‘भेडि़या आया भेडि़या आया’ कह कर गांव के बाहर रहने वाला एक गड़रिया रोज शोर मचाता था.  इस बहाने वह यह देखना चाहता था कि गांव के लोग उस के कितने मददगार साबित होते हैं. उस की चीखपुकार सुन कर गांव वाले दौड़ कर उस के घर पर आ जुटते थे. वहां आ कर उन को पता चलता कि भेडि़या तो आया नहीं. ऐसा कई बार हो चुका था. एक दिन सच में भेडि़या आ गया. गड़रिया फिर से चिल्लाया. गांव वालों ने उस की चीखपुकार सुनी, उन को लगा कि हर बार की तरह वह लोगोें को परेशान कर रहा होगा. कोई गांव वाला उस की मदद को आगे नहीं आया. भेडि़या उस की सारी भेड़ें खा गया. अब उस को अफसोस हो रहा था कि अगर वह रोज  झूठ नहीं बोलता तो गांव के लोग उस की बात को सच मान कर भेडि़या आने पर उस की मदद के लिए आ जुटते.

गांव वाले की यह कहानी राजनीतिक दलों पर फिट बैठती है. 20 साल से ज्यादा समय से राजनीतिक दल अपने मतदाताओं को यह कह कर बरगलाते रहते थे कि अगर वे एकजुट नहीं रहेंगे तो विरोधी दल सत्ता में आ जाएगा. जनता अपनी जाति और बिरादरी के सम्मान के लिए आ जुटती थी. सत्ता पा कर ये दल अपनी बिरादरी को भूल कर कुरसी का मजा लेते थे. 1989 के बाद से 2014 तक राजनीतिक दलों की यह जुगत कारगर होती रही. 16वीं लोकसभा के चुनावों में जनता ने ऐसे दलों की बातों पर भरोसा नहीं किया. नतीजतन, वे हाशिए पर आ गए. उत्तर प्रदेश,  झारखंड और बिहार की 140 सीटों में से विरोधी दलों के हिस्से में 17 सीटें ही आ सकीं. विरोधी दलों को उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 7, बिहार की 40 में से 9 और  झारखंड की 14 में से 1 सीट मिली. 

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