औफिस से घर आते ही प्रसून पत्नी पर झल्लाता रहता है. पत्नी कुछ पूछे, तो चिढ़ जाता है. 6 साल की बेटी को सवालों के एवज में थप्पड़ पड़ जाता है. पत्नी उस के इस व्यवहार से दुखी रहती है. पूछने पर प्रसून या तो बातचीत ही बंद कर देता है या फिर मांबेटी को अपने कड़वे वचनों से दुखी करता है.

दरअसल, प्रसून ने औफिस में बौस व दूसरे सहयोगियों से झगड़ा मोल ले लिया और जिद में आ कर वह कंपनी का नुकसान करवा चुका है. इस के पीछे कारण है प्रसून की नामसझी. बिना जानेसमझे अपनी ऊटपटांग राय देना, बिना पड़ताल किए अपने से ऊंचे ओहदों वालों से बेतरतीब सवाल करते रहना और अपनी जरूरत के लिए खुद जानकारी जुटाने की मेहनत न कर लोगों को परेशान करना आदि. नतीजतन, बौस और औफिस के लोग खफा हो गए. ऐसे में उस की प्रतिशोध की भावना उबल पड़ी.

रंजना के साथ अलग तरह की घटना घटी. रंजना अपने सहनशील स्वभाव को जानती थी. मगर उस की सहनशीलता जब उस की मुसीबत बनने लगी तो वह सोचने को मजबूर हो गई. भीड़भाड़ में कोई अश्लील हरकत करे, ससुराल में कोई सदस्य उसे बेवजह ताना मारे या फिर उस की मेहनत और काम पर औफिस का कोई कलीग बुरा व्यवहार करे, वह डिप्रैशन यानी अवसाद में चली जाती. मगर फिर भी उस की चुप रहने की आदत न छूट पाती.

रीना ने नीरज पर विश्वास इतना किया कि उस ने उस का अश्लील वीडियो बना डाला, फिर भी वह यही मानती रही कि नीरज की इस में कोई गलती नहीं, शायद वह किसी के बहकावे में आ गया.

रामकली की बात भी क्यों न की जाए. 12वीं बोर्ड के रिजल्ट निकलने से ऐनवक्त पर वह खूब मौजमस्ती कर रही थी. उसे खुद को किसी बंधन में रहना पसंद नहीं. आजादी का सुख उसे हर पल चाहिए और फिर 12वीं का रिजल्ट तमाचा बन कर उस के चेहरे पर पड़ा तो वह सन्न रह गई.

ऐसी सैकड़ों घटनाएं हमारे जीवन में घटती हैं और हम खुद को बेबस पाते हैं, यहां तक कि अवसाद में घिरा हुआ भी.

लोगों को अपनी हालत पर तरस आता है. उन के साथ होने वाली बुरी घटनाओं पर वे ताज्जुब करते हैं. उन्हें बारबार यह लगता है कि दुनिया की कोई एक अदृश्य शक्ति उन के साथ लगातार बुरा कर रही है. वे यह भी सोचते हैं कि ऐसा उन के साथ ही क्यों हो रहा है.

ऊर्जा जब हो नकारात्मक

सारी घटनाएं, सारी प्रतिक्रियाएं हमारी सोच व उस के अनुरूप व्यवहार की ही प्रतिबिंब होती हैं. ऊपर के उदाहरणों के चरित्रों का विश्लेषण इस बात को समझने में कारगर होगा :

प्रसून के केस को समझें : किसी भी विषय के बारे में पूछताछ करना और अपनी राय देना अच्छी बात है, लेकिन अपनी तरफ से सूचनासंग्रह की कोशिश किए बिना बौस से सीधे पूछताछ करना बौस के मन में नकारात्मक भावना पैदा कर सकता है. आप आलसी और दूसरे माध्यमों से सूचनाओं का संग्रह करने में फिसड्डी माने जा सकते हैं.

बात सिर्फ पूछ कर जानकारी जुटा लेने भर की ही नहीं होती, बल्कि कैरियर या नौकरी के मामले में प्रोफैशनल अप्रोच के साथ कौमन सैंस का होना बहुत जरूरी होता है. ज्यादा जानने की इच्छा जरूर रखें, लेकिन अपने स्तर पर पूरी जानकारी इकट्ठा कर के ही बौस से मुखातिब हों.

रंजना के केस को समझें : एक और सकारात्मक गुण का नकारात्मक बनना है. रंजना द्वारा सहनशीलता की हदें समझी जा सकती हैं. बातबात पर लड़नाझगड़ना कतई अच्छी बात नहीं, और सहनशील होना एक सकारात्मक गुण है, लेकिन यही सहनशीलता जब इंसान को मुसीबत में डाल दे तो वह नकारात्मक बन जाती है. सहन करने की हदें जानना और उन के अनुरूप अपनी चुप्पी तोड़ना जरूरी है, तभी इंसान इस दुनिया में जिंदगी को बेहतर जी सकता है.

रीना के केस को समझें : विश्वास बहुत ही कोमल और दिल को छूने वाली भावना है, लेकिन रीना के साथ जो घटा, उस के बाद भी विश्वास के डोर से खुद को जकड़े रखना निरर्थक और घातक है.

विश्वास की अति हमेशा नुकसानदेह है. विश्वास के भाव के साथ सावधानी महत्त्वपूर्ण है, तभी जीना आसान होता है.

रामकली को या तमाम लोगों को मनोरंजन पसंद है. मजबूरी चाहे मकसद को पाने की ही हो, आजादी की कमी सी लगती है. इन्हें रहता है कि खुश रहो यानी मनोरंजन की कमी न हो. कितने तो ऐसे भी होते हैं जिन्हें संघर्ष और मेहनत ऊबा देते हैं. वे बोर होते हैं, ऊबते हैं और खुशियों की तलाश में वक्त जाया करते हैं. काम की बात उन में नीरसता भरती है और आखिर में क्या मिलता है, दुख, असफलता और तनाव.

जिंदगी खुशहाल और संतुलित होने के सपने सभी देखते हैं, लेकिन ऐसा हो पाने की संभावना पर भरोसा हर किसी को नहीं होता. लेकिन यहां हम भरोसा दिलाते हैं कि अगर इन तरीकों पर गौर कर आप अपनी भावनाओं को प्रशिक्षित कर पाए तो कोई कारण नहीं कि आप खुद की परेशानी का सबब बनें.

इमोशनल कोशंट का महत्त्व

आप का जीवन कितना शानदार और खुशहाल होगा, यह निर्भर करता है आप की भावनात्मक शक्ति यानी इमोशनल कोशंट पर. मेधा यानी इंटैलिजैंस जिस तरह आप को सफलता की ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए जरूरी है उसी तरह भावनात्मक शक्ति यानी इमोशनल स्तर व्यक्ति की खुशी और सफलता को बनाए रख कर उसे तनाव से दूर रखने के लिए जरूरी है. अगर अपनी भावनात्मक शक्तियों पर हम ने गौर नहीं किया तो वे हमारे मन और बुद्धि दोनों पर बुरी तरह काबिज हो जाती हैं और हमें उस दिशा में दौड़ने को बाध्य कर देती हैं, जहां पहुंच कर हमारी ऊर्जा खत्म होने लगती है.

प्रभावशाली व्यक्तियों की 7 आदतें नामक किताब में स्टीफन कवे भावनात्मक शक्तियों पर संयम रखने के तौरतरीके बताते हुए 2 तरह के मनोवैज्ञानिक पहलुओं का जिक्र करते हैं. पहला है सैल्फ अवेयरनैस यानी स्वचेतना और दूसरा, सोशल अवेयरनैस यानी सामाजिक चेतना.

स्वचेतना को समझें : खुद को गहराई से समझें. अपनी मानसिक अवस्थाओं की जांचपरख करते रहें. अपनी जरूरत, अपनी भावना, अपनी आदत, अपनी इच्छाओं को जितनी गहराई से जानेंगे, उतनी ही अपनी कमियों और अतार्किकता पर भी नजर पड़ेगी. अपनी हर भावना के पीछे के ‘क्या और क्यों’ को जड़ से जानें. अपनी अनुभूतियों की अनदेखी न करें. बल्कि ये अनुभूतियां क्या हैं, कहां से और क्यों आईं, इन सारी बातों को जानने के लिए खुद के अंदर झांकें. ऐसे में आप अपने भावनात्मक प्रवाह को रोकने में समर्थ होंगे.

सामाजिक चेतना भी जरूरी : यह चेतना है बाहर की दुनिया को समझने की. अपने आसपास की दुनिया में सैकड़ों लोगों से हमारा संवाद और व्यवहार रहता है. जब तक उन्हें अच्छी तरह न समझें, उन  की भावनाओं, कारण और स्थितियों की तह तक न जाएं, तब तक हमारा व्यवहार उन के प्रति अच्छा नहीं हो सकता. लोगों के प्रति अच्छा व्यवहार ही उन्हें हम से सकारात्मक रूप से जोड़ता है.

प्रशिक्षित करें भावनाओं को

भावनाओं की अभिव्यक्ति मानव स्वभाव का सब से बड़ा वरदान है. मगर भावनाओं को संयत किए बिना, बेरोकटोक उन्हें लोगों  पर हमेशा उजागर करते रहना खुद को मुश्किल में डाल सकता है. ‘जहां जैसा, वहां वैसा,’ ‘जिस के साथ जैसा, उस के साथ वैसा,’ यह सिद्धांत है भावनाओं को उजागर करने का.

आइए, समझें कुछ बातें जिन पर काम कर के आसानी से अपनी भावनाओं को प्रशिक्षित किया जा सकता है.

सैल्फ अवेयरनैस : चाहे वह आप की कमजोरी हो या आप की कोई विशेष शक्ति, आप का परिस्थितियों के प्रति व्यवहार हो या आप की खुद की गलतियों को सुधारने की कोशिश, खुद को जानेंगे, समझेंगे, तभी अपनी भावनाओं को प्रशिक्षित करने की ओर पहला कदम उठा पाएंगे.

सैल्फ मैनेजमैंट : उत्तेजित होती भावनाओं पर सब्र रखने की कोशिश को बढ़ावा देना और अपनी अनुभूतियों को सकारात्मक तरीके से विकसित करना वगैरह खुद को व्यवस्थित करने के मुख्य आयाम हैं.

सोशल अवेयरनैस : अपने आसपास के लोगों के व्यवहार और उन की मानसिकता को गहराई से समझना चाहिए. ऐसी प्रतिक्रियाएं दें जिन से दूसरों की फीलिंग्स और सोच को सही दिशा मिले, कोई आहत न हो, और लोग आप के साथ सकारात्मक बने रहें. एक खुशहाल जीवन जीने के लिए यह बेहद जरूरी है.

रिलेशन मैनेजमैंट : रिश्तों की साजसंभाल ही रिलेशन मैनेजमैंट है. शालीन तरीके से बातचीत और दूसरों को प्रेरित कर पाने की क्षमता रिश्तों को व्यवस्थित रखती है. अपना कैरियर हो या पारिवारिक जीवन, अपनी भावनाओं को कंट्रोल में रखते हुए दूसरों के व्यवहार के प्रति सकारात्मक होना सफल और खुशहाल जीवन के लिए जरूरी है.

कई बार हम समूह में साथ काम करते हैं, तब समूह के हर सदस्य की भावना को महत्त्व देते हुए आगे बढ़ना एक स्किल है. प्रोफैशनल जीवन में भी आजकल ब्रिलिऐंट होने के साथसाथ भावात्मक क्षमता के तकनीकी रूप से बेहतर होने को विशेष महत्त्व दिया जा रहा है. जो जितना भावात्मक शक्ति में मजबूत और प्रशिक्षित होता है, उसे बेहतर कैरियर विकल्प मिलते हैं.

सच है कि तनावरहित, आनंदपूर्ण जीवन जीने के लिए अपने दिल को समझें और उसे तकनीकी रूप से प्रशिक्षित करें.

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