याद होगा, मई 2004 में लोकसभा चुनाव के बाद जब कांग्रेस भारी बहुमत से जीती थी तो उसकी ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर इटली मूल की भारतीय बहू सोनिया गांधी के नाम की चर्चा थी. इंदिरा गांधी के सुपुत्र राजीव गांधी से शादी के बाद भारत की नागरिकता ले चुकीं सोनिया गांधी के नाम पर तब कैसे भाजपाई नेताओं ने हंगामा बरपा दिया था. सोनिया को विदेशी मूल का बताते हुए भारत के प्रति उनकी ईमानदारी और निष्ठा पर बड़ा सवाल खड़ा किया गया था. भाजपा नेता और मौजूदा विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने तो बकायदा कसम उठा ली थी कि अगर सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बन गयीं तो वो अपना सिर मुंडवा लेंगी, सादे कपड़े पहनेंगी और जिन्दगी भर जमीन पर सोएंगी. इस हठ के साथ वह धरने पर भी बैठ गयी थीं. सुषमा का तर्क था कि 60 साल की आजादी के बाद भी अगर कोई विदेशी मूल का शख्स देश के शीर्ष पद पर बैठता है तो इसका मतलब होगा कि देश के 100 करोड़ लोग अक्षम हैं. सुषमा ने साल 1999 में भी सोनिया गांधी को चुनौती देते हुए बेल्लारी से उनके खिलाफ चुनाव लड़ा था, लेकिन वो चुनाव हार गयी थीं.

भाजपा नेता विनय कटियार ने सोनिया गांधी के प्रति अनर्गल बातें और अशिष्ट भाषा का प्रयोग किया था, आज भी वह ऐसा कोई मौका छोड़ते नहीं हैं, तो आज देश के प्रधानमंत्री और उस वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेन्द्र मोदी ने भी सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर एतराज जताते हुए विदेशी मूल का मुद्दा बड़े जोर-शोर से उठाया था. अकेले अटल बिहारी वाजपेयी एकमात्र भाजपाई थे जिन्होंने सोनिया के विदेशी मूल का होने को चुनावी मुद्दा न बनाने की अपील की थी. कहना गलत न होगा कि हम भारतीय इतने छोटे दिल के हैं कि विदेशी मूल के लोगों को अपनी बहू या दामाद तो बना लेते हैं,  मगर उन्हें दिल में जगह नहीं दे पाते. उन्हें पूरी तरह स्वीकार नहीं पाते. उनकी क्षमता, उनकी निष्ठा, उनकी ईमानदारी, उनके समर्पण, उनकी प्रीत पर हमेशा शक करते हैं. वहीं अमेरिका को देखिए, जहां भारतीय मूल के वैज्ञानिकों को, सांसदों को, डौक्टर्स, इंजीनियर्स को कितना मान-सम्मान दिया जाता है. ऊंचे ओहदों पर वह अपनी काबलियत के बल पर विराजते हैं. सोनिया गांधी को नकारते वक्त नरेन्द्र मोदी भूल जाते हैं गुजरात से सम्बन्ध रखने वाली अमरीकी अन्तरीक्ष यात्री सुनीता विलियम्स को. भारतीय मूल की सुनीता विलियम्स को 1987 में अमरीकी सेना में कमीशन प्राप्त हुआ था. छह महीने की अस्थायी नियुक्ति के बाद उन्हें ‘बेसिक डाइविंग औफिसर’ का पद मिला. सन् 1989 में उन्हें ‘नेवल एयर ट्रेनिंग कमांड’ पर भेजा गया, जहां उन्हें ‘नेवल एविएटर नियुक्त किया गया. इसके बाद उन्होंने ‘हेलीकाप्टर कौम्बैट सपोर्ट स्क्वाड्रन’ में ट्रेनिंग ली और कई विदेशी स्थानों पर तैनात हुईं. भूमध्यसागर, रेड सी और पर्शियन गल्फ में उन्होंने ‘औपरेशन डेजर्ट शील्ड’ और ‘औपरेशन प्रोवाइड कम्फर्ट’ के दौरान कार्य किया. सितम्बर 1992 में उन्हें एच-46 टुकड़ी का औफिसर-इंचार्ज बनाकर मिआमि (फ्लोरिडा) भेजा गया. इस टुकड़ी को ‘हरिकेन एंड्रू’  से सम्बन्धित राहत कार्य के लिए भेजा गया था. दिसम्बर 1995 में उन्हें यू.एस. नेवल टेस्ट पायलट स्कूल में रोटरी विंग डिपार्टमेंट में प्रशिक्षक और स्कूल के सुरक्षा अधिकारी के तौर पर भेजा गया. वहां उन्होंने यूएच-60, ओएच-6 और ओएच-58 जैसे हेलिकौप्टर्स को उड़ाया. इसके बाद उन्हें यूएसएस सैपान पर वायुयान संचालक और असिस्टेंट एयर बौस के तौर पर नियुक्त किया गया. सन् 1998 में जब सुनीता का चयन नासा के लिए हुआ तब वे यूएसएस सैपान पर ही कार्यरत थीं.

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