हम दुनिया के सब से बड़े लोकतांत्रिक देश होने का ढिंढोरा दशकों से पीट रहे हैं. छातियां चौड़ी कर बता रहे हैं कि हम कितने संपन्न मुल्क में रहते हैं. हालांकि लोकतंत्र की आधारभूत शक्ति, सार्थकता व परिभाषा से हम उतने ही दूर हैं जितनी एक निरर्थक और खोखले लोकतांत्रिक देश की जनता हो सकती है. छद्म देशभक्ति, जातिगत व्यवस्था, भेदभाव, अंधभक्ति, धर्मपुराण आधारित सोच और भारत माता की जय बोलने भर से लोकतंत्र मजबूत हो जाएगा, समझने वालों को शायद यह बात अखरे कि भारतीय लोकतंत्र पूरी तरह से फेल और निरर्थक हो गया है, लेकिन सचाई यही है.

लोकतंत्र क्या होता है? एक ऐसी व्यवस्था जिस में जनता की संप्रभुता हो. जिस में जनता ही सत्ताधारी हो. जिस की अनुमति से शासन होता हो. लेकिन क्या ऐसा है? नहीं. दरअसल, जो  परिस्थितियां लोकतंत्र को किसी भी देश में सफल बनाती हैं वे इस देश में गौण हैं. देश में तानाशाही विचारधारा की शक्तियां, जो देशभक्ति और धर्म की आड़ में अपने नियमकायदे जनता पर थोपना चाहती हैं, शासन कर रही हैं. विकास के नाम पर धार्मिक एजेंडे चमका रहे राजनीतिक दलों की राजनीति मौकापरस्ती और भ्रष्टाचार का खेल बन कर रह गई है. जनता अपने अधिकार और कर्तव्य से विमुख है. इन सब, खासतौर से जनता की सुस्ती, के चलते इस देश में लोकतंत्र कमजोर और निरर्थक होता जा रहा है.

आई स्क्रेच योर बैक, यू स्क्रेच माइन अंगरेजी जुमला है, आई स्क्रेच योर बैक, यू स्क्रेच माइन. इस फलसफे और चोरचोर मौसेरे भाई की तर्ज पर सत्ताधारी और विपक्षी दल एकदूसरे की बैक संभालते हैं. जनता से मिली ताकतों को निजी स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करने को एक हो जाते हैं. जब देश के गरीबों की गाढ़ी कमाई ले कर विजय माल्या जैसा उद्योगपति सरकार की नाक के नीचे से फुर्र हो जाता है तो सरकार विपक्षी दलों को चुप करने के लिए क्वात्रोची का हवाला देती है. जब कोई कोयला घोटाला या 2जी की बात करता है तो उसे बोफोर्स, चारा घोटाला और व्यापमं का हवाला देकर चुप करा दिया जाता है. दोनों एकदूसरे की कमियों पर परदा यह सोच कर डालते हैं कि जब हम सत्ता में आएंगे तो यही सरकार विपक्षी दल के रूप में हमारी पीठ खुजाएगी. हां, दिखावे के लिए घोटालों, भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में तथाकथित कमीशन, जांच समिति बैठाने का नाटक कर जनता को बरगलाया जाता है. संसद में जनता के पैसे से आराम फरमा रहे 552 जनप्रतिनिधियों का आपस में कोई सामंजस्य नहीं है. जाहिर है जनहित के मुद्दे इन के लिए मजाक से ज्यादा भला और क्या होंगे. जनता ने जिन सिपाहियों को देश के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विकास के लिए चुना है वे अपने सरकारी बंगलागाड़ी और घोटालेबाजी में मसरूफ हैं. अब तक ज्यादातर घोटालों के मास्टरमाइंड अगर आजाद हैं तो सिर्फ इसलिए कि हम सुस्त रहे और सरकार पर नकेल नहीं कस सके. क्यों नहीं हम ने इस के खिलाफ आवाज उठाई? इतना सब होने के बावजूद हम फिर भी बेईमान नेताओं, मंत्रियों, अफसरों और बाबुओं की मनमानी देखने को मजबूर हैं.

कन्हैया के बाद क्या?

सत्ताधारी दल व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने वालों का गला किस तरह घोंट रहे हैं, जेएनयू प्रकरण इस का ज्वलंत उदाहारण है. देशद्रोह की आड़ में सरकार की सड़ांधभरी रीतिनीति, तानाशाही के खिलाफ खुल कर बोलने वाले का मुंह बंद कराने के लिए पूरा तंत्र एक हो गया. हालांकि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट संजय कुमार ने जेएनयू केस की जांच के बाद दिल्ली सरकार को जो रिपोर्ट सौंपी थी, उस में कन्हैया कुमार के खिलाफ कोई सुबूत नहीं पाए जाने की बात कही. लेकिन फिर भी कन्हैया को जेल जाना पड़ा. जिस समय चंद वकीलों की प्रायोजित भीड़ कन्हैया को सरेआम पीट रही थी, उसे कोई बचाने के लिए आगे नहीं आया. फिलहाल, कन्हैया जेल से बाहर है लेकिन यह आंदोलन जनसमर्थन के अभाव के चलते रिजल्टओरिएंटेड सिचुएशन तक नहीं लाया जा सका. हम ऐसी किसी भी पहल, संघर्ष या बदलाव का क्रियान्वयन करने में हमेशा से ही नाकाम रहे हैं.

ऐसे आंदोलन आसानी से गरीब, किसान, पिछड़े, दलित, आदिवासियों के आंदोलन बन सकते हैं लेकिन आमजन की अकर्मण्यता और घर बैठ कर सिर्फ सरकार को कोसने की मानसिकता के चलते हम लाचार हैं. कन्हैया साफ कहता है कि मेरा कोई एजेंडा नहीं है. मैं लोकतांत्रिक शक्तियों के साथ हूं, तानाशाही के खिलाफ हूं. दक्षिणपंथी ताकतों के खिलाफ लोग एकजुट हुए हैं, यह किसी एक पार्टी का एजेंडा नहीं है. यानी उस के पास व्यवस्था में बदलाव लाने की संभावना है बशर्ते उसे जनसमर्थन हासिल हो. कन्हैया संघर्ष की परिणति देख कर ही लोग जनहित के लिए आवाज उठाने से घबराते हैं. जरा सोचें, जब कन्हैया को

3-4 हजार की भीड़ मिली तब वह सरकार के लिए इतनी चिंता की बात बन गया, अगर उसे करोड़ों देशवासियों का सहयोग मिलता तो वह इस सुस्त और भ्रष्ट व्यवस्था को बदलने में सफल हो सकता था. दुनियाभर में यही हो रहा है. हौंगकौंग का येलो अम्ब्रेला हो, या सीरिया, नौर्थ कोरिया या इराक के हालात हों, तानाशाह के खिलाफ विद्रोह की चिंगारिया जनसमर्थन की कमी के चलते विस्फुटित होने से पहले ही बुझ गईं. यही कारण है कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए आवाज उठाने वालों को जनसमर्थन न मिलता देख या तो सलाखों के पीछे डाल दिया जाता है या फिर वे सरकार का हिस्सा बन जाते हैं. हालांकि हिंसा से कोई आंदोलन  सफल नहीं होता. सीरिया,इराक इस बात का उदाहरण हैं. इसलिए जनता कुछ संस्थाओं या कन्हैया कुमार और अरविंद केजरीवाल जैसे जनप्रतिनिधियों के जरिए ही व्यवस्था बदल सकती है. इस तरह हर संघर्ष अपने मुकाम तक नहीं पहुंचते. कन्हैया ने सरकार के खिलाफ मोरचा खोला. सुर्खियों में आया लेकिन नतीजा सिफर रहा. आखिर कन्हैया के बाद क्या?

बेनतीजा संघर्ष—जनसमर्थन की कमी

केंद्र सरकार के सोनेचांदी के आभूषणों पर उत्पाद शुल्क बढ़ाए जाने के विरोधस्वरूप शुरू हुई स्वर्णकारों की हड़ताल करीब डेढ़ महीने चलने के बाद और करोड़ों का कारोबारी नुकसान सहने के बाद समाप्त हो गई. ज्वैलर्स फिलहाल खाली हाथ ही हैं. कहने को तो 11 में से 9 मांगें मान ली गईं पर उत्पाद शुल्क कम नहीं किया गया. केवल आश्वासन भर दिया गया है. खबरें हैं कि  देश के कई हिस्सों में हड़ताल जारी रहेगी लेकिन जिस मांग को ले कर करीब 80 प्रतिशत सर्राफा कारोबारी सड़कों पर उतरे थे, उन्होंने सरकारी तंत्र के आगे दम तोड़ दिया. हालांकि मुंबई में सुनारों के समर्थन में राहुल गांधी की रैली के चलते कुछ व्यापारियों ने दुकानें बंद रखी थीं लेकिन ज्यादातर व्यापारियों का यही कहना है कि जब सरकार ने दोटूक जवाब दे दिया तो अपना और नुकसान करने का औचित्य क्या रह गया. आखिर ऐसे लोकतंत्र के क्या माने जहां हड़ताल करने की इजाजत तो हो लेकिन मांगों पर कोई सुनवाई न हो.

एफटीआईआई के अध्यक्ष के पद से गजेंद्र चौहान को हटाने की छात्रों ने भरसक कोशिश की, हड़ताल भी की लेकिन छात्रों का संघर्ष बेनतीजा रहा. स्मृति ईरानी की शैक्षिक डिगरी पर सवाल उठे लेकिन बातें अनसुनी कर दी गईं. देशभर के कई कालेजों

में अव्यवस्था के खिलाफ होते संघर्ष जनसमर्थन के अभाव में बीच में दम तोड़ देते हैं. कहीं डाक्टर्स, टीचर हड़ताल पर हैं तो कहीं दलितपिछड़े शोषण के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं.कन्हैया, सुनार, एफटीआईआई की तरह सारे संघर्ष एक तरह से कमजोर परिणाम वाले साबित हुए क्योंकि हम अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट गए. दिक्कत यह है कि व्यवस्था को कोसना तो सब चाहते हैं लेकिन खुद को बदलना नहीं चाहते. देश में भारतीय दंड विधान के तहत कानून बने हुए हैं, जिन्हें अगर जनता ईमानदारी से लागू कराए तो भ्रष्टाचार, हत्या,  बलात्कार और तरहतरह के अत्याचार और अपराध समाज व राष्ट्र से कब के समाप्त हो जाएं. सूचना का अधिकार कानून बना, लागू  हुआ. जिन व्यक्तियों को इस की जिम्मेदारी दी गई, वे फेल हुए हैं क्योंकि हम ने उन पर नजर नहीं रखी, लगाम नहीं कसी.

लाचार मीडिया, अकर्मण्य जनता  

मीडिया से जुड़े एक पुरस्कार समारोह में संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने कहा है कि लोकतंत्र की मजबूती प्रैस से जुड़ी है. उन्होंने एक पत्रकार की हत्या का जिक्र करते हुए यह भी कहा कि विश्व में कहीं भी जब कभी किसी पत्रकार की हत्या होती है और प्रैस को चुप कराया जाता है तो कानून व्यवस्था और लोकतंत्र कमजोर हो जाते हैं. लोकतंत्र के अहम स्तंभों में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका जब एक हो जाते हैं तो चौथे लोकतांत्रिक स्तंभ के तौर पर मीडिया जनता की आवाज हुक्मरानों तक उठाती है. मीडिया के पास व्यवस्था से लड़ने के माध्यम भी हैं और जज्बा भी.लेकिन जनता के समर्थन के अभाव में यह संस्था भी कमजोर हो गई है. अगर लोग मीडिया का समर्थन करें, सिर्फ लफ्फाजी से नहीं, बल्कि समय और धन से तो मीडिया बदलाव ला सकता है. लेकिन हम सिर्फ मजे के लिए टीवी न्यूज देखते हैं. ‘मीडिया बिका हुआ है’, ‘इस का फलां पार्टी से कनैक्शन है’, ‘विज्ञापन ज्यादा दिखाते हैं’, जैसे जुमले दोहरा कर लोग अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं. अगर मीडिया को जनसमर्थन और पैसा मिलता तो वह उद्योगपति, राजनेताओं से क्यों मिलता? जब किसी घोटाले का खुलासा मीडिया करता है तो उसे जनता का कोई सपोर्ट नहीं मिलता. लोग बैठ कर तमाशा देखते हैं. नतीजतन मीडिया के दफ्तरों में हमला होता है. आगजनी होती है. उत्पीड़न, सैंसरशिप और हमलों के जरिए पत्रकारों की आवाज बंद कराने के प्रयास बढ़ जाते हैं. अपराधी जैसा व्यवहार किया जाता है. क्योंकि मीडिया में आपराधिक कृत्यों का खुलासा करने का साहस होता है. कई आरटीआई ऐक्टिविस्ट-जर्नलिस्ट अपनी जान गंवा चुके हैं. ऐसे में अगर मीडिया सत्ताधारी दल के सुर में सुर मिलाए तो हमारा ज्यादा दोष है.

फिल्मी हीरो, धर्मगुरु बनाम असली नायक

फिल्मी हस्तियां, जिन्हें हीरो भी कहते हैं, के पीछे अंधभक्ति गजब की है. अमिताभ बच्चन से ले कर अक्षय कुमार और शाहरुख खान के बंगलों के बाहर उन के दीदार के लिए धूप में खड़े हो कर पुलिस की लाठी तक खाने वाले यह नहीं सोचते कि ये ऐक्टर देश के विकास में कोई योगदान नहीं देते. इन का तमाशा स्क्रीन में चंदघंटों के नाचगाने तक सीमित है और उस के बदले वे करोड़ों रुपए कमा लेते हैं. लोग दीवारों पर इन की तसवीरें चिपका कर पूजते हैं. इसी तरह धर्मगुरु अंधभक्तों की जेबें ढीली करने में संकोच नहीं करते. कोई योग की आड़ में परचून की दुकान चला रहा है तो कोई आर्ट औफ लिविंग के बैनर तले अपना उल्लू सीधा कर रहा है. किसी का भी देश के विकास में रत्तीभर योगदान नहीं है. ये न तो शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और हमारे भविष्य के लिए कोई काम करते हैं और न ही लोकतंत्र की मजबूती में कोई रोल निभाते है. जबकि आमजन के अधिकारों के लिए लड़ने वाले असली नायकों को हम कुछ नहीं देते.

कौन सा आरटीआई ऐक्टिविस्ट किसी नेता की कारगुजारियों को हमारे सामने लाने के प्रयास में मारा गया, हम नहीं जानते, लेकिन किस हीरो के कितने सिक्स पैक ऐब्स हैं या फलां हीरोइन ने कितनी बार लिपलौक किया या बिकनी पहनी, जबानी याद रहता है. लोकतंत्र को खोखला करते निरंकुश तत्त्वों पर अंकुश लगाने के लिए जान की बाजी लगाने वालों से जनता को कोई सरोकार नहीं है. अगर जनता परदे के नकली नायकों को पूजने के बजाय असली नायकों को समर्थन दे, उन की धन और बल से मदद करे तो देश के हालात बदल सकते हैं, लोकतंत्र मजबूत हो सकता है.

जनता खामोश क्यों?

जनतंत्र में अगर तंत्र कमजोर या निरंकुश होने लगे तो दोष जनता का है क्योंकि जनता के हाथ में तंत्र को चुनने या अस्वीकृत करने का अधिकार होता है. इसलिए अगर आज का लोकतंत्र कमतर और निरर्थक है तो जिम्मेदार जनता की खामोशी है. जब जनता को लोकतंत्र की अथाह ताकत मिली है तो वह उस का इस्तेमाल क्यों नहीं करती है. राजनीतिक पार्टियां जनहित के बड़बड़े वादे कर हमारी वोटशक्ति से सत्तासीन हो कर निरंकुश हो जाती हैं, तो हम खामोश क्यों रहते हैं? क्यों नहीं अपने लोकतांत्रिक अधिकारों से उन पर नकेल कसते? जनता उन के दायित्व उन्हें याद क्यों नहीं दिलाती? और जब कन्हैया जैसी एकल या मीडिया जैसी संस्थात्मक इकाइयां अपने आंदोलन या टूल्स के जरिए इन पर अंकुश लगाना चाहती हैं तो सब तमाशाई बन जाते हैं और उन का तनमनधन से साथ नहीं देते. क्यों नहीं ऐसी संस्थाओं या जनता के लिए लड़ने वालों का खुल कर धनमन से समर्थन किया जाता है? चुनी हुई सरकारें जब नकारा निकलती हैं तो हम विकल्प के तौर पर फिर से उसी मिजाज की दूसरी सरकार चुन लेते हैं. जड़ में जा कर उस समस्या को खत्म न करने की आदत के चलते सरकारें स्वार्थी और भ्रष्ट हैं. सरकारों के पास देश चलाने की शक्ति है पर सत्ताधारी दल अपनी निरंकुशता के नशे में चूर रहता है और विपक्षी दल अपने हितों के लिए एक हो जाते हैं. हम फिल्मटीवी के सितारों की अंधश्रद्धा में धन और वक्त बरबाद कर देते हैं लेकिन अपने इलाके के जनप्रतिनिधि के कामकाज का ब्योरा रखने का समय नहीं है. हम पाकिस्तान से क्रिकेट का एक मैच जीतने पर दीवाली मनाते हैं. आतिशबाजी में लोगों के घरों में आग तक लगा देते हैं लेकिन लोकतंत्र में लगी आग को बुझाने के लिए कुछ नहीं करना चाहते. अफ़सोस होता है कि हमारे पास खुद के लिए ईमानदारी नहीं है. हमारी लापरवाही, अकर्मण्यता, बेईमानी एक राष्ट्रीय मजबूरी बन कर हमारी नसों में समा चुकी है, जिस का फायदा सत्ताधारी दल उठा रहे हैं.

अपनी जिम्मेदारी कब निभाएंगे

आजादी के इतने सालों बाद भी सरकारी योजनाओं का लाभ गरीब को नहीं मिल रहा है. देश में नेता, कौर्पोरेट और भ्रष्ट अफसरशाही का गठबंधन है. महंगाई,  गरीबी, भूख और बेरोजगारी जैसे मसले सालों से जसतस हैं. अभी भी देश के लोगों का पेट भरने के लिए आयात और कर्ज लेना पड़ता है. अमीरगरीब के बीच की खाई चौड़ी होती जा रही है. किसान आत्महत्या कर रहा है, शिक्षा मंहगी है, आर्थिक और तकनीकी मोरचों पर हम कई देशों से पीछे हैं, उन्नत हथियार आयात करते हैं जबकि मुट्ठीभर आतंकियों से लड़ने में पसीना छूट जाता है. क्या इन सब के लिए दोषी सिर्फ सत्ताधारी दल, नेता, अफसर और बाबू हैं? बेशक हैं. लेकिन इन्हें यह कुरसी दी किस ने? हम ने. हम ने अपने वोट के बल पर इस व्यवस्था को चुना है. अगर हम इन्हें चुन सकते हैं तो इन पर अंकुश भी लगा सकते हैं. पर हम सबकुछ नियति मान कर खामोश हो जाते हैं. यही सोच लोकतंत्र को कमजोर करती है. हमारे देश में इतने संसाधन हैं कि अगर हम ईमानदारी से एक सही सरकार चुन कर उस का दोहन करें, देश संपन्न हो सकता है. लेकिन हमारी अकर्मण्यता के चलते मुट्ठीभर लोग अरबों को लाचार बनाए हुए हैं.

लोकतंत्र की सार्थकता

देश की 99 प्रतिशत जनता पूजापाठ के नाम पर दानपुण्य करती है, स्कूल अस्पताल में ऐडमिशन के लिए, ट्रेन में रिजर्वेशन के लिए, राशनकार्ड, लाइसैंस, पासपोर्ट के लिए, नौकरी के लिए, रैडलाइट पर चालान से बचने के लिए,  मुकदमा जीतने और हारने के लिए, खाने के लिए, पीने के लिए, कौंट्रैक्ट लेने के लिए, रिश्वत देती है. फिर उम्मीद करती है कि ईमानदार सरकार देश का विकास कर देगी? आंकड़े बताते हैं कि हर साल करीब 60-70 फीसदी भारतीय किसी न किसी काम के लिए रिश्वत देते हैं. भ्रष्ट देशों की कतार में हम काफी ऊपर हैं. आंकड़े यह भी बताते हैं कि जितना धन घोटालों, रिश्वत और कालेधन के तौर पर मारा जाता है, उस रकम से लाखों प्राइमरी हैल्थसैंटर, शिक्षण संस्थान, गरीबों के लिए आवास, मनरेगा जैसी सैकड़ों स्कीमें, तकनीकी इंस्टिट्यूट, कृषि योजनाएं और देश के विकास के लिए तमाम संयंत्र स्थापित किए जा सकते हैं. दुनिया के सब से बड़े अमीर यहीं बसते हैं. हमारी जीडीपी से कई गुना पैसा तो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है और हम मूकदर्शक बन कर तमाशा देखते हैं. अगर हम अपने संसाधनों का सही इस्तेमाल करें तो हमें कर्ज के लिए विश्व बैंक के सामने हाथ नहीं फैलाने पड़ेंगे. बेमतलब के टैक्स भी नहीं भरने पड़ेंगे.

पर ये सब तभी संभव है जब हम बदलें. अपनी जिम्मेदारी समझें. निरंकुश व्यवस्था या सियासी शक्तियों पर लगाम कसने के लिए हमें लोकतंत्र की शक्तियों और अधिकारों को न सिर्फ समझना होगा बल्कि उन्हें अमलीजामा भी पहनाना होगा. सिर्फ भीड़ बन कर वोटबैंक का हिस्सा बने रहने से कुछ नहीं होगा. जातपात, रीतिरिवाज, धर्म, रूढि़वाद, मानसिकता, कामचोरी और अकर्मण्यता से उठ कर हमें लोकतंत्र को सार्थक और मजबूत बनाना होगा. लोकतंत्र एक ऐसा ढांचा है जिस की नींव में जनता अपने मूल संवैधानिक अधिकारों, विवेक और चुनाव की आजादी को भर कर ऐसी सरकार/संस्था का चुनाव करती है जो देश को राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक मोरचे पर सुचारु रूप से चलाए और अगर वह संस्था ऐसा नहीं करती है तो जनता उस पर अपने वोट के अधिकार के जरिए न सिर्फ अंकुश लगाए, बल्कि जरूरत पड़ने पर शक्तिहीन कर लोकतांत्रिक मूल्यों को कायम रखे.

इन्हें है हमारी जरूरत

देशदुनिया में कई ऐसी संस्थाएं हैं जो जनअधिकारों के बलबूते सालों से संघर्ष कर रही हैं. उन को पहचानने की जरूरत है ताकि ऐसे ही सामाजिक सरोकारों वाली संस्थाएं व नायक और पनपें. डाक्टर्स विदआउट बौर्डर्स, पेटा, फीमेन, स्माइल, ग्रीन पीस के अलावा एड्स अवेयरनैस प्रोजैक्ट, ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रम, चाइल्ड एब्यूज प्रिवैंशन, स्ट्रीट चिल्ड्रन एजुकेशन, ड्रग रिहेबिलिटेशन सैंटर और सैक्स वर्किंग आदि सामाजिक पहलुओं पर कई एनजीओ और सामाजिक संस्थाएं काम कर रही हैं. इन्हें कई बार अनुदान मिलता है लेकिन कई बार इन का अस्तित्व संकट में आ जाता है. अगर इन्हें आमजन का धन और संख्याबल से सपोर्ट मिले तो कई बदलाव लाए जा सकते हैं. यूक्रेन का नारीवादी संगठन ‘फीमेन’ धर्म की पाबंदियों और महिला विरोधी तत्त्वों के खिलाफ नग्न प्रदर्शन करता है. लेकिन दुनियाभर की जनता इन्हें सिर्फ तमाशे या खबरों में चटखारे लगाने के मनोरंजन के नजरिए से देखती है. साथ देने के लिए कम ही लोग आगे बढ़ते हैं. ऐसे ही अंतर्राष्ट्रीय राहत संस्था मैडिसिन सांफ्रंतिया दुनियाभर मेंआपातकाल हादसों में डाक्टरी मदद करती है. 25 साल की एक अमेरिकी महिला एरिन जैकिस ने सुंदरा नाम के एक एनजीओ की नींव भारत में डाली. बड़ेबड़े होटलों में जो साबुन बच जाता है, यह एनजीओ उसे इकट्ठा कर के रिसाइकिल करता है और उसे जरूरतमंद बच्चों में बांटता है. अगर हम ऐसे नायकों की मदद कर उन्हें प्रोसाहन दें तो न सिर्फ लोकतंत्र मजबूत होगा, बल्कि सामाजिक बदलाव भी आएगा.

COMMENT