अनोखा मुल्क है भारत. देश के शहर, कसबे और गांव सब अजीबोगरीब और अव्यवस्थित नजर आते हैं. नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी अपनी सरकारों के गुड गवर्नेंस के जुमले बेशर्मी से दोहराते हैं लेकिन जरा जा कर तो देखें बाजार, सड़क, गलियां, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, सरकारी दफ्तरों में कुशासन की गंदगी सड़ांध मार रही है. भ्रष्टाचार और प्रदूषण के संक्रमण से बीमार होते हमारे देश की कुछ ऐसी ही तसवीर पेश करती जगदीश पंवार की रिपोर्ट.
 
 
देश के 2 बड़े नेता भाजपा के नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के राहुल गांधी अपनीअपनी सरकारों के विकास के ढोल पीटते दिखाई देते हैं, गुड गवर्नेंस पर भी बोलते हैं पर उन का विकास कैसा है, किस के लिए है, उन का सुशासन कैसा है? 
छोटे शहर, कसबे कूड़ेकचरे के ढेर से अटे पड़े हैं. सड़कें, गलियां टूटीफूटी हैं. नालियों का पानी गंदगी से सड़ांध मार रहा है. चौराहों के कोनों पर नगरपालिका या परिषदों ने कूड़ाघर बना रखे हैं. वाहन सड़कों, गलियों में बेतरतीब खड़े दिखते
हैं. रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, बाजार, गलीमहल्ले, कालोनियां, सरकारी अस्पताल, सरकारी स्कूल, सरकारी दफ्तर और धर्मस्थल सभी व्यवस्था पर सवाल उठाते नजर आ रहे हैं. 
धरती पर अगर कहीं व्यवस्था का बंटाधार है तो वह भारत में है. राजनीतिक, सामाजिक, प्रशासनिक अव्यवस्था के बीच हर तरफ लोगों की रोजमर्रा की परेशानियों का आलम है पर चुनावी चिल्लपों के बीच किसी भी नेता या राजनीतिक दल के घोषणापत्रों, नारों व भाषणों में उन समस्याओं का जिक्र नहीं है, जिन से लोग रोजाना रूबरू होते हैं. कोई भी राजनीतिक दल उन व्यावहारिक दिक्कतों की बात करता सुनाई नहीं दिया जिन से हर शहर, कसबा और गांववासी दोचार होता आ रहा है. 
चुनाव आते ही वादों की झड़ी लगा कर हर दल का नेता सत्ता पर काबिज होते ही जनता को अनसुना कर देता है. आम जनता के सामने आने वाली बिजली, पानी, शिक्षा, महंगाई, भ्रष्टाचार और न्याय व्यवस्था जैसी आधारभूत चुनौतियों से मुंह चुराते इन सियासतदां की बदौलत ही इस देश की ऐसी दुर्गति हुई है. पता नहीं कब तक और हमारे जनप्रतिनिधि जनता की चुनौतियों से निबटने के बजाय उन से भागते फिरेंगे. 
आम जनता के लिए पगपग पर परेशानियां मुंहबाए खड़ी हैं. 23 मार्च की सुबह 6 बजे हम एनसीआर के कुछ शहरों, कसबों के विकास का जायजा लेने दिल्ली के रोहिणी स्थित घर से निकले. एक के बाद एक 3-4 आटोरिकशा वालों को रुकने का इशारा किया. लेकिन वे रुके नहीं, सभी अनदेखा कर चले गए. फिर एक आटो रुका. 
‘सराय रोहिल्ला चलोगे?’
 ‘250 रुपए लगेंगे’, आटो वाले ने किराया बताया. 
‘लेकिन मीटर से 120 के आसपास लगते हैं?’ 
जाम मिलेगा, टै्रफिक वाले नहीं जाने देंगे जैसे रटेरटाए बहाने बनाए. जिदबहस के बाद 150 रुपए में जाने को तैयार हुआ.  6.40 बजे उस ने रेलवे स्टेशन पर उतार दिया. हम खुश थे कि ट्रेन 7.10 की है. समय से पहले पहुंच गए. 2 टिकट खिड़की थीं लेकिन दोनों पर भीड़. फिर भी तसल्ली थी कि 10-15 मिनट में नंबर आ ही जाएगा. ज्योंज्यों खिड़की के नजदीक पहुंचने लगे, आसपास अव्यवस्था का नजारा दिखने लगा. 
बगैर लाइन दोनों तरफ 10-10,
12-12 लोग टिकट लेने के लिए खड़े थे. पीछे से आवाजें आ रही थीं, लाइन में आ जाओ पर लोग टस से मस नहीं हो रहे थे. एक तरफ महिलाएं टिकट लेने की जद्दोजहद में थीं. महिलाएं भी बिना लाइन एकदूसरे से धक्कामुक्की कर रही थीं. 
टिकट खिड़की के आसपास पुलिस का कोई जवान नहीं था जो लोगों को लाइन में लगने को कह सके. टिकट लेना ही परेशानी नहीं, टिकट लेने के बाद भीड़ से बाहर निकलना और भी मुश्किल था. भीड़ को हटा कर लाइन के लिए बनी दोनों ओर लोहे की रेलिंग के नीचे बैठ कर निकलना पड़ रहा था. महिलाओं के लिए भीड़ के बीच रेलिंग के नीचे से निकलना बड़ा मुश्किल हो रहा था, किसी तरह जूझ कर निकल रही थीं. पुरुषों ने अपने साथ की महिलाओं को इसलिए टिकट लेने भेजा ताकि महिलाओं को जल्दी टिकट मिल सके पर उलटा देरी और परेशानी अधिक उठानी पड़ रही थी. शोरशराबा, हायतौबा मची थी. 
लाइन में खड़े 40 मिनट बीत चुके थे पर नंबर नहीं आया. अभी भी 10-12 लोग आगे थे, साइड में बगैर लाइन वाले अलग. तभी किसी सवारी ने कहा कि  ट्रेन चल पड़ी है. 7.10 बजे वाली गाड़ी निकल गई. अब तक हम लाइन में ही थे. किसी ने बताया अब अगली ट्रेन 8.20 पर है. धीरेधीरे लाइन के खिसकने से हम आगे पहुंच चुके थे. सामने अंदर 50-55 साल के मुरदे से दिखने वाले टिकट क्लर्क के मरे हुए से हाथ चल रहे थे. उसे इस बात से कोई मतलब नहीं था कि बाहर लाइन में खड़े लोगों का क्या हाल है, किस कदर परेशान हैं. टिकट लेने के बाद बड़ी राहत मिली. लगा, जैसे कोई बड़ी मुहिम जीत ली हो.
ऐसे माहौल में किसी का सामान गायब हो जाए, किसी की जेब कट जाए, किसी का बच्चा इधरउधर हो जाए तो कोई जिम्मेदार नहीं, किसी की जवाबदेही नहीं है. यह देश की राजधानी दिल्ली के एक बड़े रेलवे स्टेशन का हाल है. यहां से गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, राजस्थान, बिहार और दक्षिणी राज्यों के लिए ट्रेनों के आवागमन की सुविधा है. 
उस के बाद हम 8.20 बजे की ट्रेन में बैठ गए. करीब डेढ़ घंटे बाद हरियाणा के रेवाड़ी और फिर बस से इतने ही समय में महेंद्रगढ़ जिले के नारनौल कसबे में उतरे. यह तहसील मुख्यालय है. बस स्टैंड काफी बड़ा था पर चारों तरफ गंदगी का साम्राज्य. करीब 1 दर्जन बसों के खड़े होने की स्टैंड में व्यवस्था थी. बस स्टैंड चारों तरफ से दीवारों से घिरा था पर अंदर गंदगी भरी पड़ी थी. यात्री परेशान थे. अंदर टौयलेट बना हुआ था. टौयलट के बाहर एक अपंग व्यक्ति बैठा था पर भीतर बदबू थी. नाक पर रूमाल रख कर फारिग होना पड़ रहा था. यात्री इस टौयलेट का इस्तेमाल करने के बजाय बस स्टैंड के भीतर ही दीवारों पर पेशाब करते हैं. समूचे परिसर में कूड़ेदान कहीं दिखाई नहीं दिया.
दोपहर के 12 बज चुके थे. बुकिंग खिड़कियों के पास प्रबंधक का केबिन दिखाई दिया. सामने एक सज्जन माथे पर हाथ रखे तनाव और सोचने की मुद्रा में बैठे दिखाई दिए. टेबल पर कोई फाइल, कागज नहीं. कुछ कर्मचारी आ कर उन से अभिवादन कर के जा रहे थे. लगा, इस अधिकारी का काम शायद कर्मचारियों की नमस्ते का जवाब देना ही हो. जब हम अंदर दाखिल हुए और सफाई व्यवस्था व यात्रियों की सुविधा से संबंधित उन से सवाल किए तो सोच व तनाव में दिखने वाले ये सज्जन अब मुसकराहट और विनम्रता के साथ पिघले हुए नजर आने लगे. 
वीरभान नाम के इस अधिकारी ने बताया कि बस स्टैंड की सफाई व्यवस्था के लिए सरकारी कर्मचारी भी हैं और प्राइवेट भी. रोजाना यहां से अलगअलग राज्यों के लिए लगभग 120 बसों का संचालन होता है इसलिए यहां यात्रियों की भरमार रहती है. लेकिन फैले कूड़े और बदबू पर उन का कोई जवाब नहीं था.
न्याय की उड़ती धज्जियां
बगल में सटे केबिन के बाहर रणवीर सिंह, स. जिला न्यायवादी की तख्ती लगी थी. अंगरेजी में लिखा था, एडीए, एचपीएलएस. वीरभान से जब हम ने उन के बारे में पूछा कि पास वाले केबिन में बैठे सज्जन क्या देखते हैं? तो उन्होंने बताया कि वे रोडवेज के अदालती मामले देखते हैं. उन के बारे में जानने की उत्सुकता इसलिए हुई क्योंकि न्यायवादी के नेमप्लेट लगे केबिन में मुख्य सीट पर बैठे हुए धूम्रपान कर रहे यह शख्स न्याय की धज्जियां धुएं में उड़ाते दिख रहे थे.
बस स्टैंड पर कई लोग खाली बैठे थे. कोई ताश खेल रहा था, कोई गप लड़ा रहा था. कोई कामधाम नहीं. ये लोग स्थानीय लग रहे थे, मुसाफिर नहीं. यात्री चोरउचक्कों, उठाईगीरों से हरदम डरे, सहमे. सुरक्षा का कोई बंदोबस्त नहीं.
उस के बाद हम बस स्टैंड से बाहर निकल कर मुख्य सड़क पर आ गए. अद्भुत, अजीबोगरीब नजारा था. समूची सड़क पर अव्यवस्थित दृश्य. करीब 40 फुट लंबी इस रोड के दोनों ओर आड़ेतिरछे वाहनों की कतार, दुकानों के आगे दोनों तरफ 8-8,10-10 फुट पर फैला सामान. आनेजाने वाले वाहनों और आम लोगों के लिए बीच में बची संकरी सड़क. सड़क भी टूटीफूटी. यहां से गुजरना जांबाजों के ही वश की बात थी. आम लोगों के लिए पैदल चलना बड़ा दूभर था. 

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