सुमन बाजपेयी

‘‘हम पतिपत्नी दोनों नौकरी करते हैं. अपने दोनों बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ा रहे हैं. घर खरीदने की स्थिति नहीं हैं. बजट के मुताबिक 2 कमरों का ही घर किराए पर ले सका हूं. बच्चे ड्रांइगरूम में सो जाते हैं. हालांकि बैडरूम में अलमारियां और अन्य सामान रखने के बाद इतनी जगह नहीं बचती कि आराम से चलफिर सकें लेकिन जिंदगी ठीक से ही कट रही थी जैसे एक मध्यवर्गीय परिवार की होती है.

“इस बीच, कोरोना वायरस आ गया और सबकुछ बदल गया. शुक्र है कि हमारी नौकरियां बची रहीं. लेकिन वर्क फ्रौम होम, बच्चों की औनलाइन क्लासेस और हम सब के हर समय घर में रहने से तनाव व छोटीबड़ी हर तरह की परेशानियां बढ़ गईं. लौकडाउन खत्म हो गया है, पर सुरक्षा की दृष्टि से तो घर में अभी भी रहना ही है.

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“मैं और पति फ्रस्टेट हो चुके हैं इसलिए कि हमें साथ गुजारने के कुछ पल भी नहीं मिल पाते हैं. बच्चे सारा दिन घर पर हैं तो उन के सामने सैक्स संबंध कैसे कायम करें. प्राइवेसी नाम की चीज नहीं रह गई है. बड़ा घर होता, तो बात अलग थी. छोटा घर होने के कारण तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है,’’ यह कहना है 35 वर्षीया मधुरिमा गोयल का.

‘‘मुझे नीचे खेलना जाना है. आप मुझे पार्क क्यों ले जा रहे? मैं स्कूल जाना चाहता हूं. सारे दिन घर में क्यों रहना है? मैं कहां खेलूं? घर में तो साइकिल भी नहीं चला सकता, बौल से भी नहीं खेल सकता. आप डांटते हो कि सामान टूट जाएगा. घर भी तो इतना छोटा है.’’ 6 साल का अंकित लगातार ये सवाल अपनी मां से पूछता रहता है. उस की मां नीता कहती हैं कि हालांकि इतने महीनों से घर पर रहने और हर समय टीवी पर देखने व हमारे मुंह से सुनते रहने के कारण उसे पता है कि घर से बाहर जाने से हम क्यों उसे रोकते हैं, लेकिन उस की झुंझलाहट उस के सवालों के रूप में बाहर निकलती रहती है. बड़ा घर होता जिस में बरामदा होता तो कम से कम वह साइकिल चला सकता था.

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