Marginalized Leaders : राजनीति हर किसी के बस की बात नहीं खासतौर से उन लोगों के लिए जिन के लिए यह फुल टाइम प्रोफैशन नहीं रहा ऐसे लोग जो कोई और व्यवसाय या कामधंधा छोड़ कर राजनीति में आते हैं उन्हें न तो जनता ज्यादा वक्त तक गंभीरता से लेती और न ही पार्टी आलाकमान जिस की मेहरबानी से ये राजनीति में चलते हैं ऐसे ही कुछ नेताओं की मौजूदा हालत पर गौर करें.

“जिस का काम उसी को साजे और करे तो ठेंगा बाजे” इस कहावत का सीधा सा मतलब यह है कि हर व्यक्ति अपने काम में माहिर होता है कोई और इस काम को करे तो राजनीति के लिहाज से उस का हश्र वही हो सकता है जो कई नेताओं का हुआ. जिन के अब दूरदूर तक कहीं अतेपते नहीं. ये नेता जो कल तक खूब चमकतेदमकते थे अब क्या कर रहे हैं किस हाल में हैं यह किसी को नहीं मालूम. सार यह कि राजनीति हर किसी के बस की बात नहीं, उन लोगों के बस की तो कतई नहीं जिन का मूल पेशा यह नहीं था और जिन का था वे प्रतिवद्धता से कर नहीं पाए.

हाशिए पर पड़े नेताओं में से अधिकतर बेमन से अपने मूल व्यवसाय की तरफ लौट रहे हैं लेकिन वहां भी इन्हें उम्मीद के मुताबिक या पहले की तरह रेस्पांस नहीं मिल रहा है. दो टूक कहें तो ये अब कहीं के नहीं रहे.

Marginalized Leaders (5)
स्मृति की सब से ज्यादा भद्द उस वक्त पिटी थी जब उन्होंने तथ्यात्मक खामी यानी गलत रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को सजा देने वाला सर्कुलर जारी किया था.

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