"पापा  आप ने यह बहुत गलत किया. मेरे दोस्तों के आगे मेरी इंसल्ट की. वैरी बैड पापा. "
"ऐसा क्या गलत कर दिया मैं ने? तुझे इतना ही कहा न कि रात में पार्टी करने नहीं जाएगा. इस में गलत क्या है? रात के समय कितने क्राइम होते हैं. "
"यार पापा मैं क्या कोई दूध पीता बच्चा हूं जो रात में आ कर मां के हाथ से बोतल में दूध पियूंगा और फिर लोरी सुनते हुए सो जाऊंगा. समझने की कोशिश करो पापा. मेरा अपना सर्कल है. मैं अपने हिसाब से जीना चाहता हूँ. हर कदम पर मुझे गाइड मत किया करो. '
"हां हम तो अब तेरी नजर में मूर्ख हो गए न. सारी अक्लतेरे अंदर आ गई. तुझे पालने में अपना खूनपसीना एक कर दिया और जनाब अब हमें ही सीख देने लगे हैं. "
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"पापा आप लोग तो मुझे समझते ही नहीं. आप से कुछ कहना ही बेकार है," कह कर दिवेश ने जोर से अपने कमरे का दरवाजा बंद कर दिया.
इस तरह की घटनाएं अक्सर हमें अपने आसपास देखने को मिल जाती हैं जब घर में छोटीछोटी बातों पर पेरैंट्स और युवाओं के बीच कहासुनी होने लगती है. दोनों को लगता है कि सामने वाला हमें समझ नहीं रहा.
देखा जाए तो पिछले कुछ समय में लोगों की सोच, रहनसहन और जीवनशैली में काफी बदलाव आए हैं. समय बड़े रफ्तार से आगे बढ़ रहा है. इसी के साथ युवाओं के जीने का तरीका बदला है. स्वछंद वातावरण के साथ ही हर तरफ कम्पटीशन बढ़ता जा रहा है. इस भौतिक युग में ऊंचे मुकाम को हासिल करने के लिए अक्सर महत्वपूर्ण रिश्तों को त्यागने से भी लोग गुरेज नहीं करते.
ऐसे में जब बात आती है मातापिता के साथ युवाओं के रिश्ते की तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ऊपर से भले ही सब बदल रहा हो पर जो प्यार इस रिश्ते में होता है वह अब भी कायम है. एक सर्वे में पाया गया है कि 75 प्रतिशत युवा अपने पैरेंट्स के साथ ही रहना पसंद करते हैं परंतु अक्सर परिस्थितियां उन्हें अलग रहने को भी मजबूर करती हैं. कभी अच्छी पढ़ाई के लिए तो कभी शिक्षा के बाद कैरियर बनाने के लिए युवाओं को बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है. अपने शहर से बड़े शहर और बड़े शहर से विदेश का सफर आज युवाओं के कैरियर ग्राफ़ को बढ़ाने की जरूरत बन चुका है. इस तरह मातापिता और युवाओं के बीच एक दूरी आती है जो युवाओं के सोचने की दिशा भी बदल देती है. जो युवा घर में पेरैंट्स के साथ हैं उन की भी सोच अपने दोस्तों और सोशल मीडिया से प्रभावित होती रहती है.
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आज के समय में ज्यादातर युवा स्वतंत्र माहौल में रह कर दोस्तों के साथ मौजमस्ती करना, देर रात तक जागना, पार्टी करना जैसी मानसिकता के साथ जीवन बिताना पसंद करते हैं तो वहीँ पेरैंट्स इसे गलत मान कर युवाओं को सीख देने लगते हैं. सच तो यह है कि पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों की सोच और जीवन जीने के तरीके में बदलाव निश्चित है. इसे ही जेनरेशन गैप कहते हैं. आपसी तालमेल बिठाए रखने के लिए जरुरत है कुछ तुम बदलो और कुछ हम बदलें, वाले सिद्धांत को स्वीकार करना.
युवाओं को यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि जिंदगी के उतारचढ़ाव में, हर कठिन मोड़ पर मातापिता से बढ़ कर कोई शुभचिंतक नहीं होता. उन के न होने से जीवन में अधूरेपन का एहसास हमेशा होता है. आप के सुख, समृद्धि, खुशी और ऊँचाई हासिल करने पर देखने वाली सब से प्यारी आंखें मातापिता की होती हैं. इस बात से भी कोई इनकार नहीं कर सकता है कि एक बच्चे को जितना उस के मातापिता समझते हैं उतना कोई नहीं समझ सकता. एक बच्चे के लिए क्या सही है और क्या गलत, इस बात का फैसला मांबाप से बेहतर शायद ही कोई कर सकता हो.
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वहीं दूसरी ओर लगभग हर बच्चे के लिए उस के मम्मीपापा ही पहले रोल मॉडल होते हैं. पैरेंट्स की छोटी से छोटी आदतें भी बच्चों पर बहुत गहरा प्रभाव डालती हैं. साइकोलॉजी की इमिटेशन थ्योरी से ये साबित भी होता है कि बच्चे सामाजिक व्यवहार अपने मातापिता से ही सीखते हैं. ऐसे में जब पेरैंट्स आप की कुछ बातों या आदतों से सहमत न हों तो आप को बहुत धैर्य से इस समस्या का समाधान ढूंढना चाहिए.
 *युवाओं की कुछ बातें जो पेरैंट्स नहीं समझते* 
1. कई बार पेरैंट्स अपने युवा बच्चों के लुक्स, पहनावे और करियर को ले कर उस की आलोचना करने लगते हैं. वे यह नहीं समझते कि उन का बच्चा आज के समय के अनुरूप खुद को ढालना चाहता है न कि पुरानी सोच के हिसाब से. युवाओं को कई बार पैरेंट्स के हिसाब से चलने पर दोस्तों के आगे शर्मिंदगी उठानी पड़ती है. ऐसे में आगे चल कर उसे डिप्रेशन और चिड़चिड़ेपन की शिकायत हो सकती है. क्यों कि जो पेरैंट्स की नजर में अच्छा है जरुरी नहीं कि वह आज के फैशन के हिसाब से भी सही हो. बच्चों को इस मामले में स्वतंत्रता मिलनी चाहिए. हां यह बात अलग है कि उन का पहनावा और लुक्स मर्यादा की सीमारेखा के अंदर हो. यही बात करियर के मामले में भी लागू होती है. बच्चा वही फील्ड चुनना चाहता है जो उसे पसंद है पर पेरैंट्स उन के जरिये अपने सपनों को पूरा करना चाहते हैं जो उचित नहीं है.
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2. आजकल के पेरैंट्स को अपने युवा बच्चों से यह शिकायत भी रहती है कि वे सारा समय गैजेट्स जैसे लैपटॉप, मोबाइल आदि में लगे रहते हैं. उन के पास बातें करने के लिए समय नहीं होता. यह सच है कि अक्सर युवा बच्चे अपने दोस्तों या गर्ल/बॉयफ्रेंड्स में इतने व्यस्त रहते हैं कि वे पेरैंट्स को समय नहीं देते. इस के लिए पेरैंट्स को इस मामले में शुरू से ही स्ट्रिक्ट रहना चाहिए.
मगर बात यह भी सही है कि आज के समय में युवा बच्चों को बहुत सा समय गैजेट्स पर इसलिए भी बिताना पड़ता है क्योंकि गैजेट्स आजकल पढ़ाई और इनफार्मेशन का मुख्य जरिया बन चुका है. आज की गलाकाट प्रतियोगिता के इस दौर में वे इन के सहारे ही आगे बढ़ सकते हैं. आज के बच्चे तकनीकी बातों में बहुत होशियार रहते हैं और यह आज के समय की मांग है. सिर्फ पढ़ाई ही नहीं ऑफिस का सारा काम भी आजकल गैजेट्स के सहारे ही होता है और यह बात पेरैंट्स  को समझनी होगी.
3. कई मांबाप की यह आदत होती है कि वे अपने बच्चों को लड़का या लड़की होने के अनुसार व्यवहार करने के लिए कहते हैं. जैसे अगर लड़की है तो उन्हें यह नसीहत दी जाती है कि वे स्पोर्ट्स में भाग न लें या लड़कों वाले कपड़े न पहनें आदि. लड़कों को अक्सर अपनी भावनाओं को छिपाने की सलाह दी जाती है. उन्हें कहा जाता है कि वे मजबूत हैं, उन्हें रोना नहीं है. कई बार ऐसे हालात युवाओं में डिप्रेशन पैदा करते हैं. ऐसा करने से बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.
जरूरी है कि पेरैंट्स उन्हें समझें और उन की पसंद और स्वभाव के हिसाब से जीने दें. उन पर कोई खास किरदार निभाने का भार न डालें. हर इनसान दूसरे से अलग होता है. उस की परिस्थितियां भी अलग होती हैं. अपने बच्चों से यह अपेक्षा नहीं रखी जा सकती कि वे आप की सोच के हिसाब से चलेंगे. उन्हें उन की जिंदगी जीने देनी चाहिए.
4. अक्सर यह देखा जाता है कि युवा वर्ग की सोच शादी विवाह के मसले में अपने पेरैंट्स से काफी अलग होती है. पेरैंट्स जहाँ अपने बच्चों को कम उम्र में ही शादी कर सेटल हो जाने की सलाह देते हैं वहीँ युवा जल्दी शादी के बंधन में बंधना नहीं चाहते. वे थोड़ा समय मौजमस्ती में बिताना चाहते हैं. अपने करियर के मामले में मुकाम हासिल कर लेने के बाद शादी की बात सोचना चाहते हैं. यही नहीं आज के युवा धर्म, जाति या कुल और हैसियत देख कर नहीं बल्कि कम्फर्ट लेवल देख कर जीवनसाथी चुनना चाहते हैं. कई बार वे पहले लिवइन में रहने की बात भी सोचते हैं. यह सब पेरैंट्स को रास नहीं आता और इस बात पर अक्सर पैरंट्स और युवाओं में ठन जाती है.
इस मामले में पेरैंट्स को थोड़ा लिबरल होना होगा. उन्हें समझना होगा कि जिंदगी उन के बच्चों को जीनी है. वे जिस के साथ जीना चाहते हैं उन के साथ जीने दें. क्योंकि इस मामले में जब तनाव बढ़ता है तो किसी का भला नहीं होता. कई बार घर बर्बाद हो जाते हैं. हॉनर किलिंग, आत्महत्या जैसे कदम उठा लिए जाते हैं पर युवा अपने प्यार को भूल नहीं पाते. इसलिए बेहतर है कि बच्चॉं की ख़ुशी में ही अपनी ख़ुशी ढूंढें और उन की भावनाओं को समझें.
5. अपने बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों से कभी नहीं करनी चाहिए. न ही दोस्तों के आगे अपने युवा बच्चों को डांटना चाहिए. ऐसा करने से आप के बच्चे के आत्मसम्मान को ठेस पहुंच सकती है. दोनों के बीच रिश्ता और खराब हो सकता है. किसी भी रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए एकदूसरे को समझने और अपने प्यार का अहसास दिलाने की जरुरत होती है.
 *युवा क्या करें* 
अपने पेरैंट्स को प्यार से समझाएं. आप के उम्रदराज पैरंट्स की सोच अपने समय के हिसाब से सही है. आप उन की सोच को बिल्कुल से नकार नहीं सकते. आप उन्हें अपने दिल की बात समझा सकते हैं, अपनी जरूरतों और मजबूरियों से अवगत करा सकते हैं पर जबरदस्ती इस बात के लिए मजबूर नहीं कर सकते कि वे आप की बात समझें ही. इसलिए बेहतर है की सब से पहले प्यार से उन्हें अपनी बात समझाने का प्रयास करें. जरूरत पड़े तो फिर उदाहरण दे कर अपने कथन की सत्यता साबित करें. उन से निवेदन करें कि वे आप को अपने मन का करने दें. पर भूल कर भी उन पर चीखेचिल्लाएं नहीं. कभी भी दूसरों के आगे उन की बेइज्जती न करें. हो सके तो कभीकभी उन की बात भी मान लें ताकि उन्हें यह न लगे कि आप हमेशा उन की अवज्ञा ही करते हैं. याद रखें पेरैंट्स की बात आप को भले ही गलत लग रही हो मगर कहीं न कहीं वे आप का भला सोच कर ही कुछ भी कहते हैं. उन से ज्यादा आप का भला चाहने वाला और कोई नहीं होता. इसलिए अपने पेरैंट्स को अहमियत देना न भूलें.

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