कितनी खुश है आज औरत ज़ेवरों-कपड़ों तले
चलती-फिरती लाश जैसी रेशमी कफ़नों तले
बन्दिशों को तोड़ कर ताज़ी हवा में सांस लो
क्यों छुपा रखी है अपनी शख़्सियत परदों तले
क्यों तेरी तक़दीर का क़ातिब ज़माना बन गया
क्यों दबा रखा है दुनिया ने तुझे रस्मों तले
अपनी मन्ज़िल खुद तलाशों, अपनी राहें खुद चुनो
एक दिन आ जाएगी जन्नत तेरे कदमों तले
जो खड़ी करता है दीवारें तुम्हारी राह में
रौंद डालो उस नियम-कानून को कदमों तले…

शब्दार्थ 
तक़दीर का क़ातिब – किस्मत लिखने वाला

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