Live in Relationship: भारत के सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसले ने लिव-इन रिलेशनशिप और महिलाओं की कानूनी सुरक्षा को लेकर नई बहस छेड़ दी है. न्यायालय ने कहा है कि यदि कोई लिव-इन संबंध "विवाह के समान" (relationship in the nature of marriage) है, तो ऐसी स्थिति में महिला को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498-ए तथा नए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 के तहत संरक्षण मिल सकता है.
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. के. सिंह की पीठ ने कहा कि समाज बदल रहा है और बड़ी संख्या में लोग विवाह के बजाय लिव-इन संबंधों में रह रहे हैं. ऐसे में यदि कोई लिव-इन संबंध व्यवहार में विवाह जैसा है, तो केवल औपचारिक विवाह न होने के आधार पर महिला को कानूनी सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता है. कानून का उद्देश्य महिलाओं को घरेलू क्रूरता से बचाना है.
सुनने में यह फैसला महिलाओं की सुरक्षा के पक्ष में लगता है, लेकिन इसके दूसरे पहलू पर चर्चा जरूरी है. सवाल यह है कि आखिर लोग लिव-इन रिलेशनशिप चुन ही क्यों रहे हैं? क्या इसलिए कि उन्हें सात फेरों से एलर्जी है? या इसलिए कि वे भारतीय संस्कृति मिटाना चाहते हैं? बिलकुल नहीं. असल वजह यह है कि विवाह संस्था का बोझ दिन-ब-दिन इतना भारी होता गया है कि नई पीढ़ी उसे अपने कंधों पर उठाना ही नहीं चाहती है.
भारत का संविधान दो वयस्कों को अपनी इच्छा से साथ रहने का अधिकार देता है. यह उनके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है. लेकिन मनुवाद के विष से भरा समाज आज भी चाहता है कि हर प्रेम कहानी की अंतिम मंजिल बारात, बैंड-बाजा और फिर अदालत का चक्कर ही हो.
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