Marginalized Leaders : राजनीति हर किसी के बस की बात नहीं खासतौर से उन लोगों के लिए जिन के लिए यह फुल टाइम प्रोफैशन नहीं रहा ऐसे लोग जो कोई और व्यवसाय या कामधंधा छोड़ कर राजनीति में आते हैं उन्हें न तो जनता ज्यादा वक्त तक गंभीरता से लेती और न ही पार्टी आलाकमान जिस की मेहरबानी से ये राजनीति में चलते हैं ऐसे ही कुछ नेताओं की मौजूदा हालत पर गौर करें.

“जिस का काम उसी को साजे और करे तो ठेंगा बाजे” इस कहावत का सीधा सा मतलब यह है कि हर व्यक्ति अपने काम में माहिर होता है कोई और इस काम को करे तो राजनीति के लिहाज से उस का हश्र वही हो सकता है जो कई नेताओं का हुआ. जिन के अब दूरदूर तक कहीं अतेपते नहीं. ये नेता जो कल तक खूब चमकतेदमकते थे अब क्या कर रहे हैं किस हाल में हैं यह किसी को नहीं मालूम. सार यह कि राजनीति हर किसी के बस की बात नहीं, उन लोगों के बस की तो कतई नहीं जिन का मूल पेशा यह नहीं था और जिन का था वे प्रतिवद्धता से कर नहीं पाए.

हाशिए पर पड़े नेताओं में से अधिकतर बेमन से अपने मूल व्यवसाय की तरफ लौट रहे हैं लेकिन वहां भी इन्हें उम्मीद के मुताबिक या पहले की तरह रेस्पांस नहीं मिल रहा है. दो टूक कहें तो ये अब कहीं के नहीं रहे.

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बीजेपी नेत्री स्मृति ईरानी (फाइल फोटो)

हाशिए पर पड़े दिग्गज नेताओं की लिस्ट में एक बहुत बड़ा न सही लेकिन अहम नाम स्नातक फर्स्ट ईयर के बाद पढ़ाई छोड़ देने वाली स्मृति ईरानी का है. टीवी ऐक्ट्रैस रहीं स्मृति का स्टूडियो से ले कर संसद तक का सफर किसी धारावाहिक सरीखा ही ड्रामैटिक था. सुंदर सलोनी तीखे नैन नक्श वाली महत्वाकांक्षी इस युवती ने कैरियर की शुरुआत छोटेमोटे मौडलिंग शूट से की थी. इस के पहले वे मेकडौन्ल्स में वेट्रैस हुआ करती थीं, ग्राहकों की टेबल पर पिज्जा भी वे सर्व करती थीं और टेबल पर पोंछा लगाने में भी उन्हें कोई शर्म यह झिझक महसूस नहीं होती थी. एक सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लेने उन्होंने अपने पिता से 1.5 लाख रुपए उधार लिए थे जिन्हें चुकता करने वे इस तरह के काम करती थीं.

एकता कपूर के 2000 के लोकप्रिय टीवी सीरियल ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ से घरघर में छा जाने वाली स्मृति ने साल 2003 में भाजपा ज्वाइन की थी. इस सीरियल से उन की पहचान एक परंपरागत हिंदू स्त्री की बनी थी जो माथे पर बड़ी बिंदी लगाती है, सलीके से सर ढके साड़ी पहनती है और तुलसी पूजा सहित तमाम हिंदू धार्मिक मान्यताओं और कर्मकांडों मसलन पूजापाठ वगैरह का पालन करती है.

लेकिन धार्मिक बहू के चुनावी रोल को जनता ने नकार दिया था. स्मृति ईरानी ने साल 2004 का लोकसभा चुनाव दिल्ली की चांदनी चौक सीट से दिग्गज कांग्रेसी कपिल सिब्बल के खिलाफ लड़ा था और हार गई थीं. अकेली स्मृति ही नहीं बल्कि समूची भाजपा दुर्गति का शिकार इस चुनाव में हुई थी.

अधिकतर लोग इस गलतफहमी का शिकार हैं कि स्मृति को मोदीशाह राजनीति में लाए थे लेकिन इस बात को हर कोई भूल चुका है कि 2004 की हार के बाद स्मृति नरेंद्र मोदी को गोधरा कांड का जिम्मेदार मानते उन के इस्तीफे की मांग को ले कर उन के खिलाफ आमरण अनशन पर बैठ गई थी. हालांकि कुछ ही घंटों में भाजपा हाई कमान ने उन्हें मैनेज कर लिया था जिस के चलते उन्होंने अपना बयान और विरोध दोनों वापस ले लिए थे. दरअसल में उन्हें राजनीति में लाने का श्रेय अपने दौर के धाकड़ भाजपाई दिग्गज प्रमोद महाजन को जाता है जिन की संदिग्ध हालातों में 2006 में मौत हो गई थी. इस के बाद स्मृति की गिनती अटल खेमे में शुमार होने लगी थी.

यह भाजपा का संक्रमण काल था क्योंकि अटल युग ढलान पर था और पार्टी में नए चेहरों का टोटा था. खासतौर से महिला नेताओं के मामले में उस के पास उमा भारती और सुषमा स्वराज के अलावा कोई और जमीनी लोकप्रिय चेहरा नहीं था. इस वक्त तक क्योंकि सास भी …..की तुलसी विरानी शहरी मध्यमवर्गीय परिवारों में दैनिक चर्चा का विषय बन चुकी थी. ऐसे में पार्टी संगठन ने स्मृति की लोकप्रियता को भुनाने न केवल पार्टी में ले लिया बल्कि उन्हें राज्यसभा में भी भेज दिया.

यह मनमोहन सरकार का दौर था इसलिए स्मृति जैसे पैराशूट नेताओं की भूमिका बेहद सिमट गई थी. लेकिन साल 2014 का लोकसभा चुनाव पार्टी ने उन्हें अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ लड़ाया तो वे फिर से चर्चा में आ गई थीं. हालांकि यह चुनाव उम्मीद के मुताबिक वे हार गईं थीं इस के बाद भी मोदी ने उन्हें इनाम या बख्शीस कुछ भी कह लें से नवाजते अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर उन का कद बढ़ाया था. इस के पहले न्यूज चैनल्स पर बतौर भाजपाई प्रवक्ता उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बना ली थी.

2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी शाह की जोड़ी ने फिर से स्मृति पर दांव खेला और इस बार यह दांव कामयाब रहा. उम्मीदों और अनुमानों को झुठलाते हुए स्मृति तकरीबन 55 हजार वोटों से जीतीं तो भगवा गैंग ने उन्हें हाथोंहाथ लेते फिर केंद्रीय मंत्री बनाया. इस हार से राहुल गांधी का कद भले ही छोटा न हुआ हो लेकिन स्मृति का इतना जरूर बढ़ गया था कि उन की गिनती भाजपा के टौप 10 नेताओं में होने लगी थी.

लेकिन व हैसियत पहले मानव संसाधन फिर सूचना एवं प्रसारण और इस के बाद कपड़ा मंत्री बनी स्मृति कुछ खास नहीं कर पाई. उलटेसुलटे बयान देती रहीं. स्मृति की सब से ज्यादा भद्द उस वक्त पिटी थी जब उन्होंने तथ्यात्मक खामी यानी गलत रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को सजा देने वाला सर्कुलर जारी किया था. यह कितनी अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक हरकत थी इस का अंदाजा चंद घंटों की प्रतिक्रिया से ही सरकार को लग गया था कि कई मीडिया समूह जिन में भक्त भी शामिल हैं इस का जोरदार विरोध करने की तयारी में हैं लिहाजा पीएमओ के दखल के चलते उस ने तुरंत ही इसे वापस ले लिया था.

इस से पहले उन की भी डिग्री विवादों से घिर गई थी. दरअसल में स्मृति ने पहले चुनाव के शपथ पत्र में दिल्ली यूनिवर्सिटी से खुद के आर्ट ग्रैजुएट होने की बात कही थी. लेकिन 2013 के शपथ पत्र में उन्होंने खुद को दिल्ली के ही स्कूल औफ ओपन लर्निंग से बीकाम पार्ट वन की परीक्षा पास करने की जानकारी दी थी. उन्होंने हलफनामे में साफसाफ लिखा था कि वे ग्रैजुएट नहीं हैं क्योंकि 3 साल का डिग्री कोर्स कम्प्लीट नहीं किया है.

2024 का लोकसभा चुनाव स्मृति ईरानी ने फिर से अमेठी से लड़ा लेकिन इस बार कांग्रेस की चालाकी का शिकार हो गईं जिसने अपने एक मामूली कार्यकर्त्ता किशोरीलाल वर्मा को टिकट दे दिया. इस के पीछे कांग्रेसी तर्क यह था कि अब चुनाव लेवल का होगा यानी स्मृति ईरानी की हैसियत इतनी गिरी हुई आंकी गई कि राहुल का उन के खिलाफ लड़ना जिल्लत और जलालत की बात होती लिहाजा उन के लेवल का उम्मीदवार उतार दिया.

यह चुनाव स्मृति 1 लाख 67 हजार से भी ज्यादा वोटों से हारीं तो फिर किसी ने उन की सुध नहीं ली. क्योंकि वैसे भी भाजपा 234 सीटें देख सकते में आ गई थी खासतौर से उत्तरप्रदेश में तो उसे लेने के देने पड़ गए थे. वेटर से एक्टर और लीडर तक का सफर तय करने वाली स्मृति अब फिर से क्योंकि सास भी …से वापसी कर रही हैं लेकिन अब किसी की दिलचस्पी उन में या इस सीरियल में नहीं रह गई है.

बीजेपी नेत्री साध्वी उमा भारती (फाइल फोटो)

मोदी की अनदेखी का शिकार उमा

दैनिक भजनआरती करने वालों को अकसर यह दोहा गाते सुना जा सकता है जा पर कृपा राम की होय, ता पर कृपा करे हर कोय. इस दोहे में राम की जगह मोदी नाम भर दिया जाए तो स्मृति ईरानी सहित भाजपा के दर्जन भर से ज्यादा नेताओं की मौजूदा हालत देख कहा जा सकता है कि जिस पर मोदी की कृपा हो उस पर हर कोई कृपा करता है यानी जो मोदी की अनदेखी का शिकार हो गया उसे कोई नहीं पूछता स्मृति ईरानी और उन के बाद उमा भारती इस का अपवाद नहीं हैं.

स्मृति ईरानी की तरह ही केंद्रीय मंत्री और मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री रही साध्वी उमा भारती भी अपने मूल व्यवसाय धर्म और आध्यात्म की तरफ वापस लौटती दिखाई दे रही हैं. हालांकि अब बाजार तरहतरह के नएनवेले कथाकारों और प्रवचनकारियों से भरा पड़ा है इसलिए यह सोचने की कोई वजह नहीं कि अब से कोई 45 – 50 साल पहले की तरह उमा पांडाल में बैठ कर गीतारामायण या भागवत बांचेंगी. लेकिन धर्म और आध्यात्म का मोह उन की बातों से साफ झलकता है. जाहिर है इसलिए कि वे भी राजनीति के मैदान से बाहर की जा चुकी हैं.

उमा के साथ भी दिक्कत यह है कि वे भी बहुत ज्यादा शिक्षित नहीं हैं. इस के बाद भी वे चमत्कारिक हिंदुत्व की बात नहीं करतीं. वैचारिक हिंदुत्व (जो दरअसल में एक परिकल्पना है) की भी अलिफ बे भी वे नहीं जानती. जो हिंदुत्व उन की बातों से झलकता है वह आरएसएस के हिंदुत्व और राष्ट्रवाद से काफी हद तक मेल खाता है कि देश में कुछ और हो न हो ब्राह्मण पुजते रहना चाहिए, मंदिरों का विकास होते रहना चाहिए, तीर्थयात्राएं फलतीफूलती रहनी चाहिए.

इस में कोई शक नहीं कि एक वक्त में भाजपा और आरएसएस की वह बहुत बड़ी जरूरत मजबूरी की हद तक थीं. 90 के दशक के राममंदिर आंदोलन की अगुआई करने वालों में वे अग्रणी थीं और बच्चाबच्चा राम का जन्मभूमि के काम का और एक धक्का और दो बाबरी मसजिद तोड़ दो का नारा बुलंद करती रहती थीं.

अपने आक्रामक तेवरों और जिद्दी स्वभाव होने के चलते उमा भारती राजनीति में कभी सहज नहीं हो पाई. इस में भी कोई शक नहीं कि 2003 में मध्यप्रदेश में भाजपा की वापसी में उन का रोल अहम था लेकिन इस की वजह उन का जनप्रिय नेत्री होना कम दिग्विजय सरकार के खिलाफ जनाक्रोश को सलीके से भुना लेना ज्यादा था. हुबली कांड के चलते वे कम समय मुख्यमंत्री रह पाई. उन की जगह बाबूलाल गौर को इस आश्वासन के साथ मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया था कि अदालती मामला सुलझते ही वापस मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा. लेकिन शिवराज सिंह जो एक दफा मुख्यमंत्री बने तो अंगद के पांव की तरह कुर्सी पर जमे रहे, जिन्हें जैसेतैसे रुखसत कर मोहन यादव को गद्दी भाजपा आलाकमान ने आरएसएस के इशारे पर सौंपी.

2003 में सोनिया गांधी जब यूपीए की नेता चुन ली गईं थी और उन के और प्रधानमंत्री की कुर्सी के बीच चंद कदमों का ही फासला बचा था, तब सुषमा स्वराज के साथ अपना सर मुड़ा लेने का एलान उमा भारती ने भी किया था. इस पर सोनिया ने समझ और त्याग की अनूठी मिसाल कायम करते डाक्टर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना कर इन दोनों नेत्रियों को घुटमुंडा होने से बचा लिया था.

हुबली की अदालत से सितंबर 2004 को ही बरी होने के बाद जब उन्हें वापस मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री वादे के मुताबिक नहीं बनाया गया तो अपनी अलग भारतीय जन शक्ति पार्टी उन्होंने बना ली थी जो चुनाव में कोई करिश्मा नहीं दिखा पाई तो 2011 में वे भाजपा में लौट गईं थीं. इस वक्त उन्होंने जातिगत राजनीति की नाकाम कोशिश भी की थी.

उमा भारती की ठसक कभी किसी सबूत की मोहताज नहीं रही. साल 2003 में भाजपा की एक मीटिंग में वे लालकृष्ण आडवाणी की मौजूदगी में पार्टी पर बरसी थीं और गुजरात जा कर एक प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने नरेंद्र मोदी को विकास नहीं बल्कि विनाश पुरुष कहा था तब मोदी की हैसियत उमा के सामने प्यादे सरीखी थी. 2014 के बाद मोदी लगातार ताकतवर और मजबूत होते गए लेकिन आरएसएस की इस लाडली को नजरंदाज करने की हिम्मत नही जुटा पाए. साल 2014 का लोकसभा चुनाव उन्होंने झांसी सीट से जीता था और मोदी को उन्हें न चाहते हुए भी मंत्रिमंडल में शामिल करना पड़ा था.

पर इस के बाद के चुनावों में उन्हें टिकट नहीं दिया गया. इस पर वे खामोश रहीं और संयास, गंगा सफाई अभियान वगैरह की बात करतीं रही. लेकिन अबतक उन के बोलने न बोलने को कोई नोटिस नहीं करता था. आज भी उमा कुछ बोलती हैं तो उसे मीडिया भी भाव नहीं देता. इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों पर उन्होंने इसे महापोर इंदौर पुष्यमित्र भार्गव का पाप बताते दंड की मांग की थी. लेकिन बात वही लागू हुई कि जिस की भाजपा के रामलक्ष्मण न सुनें उस की कोई नहीं सुनता. अब फुर्सत में बैठी कल की यह फायर ब्रांड नेत्री ट्वीटट्वीट खेलती रहती हैं. उन के इर्दगिर्द दीदी कहने वालों की भीड़ मोहन यादव को भैया कहते घेरती है तो तय है उमा को कसक तो होती होगी.

Marginalized Leaders (4)
बीजेपी लीडर रवि शंकर प्रसाद (फाइल फोटो)

बुद्धिजीवी होने की सजा भुगतते प्रसाद

कसक तो पटना के संपन्न कायस्थ परिवार के रविशंकर प्रसाद को भी खूब होती होगी जो सिर्फ इस वजह से हाशिए पर पड़े हैं कि वे मोदी शाह के यस मेन नहीं रह पाए. जबकि उन की पृष्ठभूमि राजनैतिक है उन के पिता ठाकुर प्रसाद जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक थे और पेशे से वकील भी थे.

पिछला लोकसभा चुनाव रविशंकर ने पटना साहब सीट से कांग्रेस के अंशुल अविजित को 1 लाख 53 हजार से भी ज्यादा वोटों से हरा कर जीता था. तब उम्मीद की जा रही थी कि एक बार फिर कानून मंत्रालय उन्हें ही दिया जाएगा. लेकिन यह जिम्मेदारी मोदी ने किरण रिजिजू को सौंपी फिर अर्जुन राम मेघवाल को कानून मंत्री बना दिया गया क्योंकि किरण रिजिजू भी सरकार और न्यायपालिका के बीच पुल का काम नहीं कर पा रहे थे.

इस के पहले 2014 में राज्यसभा में रहते रविशंकर प्रसाद को पहली दफा कानून मंत्री बनाया गया था तब नरेंद्र मोदी की यह मजबूरी थी कि मंत्रिमंडल में पढ़े लिखे जानकार और बुद्धिजीवी मंत्री भी दिखें अब यह जरूरत और मजबूरी खत्म हो गई है.

पेशे से सुप्रीम कोर्ट के सीनियर लायर रविशंकर का एक गुनाह यह भी है कि वे कानूनविद होने के नाते किसी भी स्तर पर भगवा गैंग की नीतियों के मुताबिक संविधान से असहमति नहीं जता पाते उन की इमेज दरअसल में एक संतुलित नेता की भी है जबकि मोदी शाह को बुद्धिजीवी नहीं बल्कि बुद्धूजीवी नेता चाहिए. कानून मंत्री अकसर प्रधानमंत्रियों के निशाने पर रहते आए हैं चाहे वे अटल युग के दिग्गज रामजेठमलानी हों या इंदिरा युग के शांति भूषण हों वजह कानून मंत्री सीमित दायरे में न कुछ सोच पाता न कुछ कर पाता.

हालांकि रविशंकर कभीकभार बयान या किसी सामयिक मुद्दे पर प्रतिक्रिया दे देते हैं लेकिन वह किसी के लिए कोई खास माने नहीं रखती. खाली वक्त वे अध्ययन और थोड़ीमोड़ी वकालात में गुजार रहे हैं. नए साल में खबरों में उन के दिल्ली स्थित आवास में मकर संक्राति के दिन आग लगने की खबर सुर्खियों में रही थी. इस के एक दिन पहले उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर सवाल उठाया था कि ईडी की आइपैक पर छापेमारी के दौरान क्यों एक फाइल उन्हें खुद निकालना पड़ी थी. इस पर भी किसी ने नोटिस नहीं लिया था क्योंकि गोदी और गैरगोदी मीडिया भी जानता समझता है कि रविशंकर प्रसाद इन दिनों हाशिए पर हैं.

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कांग्रेस लीडर मनीष तिवारी (फाइल फोटो)

मनीष को महंगी पड़ रही असहमति

नेताओं को हाशिए पर रखने का रिवाज कांग्रेस में भी बराबरी से है. इन में अहम नाम मनीष तिवारी का ठीक वैसे ही है जैसा भाजपा में रविशंकर प्रसाद का है. पेशे से वकील मनीष पिछला लोकसभा चुनाव लुधियाना सीट से जीते थे. वे छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय रहे और स्मृति ईरानी की तरह टीवी डिबेट में धुआंधार तरीके से बोलते नजर आते थे. उन की इमेज पारंपरिक कांग्रेसी नेताओं से थोड़ी अलग हट कर है. लेकिन वह दिग्विजय सिंह और शशि थरूर जैसी भी नहीं है जो ऋषिमुनियों की तरह अपनी ही पार्टी को श्राप देने से नहीं हिचकते.

मनीष तिवारी जब तब मोदी सरकार की कुछ नीतियों से सार्वजनिक सहमति जताने की सजा ज्यादा भुगत रहे हैं. मसलन, अग्निवीर योजना का खुलेतौर पर समर्थन करने के अलावा इस योजना को वापस लेने की मांग वाले विपक्ष के ज्ञापन पर दस्तखत करने से मना कर देना.

हिंदुत्व पर भी पार्टी की गाइड लाइन से हट कर बोलना कांग्रेस हाई कमान को नागवार गुजरा था नागवार तो पिछले साल अगस्त में यह इशारा करना भी रहा था कि कांग्रेस में सांसदों को बोलने की इजाजत नहीं है. दरअसल में वे औपरेशन सिंदूर के बाद केंद्र सरकार के प्रतिनिधिमंडल में शशि थरूर के बाद दूसरे कांग्रेसी सदस्य थे जिसे सरकार ने दुनिया भर में समर्थन बटोरने बनाया था. मनीष इस विषय पर संसद में बोलना चाहते थे लेकिन उन्हें आलाकमान ने इजाजत नहीं दी थी.

साल 2021 में उस वक्त खासी चर्चा हुई थी जब उन्होंने यह कह डाला था कि वह कांग्रेस में हिंदू धर्म बनाम हिंदुत्व की बहस को ले कर असमंजस में हैं. बकौल मनीष वह कांग्रेस में इसलिए हैं कि वे नेहरूवादी आदर्शो में विश्वास करते हैं कि धर्म एक निजी मामला है हर किसी को अपनी जिंदगी में अपने धर्म का पालन करने और उस के प्रचारप्रसार का अधिकार है.

धर्म और हिंदुत्व के बारे में आमतौर पर सवर्ण कांग्रेसियों और उन में भी ब्राह्मण नेताओं की राय डाक्टर राजेंद्र प्रसाद से ले कर शशि थरूर तक की यही रही है कि उसे राजनितिक मुद्दा न बनाया जाए. यह राय इसलिए बेमानी है कि भाजपा धर्म और कट्टर हिंदुत्व की राजनीति करते ही सत्ता तक पहुंची है और नरेंद्र मोदी खालिस कर्मकांडी राजनीति ही करते हैं. इस का और आरएसएस का विरोध राहुल गांधी अकसर करते रहते हैं कि हिंदू धर्म और हिंदुत्व दो अलगअलग चीजें हैं राहुल गांधी से बहुत दिनों तक असहमत रहने का सीधा सा मतलब है अपने लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह कोई दूसरा ठिया ढूंढ लेना. हालांकि मनीष तिवारी का इरादा हालफिलहाल ऐसा कुछ लग नहीं रहा लेकिन कब उन के भीतर का भी ब्राह्मण सर उठा ले कहा नहीं जा सकता.

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कांग्रेस लीडर आनंद शर्मा (फाइल फोटो)

अधर में आनंद

मनीष तिवारी की तरह दूसरे ब्राह्मण नेता हैं जिन्हें लगता है कि कांग्रेस पार्टी में सुधार की गुंजाइशें और नेतृत्व परिवर्तन की जरूरत है. ऐसा उसे ही लगता है जो खुद को कांग्रेस में मिसफिट पाने लगता है. पिछला लोकसभा चुनाव अपने गृह राज्य हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा सीट से हारे आनंद को कांग्रेस ने उपकृत करने में कोई कमी कभी नहीं छोड़ी. उन्हें राज्यसभा में भी लिया गया और मंत्री पद से भी नवाजा गया. लेकिन वे कभी जमीनी नेता नहीं रहे.

कांग्रेस के भीतर बदलाब की मांग करने वाले जी-23 समूह के भी सदस्य वे रहे और अति उत्साह में आ कर राहुल गांधी की नीतियों और जातिगत राजनीति का विरोध भी उन्होंने किया था. विदेश मामलों के विशेषज्ञ माने जाने वाले आनंद शर्मा तभी से हाशिए पर हैं जब उन्होंने जाति आधारित जनगणना को बेरोजगारी का समाधान मानने से इंकार कर दिया था लेकिन इस के बाबत कोई ठोस तर्क उन के पास नहीं थे. मकसद सिर्फ सुर्खिया बटोरना था जो उन्हें उम्मीद के मुताबिक नहीं मिली और न ही कांग्रेस ने उन पर कोई एक्शन लिया. कांग्रेस आलाकमान शायद यह चाहता था कि वे खुद ही चले जाएं तो बेहतर है लेकिन नहीं गए तो अपनी ताकत दिखाने का मौका उन्हें दिया गया कि लोकसभा चुनाव जीत कर दिखाओ तो जानें पर वे हार गए.

अब आनंद शर्मा के सामने एक अनिश्चित भविष्य खड़ा है और सारे विकल्प भी खुले हैं जिन में से एक भाजपा में जाने का भी है पर भाजपा ने जब दिग्गज कमलनाथ को अपनी पार्टी के काबिल नहीं समझा तो आनंद शर्मा का कद तो उन से आधा भी नहीं है. अब देखना दिलचस्प होगा कि वे क्या करेंगे.

Marginalized Leaders (2)
पॉलिटिकल लीडर मेनका गांधी (फाइल फोटो)

तपस्या कर रहीं मेनका

देखना तो यह भी कम दिलचस्प नहीं होगा कि मेनका गांधी अब क्या करेंगी क्योंकि राजनीति तो उन की भाजपा ने खत्म सी कर दी है. बची समाजसेवा तो उस में भी उन का मन नहीं लग रहा ऐसा भी अभी नहीं दिख या लग रहा कि अपनी ससुराल से विद्रोह और धोखा देने का कोई गिल्ट वे महसूसती हों. गांधी नेहरू परिवार से उन के बिगड़े संबंध और खटास कभी किसी सबूत की मोहताज नहीं रही जिस के बारे में पाठक सरिता के जनवरी 2026 प्रथम अंक में विस्तार से पढ़ चुके हैं. शीर्षक – अलग धर्म में शादी बच्चों का क्या होगा धर्म.

भाजपा ने मेनका गांधी के बारे में भी वही रुख अपना रखा है जो स्मृति ईरानी रविशंकर प्रसाद और उमा भारती सहित डेढ़ दर्जन नेताओं के बारे में अपनाया हुआ है कि हम निकालेंगे नहीं अपने से जाना हो दरवाजे खुले हैं. मेनका गांधी संजय गांधी की पत्नी होने के नाते कभी भाजपा और आरएसएस की नीतियों रीतियों से इत्तफाक नहीं रख पाई लेकिन जो उपकार भगवा गैंग ने उन पर किए थे उन के चलते विरोध भी उन्होंने नहीं किया और कभी किया भी तो वह बहुत छोटे लेवल का रहा मसलन दीवाली पर जब भगवा गैंग पटाखे जलाने का देशव्यापी आव्हान कर रही थी तब मेनका कह रहीं थीं कि पटाखे चलाने वाले देशद्रोही हैं. क्योंकि इन से प्रदूषण फैलता है लोगों को सांस लेने में घुटन होती है.

सुप्रीम कोर्ट में कुत्तों के मामले में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की खिंचाई यह कहते की थी कि उस ने पूरे भारत में नफरत का माहौल बना दिया है. जजों ने जो किया वह गलत है. इस बयान के भी कोई खास माने नहीं थे लगता ऐसा है कि मेनका अपनी हाजिरी और मौजूदगी बनाए रखना चाहती हैं लेकिन सवाल यह है कि कब तक सवाल यह भी है कि बेटे वरुण गांधी का अब क्या होगा जो मां के पल्लू से चिपकेचिपके ही राजनीति करते रहे.

मेनका की भद्द लोकसभा चुनाव में स्मृति ईरानी से कम नहीं पिटी थी जब सुल्तानपुर सीट से सपा के रामभुआल निशाद के हाथों 43174 वोटों से हार का मुंह उन्हें देखना पड़ा था वरुण को तो भाजपा ने टिकट ही नहीं दिया था. केंद्रीय मंत्री रह चुकी मेनका के पास अब पर्यावरण और पशु सुरक्षा के लिए बयान रुपी काम ही बचते हैं जो एक तरह की निरर्थक तपस्या ही है. अपने परिवार से छल करने का इनाम भगवा गैंग ने उन्हें दिया था तो अब सजा भी दे दी है. Marginalized Leaders

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