राजनीतिक दल देश में लोकतंत्र स्थापना की लड़ाई लड़ने और अंतिम आदमी को उसका हक दिलाने की बात करते हैं. सही मायनों में खुद राजनीतिक दलों में लोकतंत्र नहीं है. छोटी बड़ी हर पार्टी एक ही राह पर चल रही है. इस वजह से कोई इस बात के खिलाफ नहीं खड़ा हो रहा. पहले कांग्रेस इस बीमारी की शिकार थी धीरे धीरे सभी दल इस राह पर चल पड़े. क्षेत्रिय दलों के आने के बाद तो यह बीमारी पूरी तरह से महामारी का रूप ले चुकी है. पार्टी संविधान कानून के मुताबिक पार्टी अध्यक्ष का चुनाव करना मजबूरी होती है, इसलिये पार्टी अध्यक्ष के चुनाव का दिखावा किया खानापूर्ति भर के लिये किया जाता है. सच बात है कि राजनीति में जिसकी पार्टी वही अध्यक्ष का फार्मूला चल रहा है.

कांग्रेस में जिस समय परिवार के लोग अध्यक्ष होते थे सभी दल उस पर परिवारवाद का आरोप लगाते थे. अब सारे दल उसी राह पर है. सालों साल से पार्टी संस्थापक ही पार्टी का अध्यक्ष होने लगा है. समय समय पर उसे अध्यक्ष चुने जाने की घोषणा करके जनता को यह दिखाया जाता है कि उनकी पार्टी में लोकतंत्र है. ताजा समाचार राष्ट्रीय लोकदल से आया है. जहां पर पार्टी के प्रमुख चौधरी अजीत सिंह को सातवी बार राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया है. लोकदल अकेला उदाहरण नहीं है. समाजवादी पाटी में मुलायम सिंह यादव अध्यक्ष हैं. बहुजन समाज पार्टी में मायावती अध्यक्ष हैं. राष्ट्रीय जनता दल में लालू प्रसाद यादव अध्यक्ष हैं. इस परिपाटी की जनक कांग्रेस में सोनिया गांधी के बाद उनके पुत्र राहुल गांधी अध्यक्ष की लाइन में खडे हैं.

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