25 मई, 2013 को छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके के सुकमा के पास दरभा घाटी में जो भीषण हत्याकांड हुआ उस से मु झे कोई खास हैरानी नहीं हुई. 52 वर्षीय कृषि विभाग के एक अधिकारी ने नाम व पहचान छिपाए रखने की शर्त पर लंबी बातचीत में इस प्रतिनिधि को बताया, अपना आतंक बनाए रखने और अपने मिशन को आगे बढ़ाने के लिए नक्सली कुछ भी कर सकते हैं. यह इत्तफाक और मौके की बात सम झ आती है कि उन के निशाने पर कांग्रेसी काफिला आ गया वरना मरनेमारने के नाम पर वे कोई भेदभाव नहीं करते.

आदिवासी समुदाय के इस अधिकारी ने आगे बताया, यह जुलाई 1990 की बात थी जब मैं जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर से एमएससी की डिगरी ले कर निकला तो ग्रामसेवक पद पर नौकरी हाथोंहाथ मिल गई पर नियुक्ति बीजापुर ब्लौक के भैरमगढ़ गांव में मिली. सरकारी नौकरी करने वालों के लिए तब बस्तर को मध्य प्रदेश का कालापानी और नर्क कहा जाता था. साथियों ने मु झे सम झाया कि बस्तर जा कर नौकरी, वह भी इतनी छोटी करने से कोई फायदा नहीं. बेहतर यह होगा कि मैं पीएससी या यूपीएससी की तैयारी करूं.

पर मैं सभी को नहीं सम झा सकता था कि मेरे घर के हालात क्या हैं, मेरी पढ़ाई के लिए पिताजी ने 2 एकड़ पुश्तैनी जमीन तक बेच दी थी जो 8 सदस्यों के परिवार के पेट भरने का इकलौता जरिया थी. बच्चों को छोड़ कर सभी लोग खेतों में मेहनतमजदूरी कर पेट पालते थे. उन की इकलौती उम्मीद अब मेरी नौकरी थी जिसे मैं और टरकाता तो घर के टीनटप्पर तक बिक जाते. लिहाजा, मैं ने बस्तर जाने में ही बेहतरी सम झी.

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