मध्यप्रदेश की राजनीति का यह वह दौर है जिसमें दोनों प्रमुख दलों के दिग्गज नेता गैरों से कम अपनों से ज्यादा आशंकित हैं और इसकी वजह आकड़ों का वह गणित है जिसका गुणा भाग जरा सा भी गड़बड़ हुआ तो राज्य का पूरा राजनैतिक इतिहास ही बदल जाएगा. 230 विधान सीटों में से 114 कांग्रेस की हैं 109 भाजपा की हैं और 7 अन्य व निर्दलीयों के कब्जे में हैं.  इन सभी ने कांग्रेस को समर्थन दिया हुआ है जिसके चलते कांग्रेस सरकार बना पाई और कमलनाथ मुख्यमंत्री बने. बसपा के 2 और सपा का एक विधायक कांग्रेस के लिए इतना अहम है कि उनका शादी के फूफाओं जैसा ख्याल कांग्रेस रखती है.

इस समीकरण का ज्योतिरादित्य सिंधिया और शिवराज सिंह चौहान की प्रायोजित या इत्तफाकन मुलाकात से गहरा संबंध है जिसने राज्य के राजनैतिक और प्रशासनिक गलियारों में खासा हड़कंप मचा रखा है. हर कोई किसी अनहोनी को लेकर रोमांचित है. हुआ सिर्फ इतना था कि ज्योतिरादित्य सिंधिया खुद शिवराज सिंह से उनके घर जाकर मिले थे और एकांत में कोई आधा घंटे गुफ्तगू की थी.

जाहिर है इन दोनों के बीच बातचीत मौसम के मिजाज या भोपाल के बढ़ते ट्रैफिक को लेकर नहीं हुई होगी तो फिर वो बातचीत क्या थी यह सस्पेंस लोगों को सोने नहीं दे रहा है. इन दोनों के ही नजदीकी समर्थकों तक को मुलाकात की हवा या भनक नहीं थी इसलिए भी यह सस्पेंस पुराने जमाने के जासूसी उपन्यासों जैसा गहराता जा रहा है.

इसलिए अहम है मुलाकात

इसमें कोई शक नहीं कि इस चर्चित मुलाक़ात के अपने अलग माने हैं क्योंकि शिवराज और सिंधिया का बैर जगजाहिर है. विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपने प्रचार में नारा दिया था हमारा नेता शिवराज, माफ करो महाराज. महाराज यानि ज्योतिरादित्य सिंधिया जो कभी किसान पुत्र शिवराज को फूटी आंख नहीं सुहाए क्योंकि ग्वालियर चंबल इलाके में सिंधिया की इमेज वाकई महाराजों जैसी है और आभिजात्य लोग उन्हें श्रीमंत कहते हैं.

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