Gyanesh Kumar: विदेशी मीडिया में भारत के अंदरूनी मामलों पर चर्चा होना कोई नई बात नहीं है लेकिन इस बार विदेशी मीडिया में भारत के लोकतंत्र पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं. भारत का चुनाव आयोग निशाने पर है, ज्ञानेश कुमार के कारनामों की चर्चा हो रही है और इस धांधली को नरेंद्र मोदी की सरकार से जोड़ा जा रहा है. क्या यह भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए सही है?
भारत में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR के नाम पर करोड़ों वोटरों के नाम काटे गए. इस मुद्दे पर विपक्ष लगातार चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा करता रहा लेकिन चुनाव आयोग घाघ बना रहा. सितंबर 2026 में जब इंडियन एक्सप्रेस ने उजागर किया कि चुनाव आयोग के अंदर ही भारी मतभेद है, दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीने में 14 बार लिखित में आपत्ति दर्ज की है और सीजेपी ने इस मुद्दे पर 2 अक्टूबर को पूरे देश में प्रोटेस्ट किया तब यह मामला विदेशी मिडिया में सुर्खियों में आया.
इंडियन एक्सप्रेस की जांच के हवाले से विदेशी मीडिया में इस समय भारत के चुनाव आयोग की चर्चा हो रही है और इस चर्चा ने मोदी सरकार की पूरी लोकतांत्रिक छवि को तार तार कर दिया है. बीबीसी, अल जजीरा, द गार्जियन जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मीडिया हाउस अब ज्ञानेश कुमार के नाम पर खबरें चला रहे हैं, एसआईआर और सरकार के साथ चुनाव आयोग की साँठगांठ पर सवाल उठा रहे हैं. जो काम भारत की मेनस्ट्रीम मीडिया को करना चाहिए था वह विदेशी मीडिया कर रही है, यह देश के लिए शर्मनाक है. जब चुनाव कराने वाली संस्था के अंदर ही लोकतंत्र को लेकर झगड़ा हो तो यह कोई छोटी बात नहीं रह जाती. विदेशी मीडिया में इस मामले के तूल पकड़ने से दुनिया की नजर में सिर्फ भारत का चुनाव आयोग ही नहीं बल्कि भारत की लोकतान्त्रिक पहचान भी धूमिल हो रही है.
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