मैं राजस्थान में पाली जिले के छोटे से गांव वरकाणा का मूल निवासी हूं. 4 वर्ष की उम्र में पढ़ाई के लिए 3 किलोमीटर दूर मुझे पड़ोस के गांव में पैदल जाना पड़ता था. जब मैं 7वीं कक्षा में पढ़ रहा था, तब एक दिन जोधपुर शहर देखने की इच्छा हुई, जोकि गांव से करीब 150 किलोमीटर की दूरी पर है. एक दिन पापा को बताए बिना मैं गांव से 7 किलोमीटर दूर रानी स्टेशन जा पहुंचा तभी गांव में किसी ने मेरे पापा को मेरे कार्यक्रम की सूचना दे दी. वे भागते हुए आए और मुझे घर वापस ले गए और कहा कि पढ़ाई खूब मन लगा कर करोगे तभी मैं तुम्हें जोधपुर भेजूंगा.

मेरे 12वीं पास करने के बाद पिताजी ने मुझे जोधपुर इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला दिला दिया. मैं अपने अनपढ़ पापा के मार्गदर्शन से अधिशासी अभियंता, राज्य विद्युत मंडल से अब जोधपुर शहर में सेवानिवृत्त हुआ हूं. मेरे पापा का देहावसान 1994 में हो चुका है. मेरे पापा को मेरा शतशत नमन.

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ताराचंद, जोधपुर (राज.)

*मेरे पापा, मम्मी से अकसर कहते, उन्हें पहली संतान बेटी ही चाहिए. जब मेरा जन्म हुआ तो पापा बहुत खुश हुए और उन्होंने अस्पताल में मिठाइयां बांटीं. शाम को औफिस से आ कर मेरे साथ खेलना और प्यार करना उन का पहला काम होता. हर महीने वे मेरे लिए अपनी पसंद की नई ड्रैस लाते, जो मुझ पर खूब फबती. लोग मेरी तारीफ करते तो पापा बहुत खुश होते. 5 वर्ष की उम्र में दिल्ली पब्लिक स्कूल में एडमिशन के लिए मेरे इंटरव्यू पास करने पर पापा ने बड़ी पार्टी दी. पापा खुद ही मुझे पढ़ाते. जब मुझे बैस्ट  ‘स्कौलर बैज’ मिला तो पापा ने सैलिब्रेट किया. पापा की हार्दिक इच्छा मुझे इंजीनियरिंग में प्रवेश दिलाने की थी. मेरा जन्मदिन पापा धूमधाम से मनाते थे.

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