्दीकी बने. वर्ष 2016 में बिहार क्रिकेट एसोसिएशन को बीसीसीआई से मान्यता मिल गई. फिर लोढ़ा समिति की सिफारिशें लागू होने के बाद एक व्यक्ति एक पद के नियमों के अनुसार बीसीए के मुखिया को इस्तीफा देना पड़ा.

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से 17 वर्षों बाद अब बिहार के क्रिकेटर खुली हवा में सांस ले सकेंगे. उन्हें अब झारखंड नहीं, बल्कि अपने राज्य का प्रतिनिधित्व रणजी जैसे क्रिकेट टूर्नामैंट में करने का मौका मिलेगा. अब इशान किशन, बाबूल, शशीम राठौर, समर कादरी, केशव कुमार व शाहबाज नदीम जैसे क्रिकेटरों को संन्यास नहीं लेना पड़ेगा. बता दें कि इन खिलाडि़यों ने इसलिए असमय संन्यास लिया था क्योंकि इन के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता था.

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