अयोध्या भले ही मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मिजोरम और तेलंगाना में स्थित न हो पर ‘अयोध्या का राम मंदिर’ इन चुनावों में बड़ा मुद्दा बनेगा. इन चुनावों की सफलता से राजनीतिक दलों को अंदाजा लगेगा कि ‘राम मंदिर’ के नाम पर राजनीति कितनी सफल होगी.

2019 के लोकसभा चुनावों के पहले 5 राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मिजोरम और तेलंगाना के चुनाव को सत्ता का सेमीफाइनल कहा जा रहा है. इन राज्यों में मिली जीत और हार से यूपीए और एनडीए का मनोबल बढ़ेगा और घटेगा. सहयोगी दलों की संख्या और गठबंधनों के सूत्र इन परिणामों से जुड़ेंगे और खुलेंगे.

धर्म के नाम पर राजनीति अब दोनों ही पक्ष कर रहे हैं. अंतर केवल इतना है कि भाजपा पर धर्म का कट्टरवाद हावी है तो कांग्रेस और सहयोगी दलों पर ‘नर्म हिन्दुत्व’ छाया हुआ है. देश में वैचारिक रूप से धर्म का विरोध करने वाले नेताओं और उनके दलो की संख्या शून्य के बराबर हो गई है. कांग्रेस तो  हमेशा से की मध्यम मार्गी पार्टी थी अब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मानसरोवर जैसे तमाम मंदिर का भ्रमण दर्शन कर जता दिया कि वह ‘नर्म हिन्दुत्व’ की छाया में आगे चलेंगे.

समाजवादी और अंबेडकरवादी विचारधरा के लोग भी लंबा तिलक लगा कर धर्म का चोला पहन चुके हैं. वामपंथी नेता तक लुके छिपे तौर पर पूजापाठ में यकीन करने लगे हैं खुल कर वह अब मंदिर का विरोध नहीं करते हैं. ऐसे में चुनाव की नजर से राममंदिर महत्वपूर्ण हो जाता है.

राममंदिर-बाबरी मस्जिद जमीनी विवाद विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई जनवरी 2019 तक के लिये टाल दी है. इससे यह साफ हो गया है कि अब इस विवाद में 2019 के लोकसभा चुनावों के पहले फैसला आना मुश्किल है. ऐसे में राम मंदिर मुद्दे को लोक सभा चुनाव में मुद्दा तभी बनाया जायेगा जब 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में इस मुद्दे का कोई लाभ मिलेगा.

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