Judiciary: संविधान सिर्फ इसलिए खतरे में नहीं है कि चुनावी प्रक्रिया में वोट चोरी के आरोप लग रहे हैं जिसे लेकर पूरा विपक्ष और सीजेपी सब मिलकर लगातार धरने प्रदर्शन और विरोध कर रहे हैं. संविधान सिर्फ इसलिए भी खतरे में नहीं है कि सरकार अपने से असहमत और विरोधियों के मुह बंद करने के लिए सरकारी एजेंसियों का बेजा और मनमाना इस्तेमाल कर रही है. बल्कि संविधान अब इसलिए ज्यादा और असल खतरे में है कि देश भर की छोटी बड़ी अदालतें अपने फैसलों में धर्म ग्रंथों का हवाला देते जाने अनजाने में भगवा गैंग की हिन्दू राष्ट्र बनाने की मुहिम में सहयोग देते संविधान की मूल भावना धर्मनिरपेक्षता पर पलीता लगा रही हैं.
वृद्धो च मातापितरौ साध्वी भार्या सुत शिशु
अपकार्यशतं कृत्वा भर्तव्या मनुब्रवीता
अर्थात
वृद्ध माता पिता सदाचारी पत्नी और छोटे बच्चे का भरण पोषण किया जाना चाहिए भले ही इसके लिए सौ अनुचित कार्य क्यों न करना पड़ें. ऐसा मनु कहते हैं.
( मनु स्मृति अध्याय 11 श्लोक 10 )
यह निर्देश किसी व्यासपीठ से किसी महामंडलेश्वर ने नहीं दिया, न ही किसी शंकराचार्य ने अपने मठ या गद्दी से दिया और न ही किसी उबड खाबड़ मैदान में गड़े तम्बू में भागवत बांचते किसी फुटपाथी बाबा ने दिया. बल्कि इसे इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि ने 29 अक्तूबर को दिए अपने एक फैसले में दिया. मामला भरण पोषण के एक मुकदमे का है जिसमे पत्नी पिंकी वर्मा फेमिली कोर्ट द्वारा तय की गई भरण पोषण राशि बढ़ाने की मांग लेकर हाई कोर्ट गई थी. इसके पहले मुकदमा कानपुर फेमिली कोर्ट में चला था.
फेमिली कोर्ट ने भरण पोषण की राशि 19 हजार रु महीना निर्धारित की थी. पिंकी इसे बढ़वाने की गरज से हाई कोर्ट गई थी. उसका पति उन्नाव जिले में इंडियन बेंक में नौकरी करता है. अदालत में दोनों के वकीलों ने तमाम तरह की वे परम्परागत दलीलें दीं जो सालों से वकील अपने मुवक्किलों के पक्ष में देते रहे हैं.
लेकिन जस्टिस प्रदीप गिरी ने मनु स्मृति के मुताबिक फैसला दिया कि पति सौरभ उर्फ़ बृज की 25 फीसदी सेलरी पत्नी को दी जाए. हालाँकि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक मुकदमे दीपा जोशी बनाम गौरव जोशी के फैसले का हवाला दिया. जिसमे कहा गया था कि जायदाद बनाने या हासिल करने से जुड़े कर्ज का भुगतान आवश्यक खर्च के समान नहीं माना जा सकता..
फैसला सुनकर दोनों वकील साहबान हैरानी से एक दूसरे का मुंह ताकते नजर आए क्योंकि अपनी जिरह में तो उन्होंने मनु स्मृति या किसी दूसरे धर्म ग्रंथ की बात ही नहीं की थी. लेकिन आइंदा करने प्रोत्साहित तो हो ही गए होंगे कि आईपीसी सहित सीआरपीसी की धारा 125 में और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम बगैरह में क्या रखा है. जब अदालत के सर ही पांडित्य सवार हो. अब तो बजाय संविधान के मनु स्मृति रटना ही वकालात का धंधा चलने की गारंटी होती जा रही है
एक और गंभीर चूक जस्टिस महोदय से यह हुई कि उन्होंने यह श्लोक ज्यों का त्यों पढ़ दिया. जिसका अर्थ है कि भरण पोषण की राशि देने अगर पति चोरी, डकैती, लूट पाट भी करे तो बात हर्ज की नहीं. क्योंकि मनु महाराज ने इस बाबत सौ अनुचित कार्य करने की छूट दी है. इससे असहमति जताती टिप्पणी जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि ने नहीं की.
हाई कोर्ट के फैसले में मनु स्मृति का हवाला क्यों, यह बात अब समझ से परे नहीं रह गई है. इन दिनों देश भर की अदालते अपने फैसलों में धर्म ग्रन्थों के श्लोक और सामग्री उद्घृत कर सरकार और भगवा गैंग की नजरों में चढ़ने की कोशिश में लगी हुई हैं. दूसरे उन्हें अपनी धार्मिक कुंठा व्यक्त करने का बेलगाम मौका भी बेलगाम होती अदालतों में मिल रहा है.
क्योंकि ऐसे फैसलों जो कानून की आड़ में धर्म ग्रंथों के मुताबिक दिए जाते हैं का किसी भी स्तर पर कोई विरोध नहीं होता. वजह अधिसंख्य लोग खुद जजों की तरह पूजा पाठी और धर्मभीरु हैं. अब हर कभी ऐसे फैसले आ रहे हैं जिनमे संविधान और कानून से ज्यादा धर्म ग्रंथों का रिफरेन्स जज देने लगे हैं.
गाय गोबर से सना एक फैसला
इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले के दो दिन पहले 27 अक्तूबर को गुजरात की कलोंल की तृतीय सत्र अदालत की न्यायाधीश बृजेश कुमारी आर राजपूत ने भी अपने एक फैसले में मनुस्मृति के साथ साथ वेदों की ऋचाओं का जिक्र करते संविधान को भुला दिया था. कोई समझ ही नहीं पा रहा कि अगर यही होना था और गौ माता की महत्ता पर प्रवचन ही सुनना थे तो मामला अदालत आया या लाया ही क्यों गया.
इससे तो बेहतर होता कि किसी पंडित, पुजारी से राय मशवरा कर आरोपियों को सोने की गाय बनबाकर ब्राह्मण को दान करने का हुक्म दे दिया जाता. जो सोने के बढ़ते दाम देख कानून की सजा से तो ज्यादा सख्त सजा ही होता. और आइन्दा कोई गौ वध की जुर्रत ही न करता.
बात साल 2024 की है जब गांधीनगर के गाँव जामला के एक घर से पुलिस ने 277 किलोग्राम गौ मांस जब्त किया था. जाहिर है गौ मांस के साथ साथ पशु वध करने बाले हथियार भी बरामद हुए थे.
मामला अदालत में गया तो उसने तीन आरोपियों वसीम, मोहम्मद रफीक और अशफाक को गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम ( संशोधित 2017) और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत दोषी पाते कठोर आजीवन कारावास और 3-3 लाख रु के जुर्माने की सजा सुनाई. यहाँ यह बात गौरतलब है कि गुजरात देश का पहला राज्य है जहाँ 2017 के संशोधन के बाद गौ हत्या के लिए अधिकतम सजा उम्र कैद की तय की गई है.
बात यही यानी क़ानूनी पहलू पर खत्म हो जाती तो और बात थी लेकिन गाय पर ऐसे ऐसे धार्मिक रिफरेन्स अपने 76 पेज के फैसले में भरे पड़े थे जिन्हें देख यह तय कर पाना मुश्किल है कि इस फैसले का स्रोत धर्म ग्रंथ हैं या कानून की किताबें जो गाय को दूसरे मवेशियों की तरह एक चौपाया ही मानती हैं.
जज साहिबा ने अपने फैसले की शुरुआत उपर बताये गए अधिनियमों से न कर वेदों की ऋचाओं और संस्कृत की शास्त्रीय सूक्तियों से की. ऋग्वेद का खासतौर से जिक्र करते हुए उन्होंने इजलास में मौजूद लोगों और खासतौर से मुसलमान आरोपियों को बताया कि सनातन धर्म के ऋग्वेद में गाय को `अधन्या` कहा गया है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है वह अमूल्य जीव जिसकी हत्या कभी नहीं की जानी चाहिए. गाय की धार्मिक और ब्रह्मांडीय स्थिति को कानून के रेपर में पेक कर पेश करते हुए उन्होंने मनुस्मृति के हवाले से बताया कि गाय एक सामान्य पशु नहीं है बल्कि वह भौतिक समृधि, धर्म और सदाचार का मुख्य आधार है.
इस फैसले की अगली लाइनें ये थीं कि महर्षि मनु ने मवेशियों की सुरक्षा और उसकी देखभाल की प्राथमिक जिम्मेदारी वैश्य वर्ग के लोगों को सौंपी थी. इससे लगे हाथ वर्ण व्यवस्था का जिक्र भी हो ही गया जिसकी इन दिनों सवर्ण हिन्दुओं में हाई डिमांड है.
अब मनु स्मृति में तो यह भी लिखा है कि ब्राह्मण को कई तरह की छूटों सहित दंड में भारी डिस्काउंट शूद्र हत्या पर भी है. और शूद्र स्त्री से ब्राह्मण अगर बलात्कार करे तो वह बलात्कार नहीं बल्कि उस का उद्धार होता है. हालाँकि थोड़ी उदारता दिखाते मनु महाराज ने 500 और 1000 पण के दंड की बात कही है. यानी ब्राह्मण द्वारा एक गैर ब्राह्मण औरत से बलात्कार की सजा जाहिर है जो उसकी इज्जत की कीमत है महज 500 या 1000 तांबे के सिक्के आंकी गई थी
प्रसंगवश जेन जी के प्रोटेस्टर कुछ गलत नहीं कर और कह रहे हैं कि हमे मनु स्मृति नहीं बल्कि भीमराव आम्बेडकर बाला संविधान चाहिए. उक्त डिस्काउंट बाला श्लोक मनु स्मृति के अध्याय 8 का 385 बा श्लोक है.
अगुप्ते क्षत्रियावैश्ये शुद्राम वा ब्राह्मणों व्रजन
शतानि पञ्च दण्ड्या स्यात सहस्त्र्म त्व्न्जयस्त्रियम .
अर्थात
यदि कोई ब्राह्मण पुरुष किसी ऐसी क्षत्रिय वैश्य या शूद्र स्त्री जिसका कोई रक्षक न हो के साथ शारीरिक संबंध बनाता है तो राजा द्वारा उस ब्राह्मण पर 500 पण का जुर्माना लगाना चाहिए. परन्तु वह ब्राह्मण किसी अन्त्यज यानी निम्न वर्ग बाली अछूत स्त्री के पास गमन करता है तो उसे 1000 पण का दंड दिया जाना चाहिए.
पौराणिक काल की भेदभाव भरी इस बेहूदी बकबास से परे वापस कलोल बाले फैसले पर चलें तो उसमे एक और कुप्रथा दहेज़ को भी हवा देती हुई बात यह थी क आर्य विवाह में गाय और बैल की जोड़ी को देना अत्यंत पवित्र माना जाता था. ( आजकल डीजल पेट्रोल से चलने बाले फोर व्हीलर दिए जाते हैं घास, भूसा चारा खाने बाले नहीं ). फैसले में हरिवंश पुराण का भी जिक्र था कि ब्रह्मा की तपस्या के दौरान जब अमृत की बूंदे पृथ्वी पर गिरीं तो दिव्य गाय कामधेनु यानी सुरभि की उत्पत्ति हुई जो प्रथ्वी पर समस्त गौ वंश की माता है.
हिन्दू मान्यताओं के हिसाब से गाय के भीतर 33 करोड़ देवी देवताओं का वास है जैसी चलताऊ अवैज्ञानिक बातें भी इस फैसले में लिखी गईं तो किसी को कोई हक नहीं कि वह अपने आप को आधुनिक, उदार तार्किक और 21 बी सदी का मानव कहे. बकौल बृजेश कुमारी आर राजपूत गाय की आखों में सूर्य और चंद्रमा, सींगों में ब्रह्मा विष्णु व महेश और उसके चारों पैर चारों वेदों का प्रतिनिधित्व करते हैं.
सीधे सीधे देखा जाए तो आरोपियों ने गाय नाम के एक पशु की हत्या कर उसका मांस निकाला था इसलिए उन्हें संबंधित अधिनियम और कानूनों के तहत सजा देकर अदालत मुल्तवी कर देनी चाहिए थी. लेकिन यह गौ रामायण बांचना दरअसल में देश के पौराणिक माहौल का प्रतिनिधित्व था जो निहायत ही गैरजरुरी और असंवैधानिक था. जजों को जज ही रहना चाहिए शंकराचार्य बनने की कोशिश नहीं करना चाहिए.
संविधान को चुनौती देता एक फैसला
अगेर एकाध दो अदालतों ने अपने फैसलों में धर्म और उसकी मान्यताओं सहित धर्म ग्रंथों का हवाला दिया होता तो उसे अपवाद करार देते अनदेखा किया जा सकता था. लेकिन लगता है पूरे कुए में ही भंग घुल गई है.
ऐसे ही एक और फैसले में मद्रास हाई कोर्ट की जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस पी मुरुगन बाली मदुरै बेंच ने कहा कि हिंदू मंदिरों में ऐसे गैर हिंदुओं को प्रवेश नहीं दिया जा सकता जो वहां के प्रमुख देवता के प्रति श्रद्धा जताने से इंकार करते हैं. बेंच ने यह भी कहा कि सदियों पुरानी परम्पराओं और रीति रिवाजों को राजनातिक चमचागिरी और चुनावी दिखावे के आगे झुकने नहीं दिया जा सकता.
यह मामला भी बड़ा दिलचस्प है जिसमें मदुरै के एक निवासी के. थंगम वेंकटेश ने जनहित याचिका दायर करते मंदिरों की पवित्रता की रक्षा करने और गैर हिंदुओं के हिन्दू मंदिरों में अनियंत्रित प्रवेश को रोकने की मांग की थी. इस दक्षिणी सनातनी ने तमिलनाडु मंदिर प्रवेश प्राधिकरण अधिनियम 1947 के साथ साथ कुछ धार्मिक मान्यताओं और परम्पराओ का हवाला दिया था. इनमे प्रमुख था आगम शास्त्र ( वे ग्रंथ जो कर्मकांड संबंधी निदेश देते हैं) के मुताबिक संचालित होने बाले मंदिरों की पवित्रता और सदियों पुराने रीति रिवाजों को अक्षुण्ण रखा जाए. सोचना लाजिमी है कि यह मांग तो मंदिर में विराजे सर्वज्ञ और सर्व शक्तिमान भगवानों से करनी चाहिए थी
बकौल के. थंगम वेंकटेश बिना श्रद्धा के या महज पिकनिक मनाने के मकसद से आते गैर हिंदुओ का इन पवित्र स्थलों में प्रवेश करना हिन्दू भक्तों की धार्मिक भावनाओ और संवैधानिक भावनाओ को आहत करता है. बेंच ने इससे इत्तफाक रखा तो सवाल उठना स्वभाविक बात है. क्योंकि इसमें गैर हिंदुओ को लिखित घोषणा पत्र या वचन पत्र भरने की वाध्यता रखी गई है.
मतलब साफ़ है कि आप क्रास पहनकर मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते, मुसलमानी टोपी ( जो कि टीवीके के एक विधायक बदरुद्दीन मुस्तफा पहनकर मंदिर में चले गए थे ) और पगड़ीधारी सिख भी प्रवेश नहीं कर सकते. क्योंकि वे दूसरे धर्म के प्रतीक चिन्ह धारण किए हुए रहते हैं. जिनसे हिन्दू धर्म भ्रष्ट होता है. दूसरे मंदिर में प्रवेश करने बाले को लिखित में यह पुष्टि भी करनी होगी कि वह मंदिर के अधिष्ठाता देवता में पूरी आस्था और श्रद्धा रखता है और हिंदू धर्म की परम्पराओ रीति रिवाजों और मंदिर के नियमों का पूरी तरह पालन करेगा.
इस फैसले पर तमिलनाडु में व्यापक प्रतिक्रिया हुई और प्रगतिशील व तर्कवादियों ने इसे सरासर धार्मिक स्वतंत्रता देने बाले संविधान के अनुच्छेद 25 और भेदभाव का निषेध करने बाले अनुच्छेद 15 का उल्लंघन बताया. गौरतलब है कि तमिलनाडु के अधिकतर मंदिर सरकारी बंदोबस्ती विभाग के तहत आते हैं. इसलिए उन्हें पूरी तरह निजी मानकर सार्वजनिक प्रवेश को प्रतिबंधित करना संवैधानिक भावना के विपरीत है.
अलावा इसके इतिहास के रिसर्चर्स और दुनिया भर के जो पर्यटक दक्षिण भारत के मंदिरों की स्थापत्य कला को देखने और समझने आते हैं उनसे भी वचन पत्र भरवाना एक बेहूदी हास्यास्पद और उन्हें अध्ययन से वंचित रखने बाली बात होगी. यह फैसला किसी आस्था की रक्षा के लिए नहीं बल्कि हिन्दू राष्ट्र बनाने की मुहिम में अदालती सहयोग देने बाला नहीं तो क्या है.
और भी हैं फैसले
भरण पोषण के एक और मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी मनु स्मृति के अध्याय 8 श्लोक 389 का हवाला देते बीती 13 जनबरी को कहा था कि इसके मुताबिक कोई भी माँ, कोई भी पिता और कोई भी बेटा त्यागने लायक नहीं हैं जो व्यक्ति इन ( निर्दोष ) रिश्तेदारों को छोड़ देता है उस पर राजा को 600 पण का जुर्माना लगाना चाहिए. बकौल सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एसवीएन भट्टी और पंकज मिथल यह श्लोक परिवार के मुखिया की महिला सदस्यों की मदद करने की जिम्मेदारी पर जोर देता है.
यह तो अब हर कोई जानने लगा है कि मनु स्मृति में तो जाति व्यवस्था को बनाए रखने के नियम भी हैं और महिलाओं को जायदाद न रखने के निर्देश के अलावा नपुंसक और कोढ़ी पति की सेवा का भी आदेश है.और तो और स्त्री विरोधी यह स्मृति यह भी कहती है कि जब महिला का मासिक धर्म पूरी तरह समाप्त हो जाता है तब वह स्नान करने के बाद ही धार्मिक और सामाजिक कार्यों के लिए शुद्ध है ( अध्याय 5 श्लोक 66 )
पुरुषों को भी सावधान करते और डराते कहा गया है कि वे मासिक धर्म के दिनों में पत्नी के साथ एक बिस्तर पर न सोएं और न ही शारीरिक संबंध बनाएं. क्योंकि ऐसा करने से पुरुष की बुद्धि, तेज, बल, नेत्रों की ज्योति और आयु नष्ट हो जाती है ( अध्याय 4 श्लोक 40 व 41 ).
ऐसे बेहूदे और महज औरतों को जलील करने के मकसद से गढ़े गए धर्म ग्रंथ का हवाला देना भले ही संदर्भ प्रसंग कुछ भी हो क्या मेसेज समाज में देता है. फैसला पूरी तरह हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत ही लिखा और सुनाया जाना चाहिए. उसमे मनु स्मृति का तड़का लगाने से क्या साबित होता है. लगता तो ऐसा है कि कानून से अच्छी तो मनु स्मृति है हमे उसका पालन करना चाहिए.
मनु स्मृति को संविधान से ऊपर रखने की अदालतों की मंशा के सैकड़ों फैसलों में से एक और सुप्रीम कोर्ट का ही है. जिसमें उसने 4 अगस्त 2025 को दिए एक फैसले ( भनेई प्रसाद उर्फ़ राजू बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य ) में मनुस्मृति का चलताऊ श्लोक `यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता .......`का हवाला दिया था .हिमाचल प्रदेश का यह मामला गंभीर और सामाजिक लिहाज से बेहद संवेदनशील था. जिसमे एक पिता पर अपनी ही दस वर्षीय बेटी के लगातार यौन शोषण का आरोप था. तमाम सबूत आरोपी के खिलाफ थे जिनके चलते ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को उम्र कैद का सजा सुनाई थी जो हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी बरक़रार रखी.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उक्त श्लोक का उल्लेख कर यही साबित किया कि मनुस्मृति संविधान से ऊपर है. सरिता लगातार अपने विचारोत्तेजक और तार्किक लेखों में मनुस्मृति की हकीकत उजागर करती रही है. यह सिलसिला अभी भी जारी है और आगे भी रहेगा, जिसने प्रबुद्ध वर्ग के सोचने के तौर तरीकों और मानसिकता को सही दिशा में मोड़ने में कामयाबी हासिल की है.
जेन जी प्रोटेस्ट के बाद यह हकीकत खूब सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी कि मनुस्मृति मूल रूप से दलित और स्त्री विरोधी ग्रंथ है जिसका इकलौता मकसद ब्राह्मण राज स्थापित करना है फिर उसका हवाला क्यों.
मनुस्मृति बनाम संविधान
आज देश के जो हालात हैं वे धार्मिक राज्य को थोपने की कोशिश के विरोध से उपजें हैं राजनीति और तमाम तरह के प्रोटेस्ट तो विपक्ष और जेन जी को अपनी बात कहने की आड़ और बहाना हैं. अतीत में भी यही हुआ था जब संविधान और हिन्दू कोड बिल का ड्राफ्ट आम हुआ था तब आरएसएस, हिन्दूमहासभा और रामराज्य परिषद सहित तमाम साधु संतों ने सड़कों पर आते विरोध किया था कि इसमें भारतीय ( दरअसल में हिन्दू ) तो कुछ है ही नहीं.
हिंदू वादियों के इस फसाद और ड्रामे पर सरिता के सितम्बर ( प्रथम 2024 ) के अंक में एक रिपोर्ट `कानूनों से 1947 के बाद बदलाव की हवा` शीर्षक से विस्तार से प्रकशित की गई थी. जिसे पाठकों की मांग पर श्रृंखलाबद्ध तरीके से भी प्रकाशित किया गया था पाठक यह रिपोर्ट सरिता की वेब साईट पर भी पढ़ सकते हैं
अब नया और और चिंताजनक सवाल और मसला अदालतों का धार्मिकीकरण है. आम लोगों की आखिरी आस न्यायपालिका से ही होती है जिसके बारे में वे मानते और समझते हैं कि वहां धर्म, जाति, लिंग और दूसरे भेदभावों से मुक्त न्याय मिलेगा. यह आस और विश्वास टूटे इसके पहले ही जजों को समझ लेना चाहिए कि अपने फैसलों में धर्मग्रंथों को जिक्र कर वे उन्हें तोड़ने का ही अपराध कर रहे हैं.
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