उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में धर्म के प्रचार के लिये भाजपा राममंदिर का जिक्र नहीं कर रही. अब वह धर्म को राजनीति के केन्द्र में रखने के लिये दीवाली-होली और ईद, श्मशान और कब्रिस्तान और तीन तलाक जैसे मुद्दों को चुनाव के केन्द्र में रख रही है. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में यह नये तरह के धर्मवाद का प्रतीक बन गया है. सोशल मीडिया और दूसरे मौखिक प्रचार से यह बात की जा रही है कि भाजपा ने विधानसभा चुनावों में किसी मुसलिम प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया. अब बारी हमारी है. सुप्रीम कोर्ट की मंशा को दरकिनार कर सभी दल पूरी तरह से जाति और धर्म को लेकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं.

भाजपा को लोकसभा चुनावों में वोट के धर्मिक धुव्रीकरण का सबसे अधिक लाभ मिला था. विधानसभा चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की वोटिंग के बाद भाजपा ने नये तरह के धर्मवाद को सामने कर प्रचार किया है. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में शुरुआत से ही सपा और बसपा मुसलिम वोटों को हासिल करने की मारामारी में लग गये. सपा को मात देने के लिये बसपा ने सबसे अधिक मुसलिम प्रत्याशियों को टिकट दिया. बसपा को लग रहा था कि भाजपा के मुकाबले केवल बसपा ही चुनाव मैदान में होगी, क्योंकि परिवार में विवाद का शिकार सपा पिछड़ जायेगी.

कांग्रेस के  तालमेल करने के बाद सपा ने मुसलिम मतों को बसपा के साथ खड़े होने में सेंधमारी कर दी. जिससे अब बसपा के साथ साथ सपा-कांग्रेस गठबंधन भी मुसलिम मतों का दावेदार हो गया. ऐसे में बसपा का दांव खाली चला गया. जिस तरह से बसपा, सपा और कांग्रेस भाजपा पर धर्मिक धुव्रीकरण का आरोप लगा रहे हैं उसी तरह से भाजपा इन दलों को धार्मिक ध्रुवीकरण का जिम्मेदार मान रही है.

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