Fairshare: क्या आपको पता है कि मायके की प्रोपर्टी में भी हक है, इस बारे में जब गृहशोभा ने सवाल किया, तो पोल में शामिल 50 प्रतिशत महिलाओं ने हामी भरी, वहीं 50 प्रतिशत इन कानूनों से अनजान थी. अब सवाल यह उठता है कि जब आपको अपने हक की जानकारी नहीं होगी, तो आप इसकी मांग कैसे करेंगे. कई परिवारों में बेटियों को पैतृक संपत्ति में हिस्सा देने से यह कहकर इनकार कर दिया जाता है कि वे शादीशुदा हैं, या उनके पिता की मृत्यु 2005 में कानून बदलने से पहले हो गई थी लेकिन क्या सच में इन वजहों से बेटी का पैतृक संपत्ति पर अधिकार खत्म हो जाता है?
गृहशोभा ने इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट निपुण सक्सेना से इन कानूनों के बारे में बात की -
सवाल - हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 और 2005 के संशोधन ने बेटियों के संपत्ति संबंधी अधिकारों में क्या बदलाव किए?
जवाब - हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 और साल 2005 में हुए संशोधन ने बेटियों के संपत्ति संबंधी अधिकारों में बड़ा बदलाव किया. इस विषय को समझने के लिए
हमने एडवोकेट निपुण सक्सेना से बात की. उन्होंने बताया कि 2005 के संशोधन ने बेटियों को संयुक्त हिंदू परिवार की पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर अधिकार दिया.
सवाल : 1956 के कानून में क्या था और 2005 में क्या बदला?
जवाब : हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत बेटियों को पिता की संपत्ति में उत्तराधिकारी के रूप में अधिकार मिला था लेकिन मिताक्षरा कानून के तहत संयुक्त हिंदू परिवार की कापरेंसरी पैतृक संपत्ति में बेटियों को जन्म से वही अधिकार नहीं मिलता था, जो बेटों को प्राप्त था. आसान शब्दों में कहा जा सकता है कि पैतृक संपत्ति में बेटों की तरह बेटियां जन्म से बराबर की हिस्सेदार नहीं थीं. साल 2005 में कानून में संशोधन करके इस असमानता को दूर करने की कोशिश की गई.
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