INDIA Alliance March: दिल्ली में 6 अक्टूबर 2026 को राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने इसी लोकतांत्रिक साहस की मिसाल पेश की. चुनाव प्रणाली में कथित अनियमितताओं के खिलाफ इंडिया गठबंधन के मार्च को जिस तरह पुलिस ने रोका, उसके बाद दोनों नेता सड़क से लेकर आकाशवाणी भवन परिसर तक धरने पर बैठे रहे. लगभग दस घंटे तक वे डटे रहे और अंततः अन्धेरा हो जाने के बाद पुलिस ने उन्हें बलपूर्वक हिरासत में लिया. जब तक रौशनी रही पुलिस की हिम्मत नहीं पड़ी कि वे दोनों को हाथ भी लगा सके.
यह तस्वीर महज एक राजनीतिक प्रदर्शन की तस्वीर नहीं थी. यह उस सवाल की तस्वीर थी जो आज भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़ा है - क्या आम नागरिक के वोट की ताकत सुरक्षित है?
राहुल गांधी ने जिस बेबाकी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए, उससे सत्ता के गलियारों में असहजता तो पैदा हुई ही, साथ ही विपक्षी राजनीति को एक स्पष्ट संदेश जरूर मिला कि डरकर राजनीति नहीं की जा सकती है.
राहुल गांधी की राजनीति को लेकर मतभेद हो सकते हैं. उनके हर बयान से सहमत होना जरूरी नहीं है. लेकिन लोकतंत्र में किसी नेता के साहस का मूल्यांकन उसकी लोकप्रियता से नहीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि वह जनता के हितों से कितना जुड़ा हुआ है और असहमति के क्षण में कितना खड़ा रहता है.
मंगलवार को राहुल गांधी जिस हिम्मत से खड़े रहे, भारतीय नेताओं में वह ताकत बिरले ही दिखती है. पुलिस ने रास्ता रोका तो वे सड़क पर बैठ गए. सड़क से उठाया गया तो आकाशवाणी भवन परिसर में धरने पर बैठ गए. धरना खत्म करने का दबाव आया तो पीछे नहीं हटे. और जब अंततः पुलिस ने बलपूर्वक हिरासत में लिया, तब भी उनका विरोध समाप्त नहीं हुआ. यही राजनीतिक साहस है.
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