Religious Subsidy: कांवड़ यात्रा की तैयारी शुरू होने वाली है. इस बार भी दिल्ली की बीजेपी सरकार शिविरों को विशेष सहायता देगी. पेपर लीक और सीबीएसई के रवैए से परेशान युवाओं पर लाठीचार्ज की जा रही है, सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं, शिक्षा को व्यवस्थित तरीके से बरबाद किया जा रहा है, उच्च शिक्षा पर कोई ध्यान नहीं है, स्टूडैंट्स को स्कौलरशिप नहीं दी जा रही है लेकिन कांवड़ यात्रा के लिए विशेष सरकारी सहायता दी जा रही है. क्या यह देश की युवा पीढ़ी को शिक्षा से दूर कर अंधविश्वास की ओर धकेलने की क़वायद नहीं है? किसी ऐसे धार्मिक कार्यक्रम पर सरकारी सुरक्षा या इंतजाम की बात तो ठीक है क्योंकि धर्म के अंधे सब से ज्यादा उत्पात मचाते हैं लेकिन शिविरों को जनता के टैक्स के पैसों से सहायता देना उचित नहीं है?

धार्मिक कार्यक्रमों पर टैक्सपेयर का पैसा खर्च नहीं होना चाहिए. कांवड़ शिविरों को विशेष अनुदान, फ्री बिजली, डायरैक्ट फंड ट्रांसफर जैसी सहायता बंद होनी चाहिए क्योंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. संविधान कहता है कि सरकार किसी भी धर्म को विशेष सहायता नहीं देगी. टैक्स का पैसा जो हिंदू, मुसलिम, सिख, ईसाई सभी देते हैं, किसी एक धर्म को बढ़ावा देने में नहीं लगना चाहिए. अगर कांवड़ शिविरों को 10 लाख रुपए तक अनुदान और फ्री बिजली दी जाएगी तो फिर दूसरे धर्मों के कार्यक्रमों पर भी मांग उठेगी. ऐसे में जब पेपर लीक हो रहे हैं, युवा बेरोजगार हैं, अस्पतालों में सुविधा नहीं है तब धार्मिक शिविरों पर अनावश्यक खर्च अनुचित है.

केंद्र सरकार ने 2018 में हज सब्सिडी पूरी तरह बंद कर दी थी. सुप्रीम कोर्ट के 2012 के आदेश के बाद इसे चरणबद्ध तरीके से खत्म किया गया. अब हज जाने वाले तीर्थयात्री खुद पूरा खर्च उठाते हैं लेकिन कांवड़ यात्रा पर विशेष सहायता अभी भी कई राज्यों में जारी है जिस में शिविरों को अनुदान, बिजली मुफ्त और सुरक्षा पर भारी सरकारी खर्च किया जाता है.

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