शासक का पहला कर्तव्य होता है कि वह जनता के दर्द को, उस की तकलीफों को सुने. यही कारण था कि आजाद भारत में जनता की तकलीफों को सुनने के लिए हर शहर में धरनास्थल बनाए. लेकिन सत्ता के घमंड व नशे में डूबे शासक आज जनता के दर्द को सुनना नहीं चाहते और ये धरनेस्थल हटाए जा रहे हैं. ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय’ कहावत बताती है कि निंदा करने वाले को भी पूरा अधिकार देना चाहिए. लेकिन आज सरकार निंदा करने वाले या अपना दर्द सुनाने वाले को अपने से ज्यादा से ज्यादा दूर रखना चाहती है. इस की वजह से धरना देने, प्रदर्शन करने और अपनी बात सुनाने की आड़ में अराजकता भी होने लगी है.

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