राजनीतिक दल देश में लोकतंत्र स्थापना की लड़ाई लड़ने और अंतिम आदमी को उसका हक दिलाने की बात करते हैं. सही मायनों में खुद राजनीतिक दलों में लोकतंत्र नहीं है. छोटी बड़ी हर पार्टी एक ही राह पर चल रही है. इस वजह से कोई इस बात के खिलाफ नहीं खड़ा हो रहा. पहले कांग्रेस इस बीमारी की शिकार थी धीरे धीरे सभी दल इस राह पर चल पड़े. क्षेत्रिय दलों के आने के बाद तो यह बीमारी पूरी तरह से महामारी का रूप ले चुकी है. पार्टी संविधान कानून के मुताबिक पार्टी अध्यक्ष का चुनाव करना मजबूरी होती है, इसलिये पार्टी अध्यक्ष के चुनाव का दिखावा किया खानापूर्ति भर के लिये किया जाता है. सच बात है कि राजनीति में जिसकी पार्टी वही अध्यक्ष का फार्मूला चल रहा है.

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