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पिछड़े, न तो पढ़ें न ही आगे बढ़ें

बिहार में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों को मिलने वाली प्रीमैट्रिक स्कौलरशिप में जम कर लूटखसोट का खेल खेला गया और करोड़ों रुपए की लूट की गई. क्लास एक से 10वीं तक के बच्चों को स्कौलरशिप का पैसा दिया जाना था. दलितपिछड़े बच्चों के कैरियर को अंधेरे में ले जाते हुए घोटालेबाजों ने स्कौलरशिप की रकम की बंदरबांट के लिए न केवल फर्जी बैंक खाते खोले, बल्कि फर्जी स्कूल और गांव तक बना डाले.

खास बात यह है कि पटना जिले के बच्चों को मिलने वाली स्कौलरशिप की रकम नागपुर और आंध्र प्रदेश के बैंकों तक पर्सनल अकाउंट में पहुंच गई. ज्यादातर खातों में जिस बैंक का पता बताया गया है, वह जाली है. स्कौलरशिप की रकम विद्यालय शिक्षा समिति के खाते में डालने के बजाय घोटालेबाजों के पर्सनल खाते में डाली गई. घोटालेबाजों की हिम्मत तो देखिए कि उन्होंने फर्जी स्कूल ही नहीं बनाए, बल्कि बैंकों की फर्जी ब्रांचें बता कर दूसरी ब्रांचों में रुपए डलवा दिए. कल्याण महकमे ने जब बैंकों को स्कूल के खातों की लिस्ट भेजी, तो घोटाले का खुलासा हुआ. लिस्ट में बैंकों के आईएफएससी कोड की जांच की गई, तो ज्यादातर ब्रांच दूसरी जगह की निकलीं. कल्याण महकमे ने स्कूलों में भेजने के लिए 28 दिसंबर, 2015 और 30 जनवरी, 2016 को 2 करोड़, 19 लाख, 60 हजार रुपए ट्रांसफर करने का आदेश जारी किया था. इन में से एक करोड़, 93 लाख, 17 हजार, 6 सौ रुपए कल्याण महकमे की लिस्ट में शामिल स्कूलों के बैंक खातों में भेजने के बजाय फर्जी तरीके से दूसरे खातों में ट्रांसफर करा लिए गए. गड़बड़ी पता लगने के बाद पूरे मामले की जांच की जा रही है. जांच के दौरान अब तक 36 आरोपियों पर एफआईआर दर्ज की गई है. पटना के साथसाथ आंध्र प्रदेश, नागपुर, समस्तीपुर, बाढ़, विक्रम के पते दे कर दलालों ने बैंक खातों के जरीए पैसे निकाल लिए हैं.

डीपीओ की ओर से कल्याण शाखा को साल 2014-15 में सौंपी गई स्कौलरशिप के फर्जी खाते वाले स्कूलों की तादाद 43 बताई गई थी, जिन में से 34 स्कूल और बैंक खाते दोनों ही फर्जी पाए गए. फर्जी स्कूल का नाम ले कर 27 दलाल एक करोड़, 38 लाख रुपए निकालने में कामयाब रहे. 9 खाताधारक स्कौलरशिप की रकम फर्जी तरीके से नहीं निकाल सके.

जिला शिक्षा कार्यालय के प्रोग्राम अफसर के दस्तखत से सभी फर्जी अकाउंट वाले स्कूलों की लिस्ट कल्याण विभाग को भेजे जाने की बात साबित हो गई है. फर्जी लिस्ट पर दस्तखत करने से पहले बैंक खातों की जांच नहीं की गई. हाईस्कूल के बैंक खाते से रकम सीधी जिला शिक्षा पदाधिकारी को भेजी गई थी. जिला शिक्षा कार्यालय के किरानी की मिलीभगत से फर्जी खाते की लिस्ट तैयार की गई थी. किरानी मनोज कुमार पर एफआईआर दर्ज करने के बाद से वह फरार है. मनोज ने कल्याण विभाग के किरानी अयोध्या प्रसाद का भी नाम लिया है. स्कौलरशिप घोटाले की पड़ताल के तहत अब तक की जांच में 43 स्कूलों के बैंक खाते फर्जी होने की बात साबित हो गई है. यह घोटाला तकरीबन 2 करोड़ रुपए का है.

अब तक की जांच में पता चला है कि स्कौलरशिप घोटाले में 7 लोग सीधेसीधे शामिल हैं और इन में से एक ही परिवार के 4 लोग हैं. बाकी 3 लोग दोस्त हैं. इन्होंने फर्जी तरीके से स्कौलरशिप के करोड़ों रुपए अपने प्राइवेट खातों में ट्रांसफर करा लिए. सभी घोटालेबाजों ने एकदूसरे का इंट्रोड्यूसर बन कर खाते खुलवाए थे. प्रमोद कुमार और भोला सिंह इस घोटाले के मास्टरमाइंड हैं. प्रमोद कुमार का खाता सैदपुर महल्ले के सिंडिकेट बैंक में है, जिस का खाता नंबर-74072010006869 है. इस खाते में पैजवा हाईस्कूल के 5 लाख, 51 हजार, 4 सौ रुपए ट्रांसफर किए गए. भोला सिंह का खाता मुसल्लहपुर हाट महल्ले के आंध्रा बैंक में है, जिस का खाता नंबर-281110100001662 है. इस में रामपुर के हाई मिडिल स्कूल के 5 लाख, 2 हजार, 8 सौ रुपए ट्रांसफर किए गए. इस का दूसरा खाता नया टोला महल्ले के सैंट्रल बैंक में है, जिस का खाता नंबर-3500057060 है. इस खाते में बांस बिगहा हाईस्कूल के 5 लाख, 60 हजार, 2 सौ रुपए डाले गए. भोला सिंह का तीसरा खाता पटना यूनिवर्सिटी के इलाहाबाद बैंक शाखा में है, जिस का खाता नंबर-50314069919 है. इस में आदर्श मध्य विद्यालय, सुरैया के नाम से 6 लाख, 67 हजार, 8 सौ रुपए डाले गए, जबकि इस नाम का कोई स्कूल ही नहीं है.

सुमित कुमार गुप्ता का खाता सैदपुर के सिंडिकेट बैंक में है, जिस का खाता नंबर-74072010013123 है. इस में बाढ़ के एएनएस हाईस्कूल के नाम से 5 लाख, 97 हजार, 6 सौ रुपए डाले गए. इस का दूसरा अकाउंट मुसल्लहपुर के आंध्रा बैंक में है, जिस का खाता नंबर- 281110100002847 है. इस में ढेलवा मिडिल स्कूल के 5 लाख, 50 हजार, 4 सौ रुपए डाले गए. इस का तीसरा खाता नया टोला की सैंट्रल बैंक शाखा में है, जिस का खाता नंबर-3500045328 है. इस में हसनपुरा हाईस्कूल के 5 लाख, 50 हजार, 8 सौ रुपए डाले गए. इस का चौथा खाता गोविंद मित्रा रोड की केनरा बैंक शाखा में है, जिस का खाता नंबर-1500108007460 है. इस में इशोपुर मिडिल स्कूल के 6 लाख, 88 हजार, 8 सौ रुपए ट्रांसफर किए गए. कुमार विकास का बैंक खाता सैदपुर के सिंडिकेट बैंक में है, जिस का खाता नंबर-74072010013099 है. उस में आरएलएसवाई हाईस्कूल, पैगंबरपुर के 6 लाख, 49 हजार, 8 सौ रुपए डाले गए. इस के साथ ही उस का खाता मुसल्लहपुर के आंध्रा बैंक में भी है, जिस का खाता नंबर- 281110100001635 है. इस में महादेवी स्थाना मिडिल स्कूल के 4 लाख, 51 हजार, 8 सौ रुपए ट्रांसफर किए गए.

दूसरे घोटालेबाज पंकज कुमार का कारपोरेशन बैंक में खाता है. उस का खाता नंबर-0323000101025723 है. इस में रघुनाथपुर हाई मिडिल स्कूल के 4 लाख, 92 हजार, 6 सौ रुपए डाले गए. निधि कुमारी का कारपोरेशन बैंक के खाता नंबर-0323001023645 में सांईं हाईस्कूल के 6 लाख, 42 हजार 6 सौ रुपए डाले गए. गिन्नी देवी के सैंट्रल बैंक की अशोक राजपथ शाखा के खाता नंबर-1352450236 में गोपालपुर मिडिल विद्यालय के 4 लाख, 48 हजार, 2 सौ रुपए डाले गए. प्रमोद कुमार ने अपने 2 दोस्तों विकास और सुमित के साथ रकम हड़पने का प्लान बनाया. भोला सिंह की बहन गिन्नी देवी और उस की बेटी निधि कुमारी और दामाद पंकज कुमार को भी इस घोटाले के खेल में शामिल किया गया. रमोद कुमार ने विकास और सुमित को गारंटर बना कर बैंकों में खाते खुलवाए. इस फर्जीवाड़े की ज्यादातर रकम पटना के बैंकों की कुछ खास शाखाओं में ही ट्रांसफर की गई. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण महकमे के मुताबिक, पिछले साल एक लाख छात्रों ने स्कौलरशिप के लिए अर्जी दी थी. सरकार ने 43 हजार छात्रों के लिए 70 करोड़ रुपए आवंटित किए थे. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण मंत्री संतोष निराला कहते हैं कि पूरे फर्जीवाड़े की गहराई से जांच की जा रही है.

उन्होंने आगे कहा कि कुसूरवारों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा. अब स्कौलरशिप की रकम सीधी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के बच्चों के बैंक खातों में डाली जाएगी.                      

पिछड़े दलित बच्चों के साथ खिलवाड़ : जीतनराम मांझी

बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके हिंदुस्तानी अवाम मोरचा के अध्यक्ष जीतनराम मांझी कहते हैं कि बड़ी साजिश के तहत पिछड़ों और दलितों के होनहार बच्चों को स्कौलरशिप से दूर रखा जा रहा है. दलितों के बच्चों को मिलने वाली स्कौलरशिप की रकम में घोटाला होता रहा और खुद को दलितपिछड़ों की सरकार बताने वाली नीतीशलालू सरकार चुपचाप तमाशा देखती रही. दलितों के बच्चों को साजिश  के तहत पढ़ने से रोकने के मामले की सीबीआई जांच कराने की जरूरत है, तभी दूध का दूध और पानी का पानी हो सकेगा.

महिला और युवती

दिल्ली की महानगरीय जीवनशैली में सुबह से ही ट्रैफिक की भरमार से अंदाजा लगाया जा सकता है कि महानगरों में किस हद तक व्यस्तता अपने चरम पर है. महिला व पुरुष भेड़बकरियों की तरह बसों में चढ़तेउतरते हैं. ऐसे ही एक ठसाठस भरी बस में मुझे भी चढ़ने का अवसर मिला. यह बस इतनी भरी हुई थी कि बैठने के लिए जगह मिलना दूर, इस भीड़ में खड़े रहना भी मुश्किल था. बस में कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें खड़े होने में ही आनंद आ रहा था. सीटें खाली होतीं पर जनाब खड़े रहते और खाली सीट पर कोई भद्र महिला अपना कब्जा जमा लेती. जब भी बस किसी स्टौप पर रुकती और अगर कोई महिला बस में चढ़ती तो पहले तो उसे गेट से अंदर आने के लिए खचाखच भरी भीड़ का सामना करना पड़ता, फिर जैसे ही वह अपने को व्यवस्थित करती, उस की खोजी नजर इस बात की तहकीकात करती नजर आती कि कहीं उसे महिला सीट पर पुरुष दिखाई दे जाए और वह महिला सीट के जुमले के सहारे उक्त सीट पर बड़ी विनम्रता के साथ आसन जमा सके.

चलती का नाम गाड़ी की तरह बस सब को लिए चली जा रही थी. टिकटटिकट चिल्लाते हुए कंडक्टर अपना काम कर रहा था और बस में बातों की जुगाली करती सवारियां अपने में मस्त थीं. हर बार की तरह बस एक बार फिर एक स्टौप पर रुकी और इस बार एक वृद्ध व्यक्ति जैसेतैसे बड़ी मुश्किल से बस में सवार हुआ. वृद्ध बस के अगले गेट से चढ़ा था इसलिए उसे उम्मीद थी कि वृद्ध और विकलांगों वाली सीट पर उसे शायद राहत मिल जाए, लेकिन 2 मूकबधिर छात्रों के उस पर बैठे होने से वृद्ध को निराशा हाथ लगी. अभी वह आगे कुछ सोच पाता कि एक जवान सी दिखने वाली करीब 40 साल की भद्र महिला ने उम्र के तकाजे का सम्मान करते हुए उसे अपनी सीट दे दी.

मुझे यह सब देख कर सुखद अनुभूति हुई कि महिला सीट होने के बावजूद इस महिला ने वृद्ध की उम्र का खयाल रखा. हालांकि महिला ने कुछ कहा नहीं, लेकिन उस के चेहरे की भावभंगिमा से साफ जाहिर हो रहा था कि उसे ऐसा करना अच्छा लगा. बात यहीं खत्म नहीं हुई. बस में भीड़ तो थी ही और चढ़नेउतरने वालों का तांता लगा था, बस फिर एक स्टौप पर रुकी. इस बार चढ़ने वाले तमाम चेहरों में एक बड़ा ही आकर्षक चेहरा बस में चढ़ा. उस की उम्र 20-22 साल के बीच, सुंदर काया, आधुनिक पहनावा, कंधे पर फैंसी पर्स और चेहरे पर उमंग थी. बस की सभी पुरुष सवारियों की निगाहें उस पर टिक गईं. जो महिला सीट की तरफ खड़े थे, उन के चेहरे देख कर साफ लग रहा था कि मानो उन का ऐसे खड़े रहना सार्थक हो गया हो. तभी एक घटना घटी. उस युवती की आंखें भी महिला सीट पर बैठे हुए किसी पुरुष को ढूंढ़ने लगीं ताकि वह अपने नारी अधिकार का प्रयोग करते हुए सीट पर कब्जा जमा सके.

काला चश्मा चढ़ाए इस युवती को अपनी आंखों को ज्यादा तकलीफ नहीं देनी पड़ी और आखिरकार वह वृद्ध उस की नजरोें में आ ही गया. वह धीरेधीरे अपने शिकार की ओर बढ़ने लगी और भीड़ को चीरती हुई वृद्ध के पास पहुंची और महिला सीट की दुहाई देते हुए सीट छोड़ने का आग्रह किया. इस आग्रह में वह अपनी भारतीय संस्कृति को भूल गई कि वह एक वृद्ध की मजबूरी पर अपना दावा ठोंक रही है. बस में बैठे सभी लोग हतप्रभ रह गए. अभी बुजुर्ग अपने को संभालते हुए उठने की कोशिश कर ही रहा था कि युवती बड़ी ही बेशर्मी से बोली कि उठने में इतनी देरी, बैठने को तो झट बैठ गए होंगे, देखते नहीं महिला सीट है. उफ्फ, आजकल के बुजुर्ग… इन्हें महिलाओं की सीट पर बैठने में बड़ा आनंद आता है. अरे बाबा, चलो, जल्दी से सीट खाली करो.

बुजुर्ग आगे कुछ समझ पाता कि अपनी युवा सोच और सुंदरता के घमंड में खोई युवती न जाने कितने अच्छेअच्छे शब्दों से बुजुर्ग का सम्मान बढ़ा चुकी थी. उस का यह व्यवहार सभी सवारियों को अच्छा नहीं लगा. हिम्मत कर जब बुजुर्ग को सीट देने वाली उस महिला ने युवती के इस आचरण पर एतराज जताया तो उस ने तपाक से उत्तर दिया कि बुजुर्ग हैं तो क्या गोद में बैठा लें. बस में सफर करने की क्या जरूरत है, उम्र बढ़ गई है तो घर पर ही बैठे रहते. जैसेतैसे हिम्मत कर मैं ने कुछ बोलना चाहा, युवती ने मानो मुझे काट खाया और कहने लगी, ‘आप कौन होते हैं बीच में बोलने वाले, क्या लगते हैं आप इन के. मैं अच्छी तरह जानती हूं इन शरारती बुजुर्गों को. यह जानबूझ कर महिला सीट पर बैठते हैं.’ लेकिन तब तक बस में और भी कई आवाजें उठने लगीं बुजुर्ग के पक्ष में, पर युवती के तेवर ज्यों के त्यों ही बने रहे.

इस नोकझोंक के बीच बस रुकी और बुजुर्ग कब बस से उतर गया किसी को पता भी नहीं चला. शायद उसे भी अंदाजा नहीं था कि उस के बुढ़ापे का मजाक ऐसे सरेआम उड़ाया जाएगा. इसी दौरान एक अधेड़ उम्र की महिला बस में सवार हुई और एक नेकदिल व्यक्ति ने आदर और सम्मान के साथ अपनी सीट से उठ कर उक्त महिला को बैठने की जगह दे कर उक्त घटना में एक और पुट जोड़ दिया. इस बीच कुछ दूरी का सफर तय कर खूबसूरत तुनकमिजाज युवती भी बस से उतर गई. अब क्या था, इस पूरे प्रकरण पर लोगों ने खुल कर अपने विचार रखने शुरू कर दिए. कुछ सवारियां बैठेबैठे लोगों की बातों पर मजे ले रही थीं. किसी सज्जन ने कहा कि महिला और युवती में अंतर नहीं है क्या… बहुत फर्क होता है. युवती स्वस्थ और जवान होती है जबकि महिला अधेड़, उम्रदराज होती है. युवतियां तो घंटों खड़े हो कर बस में सफर कर सकती हैं, लेकिन महिलाएं ऐसा नहीं कर सकतीं. तभी एक और महाशय बोल पड़े कि महिला शादीशुदा, बच्चों वाली होती है जबकि युवती… सचाई यह है कि इस वाकिए के बाद मैं भी युवती और महिला के बीच केअंतर को समझने की बचकानी कवायद करने लगा और इस का उत्तर तलाशने में लग गया.

नरसिंह का नार्को टेस्ट करवाना चाहिए: सतपाल

नरसिंह यादव के डोप टेस्ट से जुड़े विवाद में पहलवान सुशील कुमार का नाम सामने आने के बाद उनके कोच सतपाल सिंह ने नाराजगी जाहिर की है. उन्होंने कहा कि नरसिंह यादव ने सुशील पर साजिश के जो आरोप लगाए हैं, वो गलत हैं. नरसिंह का नार्को किया जाना चाहिए.

नार्को टेस्ट कराने की सलाह

सतपाल ने कहा कि इस मामले की जांच के लिए नरसिंह यादव का नार्को टेस्ट करवाया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि इससे दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा. यही नहीं, उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ी तो वो खुद भी नार्को टेस्ट के लिए तैयार हैं.

नरसिंह के खिलाफ केस कर सकते हैं सतपाल

सुशील के कोच ने कहा कि नरसिंह उनके ऊपर बेबुनियाद आरोप लगा रहे हैं कि मुझे डोपिंग के रिजल्ट के बारे में पहले से पता था. उन्होंने कहा कि वो नरसिंह के खिलाफ मानहानि का दावा कर सकते हैं. सतपाल ने कहा था कि डोप टेस्ट विवाद में पहलवान सुशील कुमार का नाम घसीटा गया तो वो नरसिंह के खिलाफ केस करेंगे.

रियो में जाने को लेकर पहले भी हुआ विवाद

आपको बता दें कि नरसिंह के पिता ने सुशील और सतपाल पर उनके बेटे के खिलाफ साजिश करने का आरोप लगाया है. गौरतलब है कि रियो में जाने को लेकर सुशील कुमार और नरसिंह के बीच कानूनी विवाद भी हुआ था.

सलमान की रिहाई पर अर्पिता की खुशी

डिज़ाइनर अर्पिता खान शर्मा पिछले दिनों जब रिटेल ज्वेलर इंडिया अवार्ड में जज बन कर आई, तो सभी की निगाहें उन पर थी. सलमान की काला हिरण और चिंकारा के अवैध मर्डर के मामले की रिहाई के बारें में पूछने पर अर्पिता ने बताया कि ये एक ख़ुशी की बात है कि उन्हें बरी कर दिया गया, पूरा परिवार इस मामले से परेशान था, इस मामले में वह मीडिया और फ्रेंड्स को धन्यवाद देती हैं.

आगे वह बताती हैं कि मेरी लाइफ में ज्वेलरी खास मायने रखती है, ज्वेलरी के बिना महिला अधूरी लगती है. मुझे ‘सोलिटेयर’ वाले गहने पसंद हैं, जो मैं मौका मिलने पर खरीदती हूँ. यहां उपस्थित गहनों की प्रदर्शनी खास है, जिसे देखकर लगता है कि आज भी कारीगरी वैसे ही कायम है, केवल उसे तराश कर आधुनिक रूप दिया गया है.    

                               

 

गिफ्ट पैक में सूतफेनी

सूतफेनी को नये अंदाज में टीवी शो से लेकर बाजार तक में पेश किया जा रहा है. जिसकी वजह से पुराने जमाने की सूतफेनी गिफ्ट पैक में बाजार में पेश की जा रही है. सूतफेनी सेवंई परिवार की मिठाई है. इसको इस तरह से तैयार किया जाता है कि खाने के लिये केवल गरमदूध में डालने पर ही सेंवई जैसी बन जाये. यह सेवंई के मुकाबले बहुत महीन होती है. इसको बनाने के लिये सेवंई से अलग तरीके का इस्तेमाल किया जाता है.

उत्तर भारत में सावन के महीनों में पड़ने वाले त्योहारों रक्षाबंधन, नागपचंमी, तीज और करवाचौथ में सूतफेनी का चलन बहुत होता है. बहुत सारे लोग इसको अपने दोस्तो, रिश्तेदारों को अब उपहार में देने लगे हैं. सूतफेनी बहुत लंबे समय से तैयार होती है. अब इसको नये रूप में पेश किया जा रहा है. ऐसे में इसको गिफ्ट पैक में तैयार किया जाने लगा है. सूतफेनी का एक पीस 50 ग्राम के करीब होता है. गिफ्ट पैक में सूतफेनी 560 रुपये किलो मिलता है. इसको आकर्षक पैक में उपहार के लिये तैयार किया जाता है.

सूतफेनी को बनाने के लिये मैदा और घी का प्रयोग किया जाता है. लखनऊ के छप्पनभोग मिठाई शौप के मालिक रवीद्र गुप्ता कहते है ‘सूतफेनी को मैदा और घी से तैयार किया जाता है. इसको बनाते समय ही इतनी पर इसको फेंटा जाता है कि मैदा और घी आपस में बहुत अंदर तक मिक्स हो जाते है. जब अंत में सूतफेनी तैयार होती है तो इसको घी में फ्राई किया जाता है. तैयार सूतफेनी को खाने के लिये गरमदूध या चाश्नी में डाला जाता है. इसको स्वादिष्ठ बनाने के लिये मेवा का प्रयोग भी किया जा सकता है.सूतफेनी ट्रेडिशनल मिठाई है. अब इसको नये जमाने के लोग खासकर लडकियां बहुत पसंद कर रही है.‘

सूतफेनी तैयार करने के लिये मैदा को घी में आटा की तरह गूंथा जाता है. इसके बाद इससे बड़ी बड़ी लोई तैयार की जाती है. लोई के अंदर छेद किया जाता है. छेद करके इसको अंग्रेजी के 8 आकार का बना कर रिंग के आकार में बनाते हुये इतनी बार खींचते है कि यह महीन महीन लेयर में तैयार हो जाती है. अब इसको घी में फ्राई करते है. यह करीब करीब 50-50 ग्राम के वजन के होते है. तैयार सूतफेनी को दूध या चाश्नी में डालकर खाया जाता है.

सूतफेनी को रखने का तरीका ऐसा हो जिससे उसमें हवा न लगे. हवा लगने पर नमी से सूतफेनी का स्वाद खराब हो सकता है. सूतफेनी का ज्यादातर चलन बरसात के मौसम में होता है. ऐसे में नमी से इसको बचाना जरूरी होता है. टीवी सीरियलों में त्योहारों को नया रंग दिया जा रहा है. ऐसे में वहां सूतफेनी का भी प्रचार हो रहा है, जिसकी वजह से पुरानी मिठाई नये रंग में प्रस्तुत की जा रही है.    

विधानसभा मे धर्म गुरु क्यों

जैन धर्म में आचार्य विध्यासागर की वही पूछपरख और हैसियत है, जो सनातन धर्म में शंकराचार्य, इस्लाम में पैगम्बर, क्रिश्चियन में पोप, सिक्खों में गुरुनानक और दलितों में रविदास की है. विध्यासागर इन दिनो भोपाल के हबीबगंज जैन मंदिर में चातुर्मास कर रहे हैं, उन्हे सुनने और देखने देश भर से श्रद्धालु उमड़ रहे हैं. इनमे आम लोगों के अलावा नेताओं की तादाद भी ख़ासी है, जिनका एक अहम मकसद जैन समुदाय के लोगों को खुश करना भी है, क्योंकि अपनी व्यापारिक बुद्धि के लिए पहचाने जाने वाले जैनी चुनावों में दिल खोलकर चंदा देते हैं और हवा का रुख पलटने में भी माहिर हैं.

कोई भी दल सत्ता में आए, इस समुदाय के विधायकों की संख्या दहाई में ही रहती है जबकि वोटों के लिहाज से इनकी संख्या 20 लाख भी नहीं है. विध्यासागर के भोपाल आते ही मध्यप्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सीता शरण शर्मा भी उन प्रमुख नेताओं में शामिल थे, जो सबसे पहले आचार्य के दर्शन करने पहुंचे थे. उन्हे आशीर्वाद मिला, तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने भी आगे की सोचते विध्यासागर को विधानसभा आकर प्रवचन करने का आग्रह कर डाला और जल्द ही घोषणा भी हो गई कि 28 जुलाई को दोपहर 3 बजे से इन आचार्य के प्रवचन विधानसभा में होंगे.

क्यों होंगे और विधानसभा में धर्मगुरुओं के आने का औचित्य क्या, यह न किसी ने बताया, न कोई पूछने की जरूरत समझ रहा कि विधानसभा आखिरकर एक संवैधानिक स्थल है. यहां धर्म कर्म पूजा पाठ यज्ञ हवन और प्रवचन क्यों, क्या ये मुनि गुरु और संत प्रवचन देकर आम जनता की समस्याओं का गारंटेड समाधान धर्म के जरिये करने का दावा करते हैं. अगर हाँ तो विधानसभा की जरूरत ही क्या विधायक क्यों चुने जाते हैं और अगर नहीं कर सकते तो धर्मगुरुओं को यहाँ बुलाकर क्यों जनता का पैसा फूंका जाकर विधानसभा को धर्म प्रचार का अड्डा बनाया जा रहा है.

विधानसभा और धर्मशाला में कोई फर्क मध्य प्रदेश में रह गया है, ऐसा लगता नहीं बल्कि लगता ऐसा है कि जमाना लोकतन्त्र का न होकर राजे रजबाड़ों का है, जिसमे सीएम राजा की तरह बैठते हैं और प्रजा के कल्याण के नाम पर धर्मगुरुओं के श्रीमुख से उपदेश सुनकर अपने कर्तव्यों की इति श्री हुई मान लेते हैं. शिवराज सिंह धर्मभीरुता के मामले में दिग्विजय सिंह को भी पटखनी देने पर उतारू हो आए हैं, जो अपने मुख्यमंत्रित्व काल के आखिरी चरण में इसी तरह जैन मुनियों के चरणों में लोट लगाया करते थे, लेकिन जब नतीजे सामने आए तो जैन बाहुल्य इलाकों से कांग्रेस का सूपड़ा साफ था. इतिहास अपने आप को दोहराए या न दोहराए, यह और बात है पर अब चुनाव आयोग को चाहिए कि वह बजाय पेड न्यूज़ पर हल्ला मचाने के धर्म और चुनाव का संबंध और सीमाएं तय करे जिनसे बड़े पैमाने पर वोट प्रभावित होते हैं और विधानसभा की मर्यादा अगर कोई है तो भंग होती है.

 

नीतीश के लिये जीत से ज्यादा ब्रांडिंग जरूरी

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिये उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव जीतने से जरूरी खुद की ब्रांडिंग करना महत्वपूर्ण है. नीतीश कुमार बिहार में लगातार तीन बार से मुख्यमंत्री है. उनकी स्वच्छ और साफ छवि है. बिहार में उनको ‘सुशासन कुमार’ के नाम से भी जाना जाता है. गैर कांग्रेसी और गैर भाजपाई नेताओं में नीतीश कुमार राष्ट्रीय नेताओं में सबसे बडे कद के नेता है. नीतीश कुमार ने उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव को बहुत गंभीरता से लिया है. इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि वह चुनावी साल में 4 बार उत्तर प्रदेश में किसी न किसी रूप से रैली कर चुके हैं. बिहार में शराब बंद कर चुके नीतीश कुमार अब उत्तर प्रदेश में शराब बंदी और सुशासन को मुद्दा बना रहे हैं. नीतीश कुमार ने उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार पर शराब बंद करने का दबाव बना दिया है. वह विधानसभा चुनावों में शराब बंदी को मुख्य मुद्दा बनाना चाहते है.

बसपा से अलग हुये आरके चौधरी के बीएस-4 पार्टी की रैली में हिस्सा लेने लखनऊ आये नीतीश कुमार ने कहा कि उत्तर प्रदेश में किसी प्रकार के चुनावी गठबंधन पर कोई राय नहीं दी. बिहार में बना महागठबंधन उत्तर प्रदेश में एक साथ मिलकर चुनाव लड़ेगा, इस बात के अब तक कोई संदेश नहीं हैं. बिहार के महागठबंधन में कांग्रेस और लालू प्रसाद यादव का राष्ट्रीय जनता दल गठबंधन में चुनाव लड़ने को तैयार नहीं है. लालू प्रसाद यादव ने उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया है. वह समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह से अपनी रिश्तेदारी के चलते यह फैसला ले रहे हैं. कांग्रेस अभी गठबंधन से भले ही इंकार कर रही हो, पर देर सबेर वह गठबंधन कर चुनाव लड़ सकती है. नीतीश से गठबंधन कर कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में बहुत लाभ नहीं होने वाला. ऐसे में वह अभी नीतीश की ताकत को देख रही है.

यह सच है कि उत्तर प्रदेश में नीतीश कुमार की ताकत बहुत नहीं है. वह उत्तर प्रदेश में बड़ा जनाधार नहीं रखते. ऐसे में चुनाव जीतना बहुत मुश्किल काम है. इसके बाद भी नीतीश कुमार जिस तरह से चुनाव के पहले उत्तर प्रदेश में अपना फोकस बढ़ा रहे है उससे साफ है कि वह उत्तर प्रदेश चुनाव के बहाने अपनी ब्रांडिग करना चाहते हैं. नीतीश का निशाना 2019 के लोकसभा चुनाव हैं, जहां पर वह खुद को भाजपा के नेता और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मुकाबले पेश कर सके. उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा प्रदेश है. देश की राजनीति करने के लिये उत्तर प्रदेश में जड़े जमाना जरूरी होता है. भाजपा नेता नरेन्द्र मोदी ने भी इसीलिये उत्तर प्रदेश को अपना लोकसभा क्षेत्र चुना. यह सही है कि नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड का उत्तर प्रदेश में कोई बडा जनाधान नहीं है. ऐसे में उसको केवल अपने नेता नीतीश कुमार की ब्रांडिंग का लाभ लेना चाहती है.

एक बार उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की उपयोगिता साबित हो गई तो उसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर उनको अपनी दावेदारी पेश करने में मदद मिलेगी. 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की पहले जैसी सफलता मिलती नहीं दिख रही. कांग्रेस में भी बहुत सुधार नजर नहीं आ रहा. ऐसे में नीतीश कुमार सबसे योग्य चेहरा के रूप में खुद को सामने रखना चाहते हैं. जिससे गैर कांग्रेसी और गैर भाजपाई नाम पर लोग उनका समर्थन कर सके. ऐसे में नीतीश कुमार उत्तर प्रदेश में अपनी सक्रियता दिखा कर ब्रांडिग करना चाहते है. छोटे-बड़े दलों के साथ मिलकर नीतीश उत्तर प्रदेश की चुनावी जंग को अपने पाले में मोड़ना चाहते हैं. समय के साथ साथ वह अपने पत्ते खोलेंगे .लालू के बिना भी वह उत्तर प्रदेश में नया गठबंधन तैयार कर सकते हैं.

क्या नवाजुद्दीन भी अब पूरे व्यापारी हो गए हैं?

जब से नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने अक्षय कुमार के साथ फिल्म ‘‘जाली एलएलबी-2’’ करने से मना किया है, तब से बौलीवुड में चर्चा गर्म है कि नवाजुद्दीन सिद्दिकी अब पूरी तरह से व्यवसायी हो गए हैं. सूत्रों के अनुसार नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने अपनी व्यस्तता और फिल्म ‘‘जाली एलएलबी- 2’’ की शूटिंग के लिए तारीखों के अभाव का वास्ता देकर इस फिल्म को करने से साफ इंकार किया.

पर बौलीवुड के अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने हाल ही में अपनी पारिश्रमिक राशि दो गुनी से ज्यादा कर दी है. सूत्र बताते हैं कि नवाजुददीन सिद्दिकी ने सोहेल खान की फिल्म के अलावा बोनी कपूर की श्रीदेवी के साथ वाली फिल्म ‘‘माम’’ में अभिनय करने के लिए साढे़ तीन करोड़ रूपए लिए हैं. इसी के चलते उन्होने ‘जाली एलएलबी-2’ में भी अभिनय करने के लिए साढ़े तीन करोड़़ रूपए मांगे, जिसे निर्माता ने देने से इंकार कर दिया.

निर्माता का दावा है कि उनकी फिल्म कम बजट की है. इसलिए नवाजुद्दीन सिद्दिकी को इतनी बड़ी रकम की मांग नहीं करनी चाहिए. पर नवाजुद्दीन सिद्दिकी से जुड़े सूत्र कहते हैं कि कि यदि निर्माता अक्षय कुमार जैसे दिग्गज कलाकार को अच्छी कीमत देने से परहेज नहीं करता, तो वह सिर्फ नवाजुद्दीन सिद्दिकी से ही समझौता करने के लिए क्यों कहता है?

बहरहाल, बौलीवुड में तमाम लोग नवाजुद्दीन सिद्दिकी के संग खड़े नजर आ रहे हैं. यह ठीक भी है. आखिर हर स्टार कलाकार अपने स्टाफ के नाम पर भी निर्माता से करोड़ रूपए वसूलता है और अपनी फीस भी कम नहीं करता.

‘ट्यूबलाइट’ में शीर्ष भूमिका निभा रहे हैं सलमान खान

1960-1962 के काल खंड और भारत चीन युद्ध की पृष्ठभूमि पर एक प्रेम कहानी को कबीर खान अपनी नई फिल्म ‘‘ट्यूब लाइट’’ में परोसने जा रहे हैं. फिल्म के निर्देशक कबीर खान का दावा है कि वह 28 जुलाई से अपनी इस फिल्म की शूटिंग शुरू करेंगे.

सूत्रों की माने तो इस फिल्म में सलमान खान के किरदार का नाम ट्यूबलाइट है, जो कि एक चीनी लड़की से प्यार करता है. ट्यूबलाइट आम इंसानों से थोड़ा अलग है. वह हर बात को बहुत देर से समझता और देर से ही सीखता है. यानी कि कुछ हद तक यह ‘दिव्यांग’ है. पर कबीर खान का दावा है कि वह इस किरदार को फिल्म ‘‘ट्यूबलाइट’’ में बड़ी संजीदगी के साथ पेश करने वाले हैं.

विक्रम फड़नवीस की फिल्म ‘‘निया’’ का क्या होगा?

बौलीवुड में फिल्मों के निर्माण की घोषणा किन वजहों से होती है, इसे समझना टेढ़ी खीर है. अमूमन फिल्म की कहानी, पटकथा, निर्देशक, तकनीकी टीम व कलाकारों का चयन हो जाने के बाद ही उसके निर्माण की घोषणा होती है. मगर कई फिल्में सिर्फ घोषणा तक ही सीमित रह जाती हैं. बौलीवुड के सूत्रों की  माने तो फिल्मों की घोषणाएं किसी न किसी योजना के तहत की जाती हैं. इसलिए हर घोषित फिल्म का बनना आवश्यक नहीं होता है.

यदि यह सच है तो विक्रम फड़नवीस ने तीन वर्ष पहले बतौर निर्देशक फिल्म ‘‘निया’’ बनाने की न सिर्फ घोषणा बल्कि फिल्म का मुहूर्त क्यों किया था, इसका सच सामने आना चाहिए, पर अभी तक इसका सच सामने नहीं आ पाया.

जी हां! लगभग तीन साल पहले मशहूर कास्ट्यूम डिजायनर विक्रम फड़नवीस ने बतौर निर्देशक फिल्म ‘‘निया’’ के निर्माण की घोषणा की थी. विक्रम फड़नवीस ने बिपाशा बसु, राणा डग्गूबटी व संगीतकार शंकर महादेवन की उपस्थिति में इस फिल्म का मुहूर्त भी किया था. उस वक्त बताया गया था कि इस फिल्म में बिपाशा बसु के साथ राणा डग्गूबटी अभिनय कर रहे हैं. जब इस फिल्म की घोषणा की गयी थी, उस वक्त बिपाशा बसु और राणा डग्गूबटी के आपसी रिश्तों की चर्चा भी हो रही थी. मगर तीन साल का समय बीत जाने के बावजूद इस फिल्म को लेकर कोई प्रगति नहीं हुई.

जबकि पिछले तीन वर्ष के दौरान सभी समीकरण बदल चुके हैं. करण सिंह ग्रोवर के संग शादी कर बिपाशा बसु ने एक नई राह पकड़ ली है और अब विक्रम फड़नवीस की फिल्म ‘निया’ में उनकी कोई रूचि नहीं रही. जबकि सूत्रों का दावा है कि राणा डग्गूबटी ने भी फिल्म ‘‘निया’’ से दूरी बना ली है. तो क्या अब फिल्म‘‘निया’नहीं बनने वाली है?

मगर इस सच को विक्रम फड़नवीस मानने को तैयार ही नहीं है. विक्रम फड़नवीस का दावा है कि उनकी फिल्म ‘निया’ की पटकथा लेखन में देरी होने की वजह से फिल्म नहीं शुरू हो पायी. पर अब फिल्म ‘निया’ की पटकथा लेखन का काम पूरा हो गया है. और फिल्म का निर्माण जल्द शुरू होगा. मगर वह यह बताने को तैयार नहीं हैं कि ‘निया’ वास्तव में कब शुरू होगी और इसमें अभी भी बिपाशा बसु व राणा डग्गूबटी अभिनय कर रहे हैं या नहीं.

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