हिन्दी की दुर्दशा को अब बजाय किसी भूमिका या प्रस्तावना के इसे आंकड़ों और तथ्यों के जरिये समझने की जरूरत है कि यह पेट की भाषा क्यों नहीं बन पा रही. पिछले साल भोपाल में आयोजित हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने  हिन्दी भाषियों को हिन्दी के भविष्य को लेकर यह कहते हुए आश्वस्त किया था कि चिंता या घबराहट की कोई बात नहीं हम सबसे बड़ा बाजार है और हर कोई  हमारा मोहताज है.

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