देश ही नहीं बल्कि दुनियाभर की चुनी सरकारें उन जागरूक लोगों से डरती हैं जो दूसरों को जगाते हैं और सरकार के गलत कामों का निडर हो कर विरोध भी करते हैं. ये लोग शोषण और असमानता का विरोध करने का कोई मौका नहीं चूकते. लिहाजा, सरकार इन का मुंह बंद करने के लिए कानूनों को

 हथियार बनाने लगती है. यही स्टैन स्वामी के साथ हुआ.

देशभर की जेलों से पिछले साल कोरोना की कहर के दौरान कैदियों को पैरोल पर रिहा किया गया था. ऐसा सुप्रीम कोर्ट के आदेश के चलते इसलिए किया गया था ताकि जेलों में कोरोना न फैले क्योंकि देश की अधिकतर जेलों में क्षमता से ज्यादा कैदी ठुंसे हुए थे. नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो की साल 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक, देश की जेलों में 4.78 लाख कैदी थे जो जेलों की क्षमता से 18.5 फीसदी ज्यादा थे. दिलचस्प बात यह है कि इन में से भी 69.05 फीसदी कैदी विचाराधीन थे.

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किस तरह के अपराधियों को पैरोल पर छोड़ा जाना है, यह राज्य सरकारों के ऊपर छोड़ दिया गया था जिन्होंने इस के लिए पावर्ड कमेटियां बनाई थीं. दूसरी लहर के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फिर एक आदेश में कुछ निर्देश दिए थे.

थोड़े दिनों के लिए ही सही मिली इस आजादी पर कई छोटेबड़े मुजरिमों ने दीवाली मनाई थी. पैरोल पर कुछ ऐसे कैदियों को भी रिहा कर दिया गया था जो दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराधों की सजा काट रहे थे. इस पर नागरिक उपभोक्ता मंच ने एतराज दर्ज कराते जबलपुर हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर दी जिस में कहा गया कि ‘महिलाओं और नाबालिग बच्चियों के साथ दुष्कर्म करने और हार्डकोर्ड अपराधियों को कोरोनाकाल में पैरोल का फायदा नहीं मिलना चाहिए.’ यह मामला अभी अदालत में चल रहा है.

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