वर्तमान शैक्षिक व्यवस्था में किताबी नहीं बल्कि व्यावहारिकता पर रोजगार की संभावनाएं बढ़ती हैं. लिहाजा, पुरानी डिगरी परंपरा को पीछे छोड़ डिप्लोमा शिक्षा रोजगारपरक भूमिका में आ चुकी है. देशविदेश में बढ़ती डिप्लोमा शिक्षा प्रणाली ने किस तरह से शैक्षणिक व्यवस्था में तबदीलियां की हैं, बता रहे हैं निनाद गौतम.
 
यह बहस हमेशा मौजूद रहेगी कि डिगरी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है या डिप्लोमा. हालांकि शैक्षणिक क्षेत्र में यह लगभग तय है कि डिगरियां, डिप्लोमा से ज्यादा महत्त्वपूर्ण होती हैं. डिगरियों को ज्यादा महत्त्व दिया जाता है. लेकिन व्यावहारिक दुनिया में यानी रोजगार यानी कैरियर की दुनिया में डिगरियों का वही वर्चस्व नहीं है जो अकादमिक स्तर पर है. शर्त यह है कि तमाम मामलों में रोजगार की दुनिया में डिप्लोमा को ज्यादा महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है. इन दिनों डिगरियों के मुकाबले डिप्लोमा कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण साबित हो रहे हैं क्योंकि डिगरियां जहां महज सैद्धांतिक ज्ञान देती हैं, वहीं डिप्लोमा भले सैद्धांतिक ज्ञान में पीछे रहे, लेकिन व्यावहारिक ज्ञान देने में ये कतई पीछे
नहीं रहते.
यही कारण है कि मझोले स्तर के रोजगार मसलन, इलैक्ट्रीशियन, मैडिकल रिप्रैजैंटेटिव, मैकेनिक, आटो मोबाइल कंपनियां वित्तीय विश्लेषण करने वाली कंपनियां, ट्रैवल एजेंसियां, होटल, फोटोग्राफी जैसे दर्जनों ऐसे क्षेत्र हैं जहां डिगरी वालों से ज्यादा महत्त्व डिप्लोमा वालों को दिया जाता है. क्योंकि डिप्लोमा कर के आए नौकरी के इच्छुक न सिर्फ कामकाजी की व्यावहारिक दुनिया से परिचित होते हैं बल्कि एक निश्चित श्रेणी तक वे काम जानते भी हैं. उन में डिगरी वालों के मुकाबले तेजी से काम सीखने की प्रतिभा होती है तथा उन में डिगरी वालों की तरह अकड़ नहीं होती. इसलिए ये टीम भावना के लिए ज्यादा माकूल बैठते हैं.
रोजगारपरक डिप्लोमा
आजकल वे तमाम लोग जिन्हें जल्द से जल्द रोजगार हासिल करना है, बजाय लंबे समय तक उच्च शिक्षा की डिगरी हासिल करने के, वे न्यूनतम पढ़ाई या फिर जिस क्षेत्र में जाना चाहते हैं, डिप्लोमा के लिए न्यूनतम पढ़ाई कर के व्यावहारिक दुनिया में आ जाते हैं. यही कारण है कि नई पीढ़ी में डिप्लोमा के प्रति रुझान ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है. रोजगार देने वाले मानते हैं कि डिप्लोमा होल्डर व्यावहारिक नजरिए से अपने विषय विशेष में कहीं ज्यादा फोकस्ड होते हैं. इसलिए ऐसे रोजगार में जहां सैद्धांतिक ज्ञान की बहुत ज्यादा दरकार न हो वहां डिगरी के मुकाबले डिप्लोमा कहीं ज्यादा सुरक्षित और गारंटी देने वाले हैं.
भारत के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से हर साल लगभग 32 लाख स्नातक निकलते हैं या दूसरे शब्दों में कहें तो भारतीय अर्थव्यवस्था में हर साल इतने स्नातक जुड़ जाते हैं. लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन डिगरीधारियों में से महज कुछ प्रतिशत ही काम के होते हैं. 
जब केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि हमारी आईआईटीज तो इस पर हंगामा हो गया था लेकिन यही बात एन आर नारायणमूर्ति ने दोहराई कि हमारी आईआईटीज में महज 20 फीसदी काम के स्नातक होते हैं. बाकी सब सिर्फ इसलिए यहां ऐडमिशन पा जाते हैं क्योंकि कोचिंग ने इन्हें पास होने का मशीनी नुस्खा सिखा दिया है. इस पर हंगामा नहीं हुआ क्योंकि नारायणमूर्ति अपने पेशे के सफल नायक हैं और आप यह भी नहीं कह सकते कि वे देश के आईआईटीज को नहीं जानते. नारायणमूर्ति ने आईआईटी से ही अपनी अकादमिक पढ़ाई पूरी की है.
बढ़ती अहमियत
ये कुछ उदाहरण अचानक नहीं आए जो यह साबित करें कि डिप्लोमा कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो रहे हैं. 2009-10 में आई एक रिपोर्ट ने भी यही निष्कर्ष निकाला था कि दूसरे क्षेत्र के स्नातकों को तो छोडि़ए, इंजीनियरिंग जैसे विषय के स्नातकों में भी महज 15 प्रतिशत ही ऐसे होते हैं जो डिगरी हासिल करते ही नौकरी के लायक होते हैं. एन आर नारायणमूर्ति के बाद इनफोसिस के दूसरे महत्त्वपूर्ण सदस्य नंदन नीलकेणी ने भी कहा है : 
‘‘हम अजीब संकट से गुजर रहे हैं. एक तरफ हमारे यहां बड़े पैमाने पर पढ़ेलिखे डिगरीधारी स्नातकों की भरमार है, दूसरी तरफ योग्य लोगों का जबरदस्त अभाव है.’’
देश में किस तरीके से रोजगार और जरूरतमंद स्किल्ड वर्कफोर्स के बीच विरोधाभास की स्थिति है इस का अंदाजा सीआईआई और श्रम मंत्रालय की एक रिपोर्ट से भी लगाया जा सकता है.
जरूरी क्यों डिप्लोमा
रिपोर्ट के मुताबिक, देश में डेढ़ से पौने 2 करोड़ स्किल्ड वर्कफोर्स यानी तकनीकी रूप से कामकाज में दक्ष लोगों की जरूरत है. दूसरी तरफ, देश में 3 करोड़ से ज्यादा महज सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ही बेरोजगार हैं. अगर देश में जितने कुशल लोगों की जरूरत है वे हासिल हो जाएं तो बेरोजगारी की मौजूदा दर में 65 से
70 फीसदी की कमी आ सकती है तथा हमारे जीडीपी में 3 से 3.5 लाख करोड़ रुपए की जीडीपी की बढ़ोत्तरी हो सकती है. इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमारी पढ़ाई और व्यावहारिक जरूरतों के बीच कितना बड़ा गैप है.
इस गैप को किसी हद तक डिप्लोमा दूर कर सकते हैं क्योंकि डिप्लोमा न सिर्फ व्यावहारिक कामकाजी शिक्षा देते हैं बल्कि डिप्लोमा कम समय में आप को रोजगार के योग्य बना देते हैं. ज्यादातर मामलों में तो डिगरी के मुकाबले ये सस्ते भी पड़ते हैं. यही कारण है कि डिप्लोमा अब लोगों को अपनी तरफ खींचने लगे हैं. रोजगार पाने वालों को भी और रोजगार देने वालों को भी. वास्तव में नौकरी के लिए जरूरी योग्यता महज डिगरी से नहीं आती. यह एटीट्यूड का हिस्सा भी होती है. यह ज्ञान और सजगता का मेल होती है जिस के चलते नौकरी हेतु जरूरी योग्यता का विकास होता है. यह एटीट्यूड भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि कार्य के लिए जरूरी नौलेज और विभिन्न तरह की कुशलताएं. यह कुशलता छात्रों में डिगरी के मुकाबले डिप्लोमा में जल्दी आती है. शायद इसलिए क्योंकि डिगरी देने वाले विश्वविद्यालय डिगरी को महानता के बोझ से लादे रहते हैं. जबकि डिप्लोमा में महानता का कोई हैंगओवर नहीं होता. इसीलिए डिप्लोमा ज्यादा व्यावहारिक हैं. ये रोजगार की दुनिया में ज्यादा काबिले कुबूल हैं.
पाठ्यक्रम में शुमार
यह डिप्लोमा पाठ्यक्रमों का बढ़ता महत्त्व ही है कि आज शायद ही कोई ऐसा विश्वविद्यालय हो जहां एक दर्जन से कम डिप्लोमा पाठ्यक्रम मौजूद न हों. दरअसल, विश्वविद्यालय भी समझ गए हैं कि गरिमा और सम्मान के लबादे भले डिगरी ओढ़े रहें मगर असली फायदा समाज का तो डिप्लोमा से ही होता है. इसलिए डिप्लोमा विश्वविद्यालयों को भी खूब आकर्षित कर रहे हैं. आज की तारीख में डिगरी के साथ तमाम विश्वविद्यालय और शैक्षणिक संस्थान महत्त्वपूर्ण डिप्लोमा पाठ्यक्रम भी करा रहे हैं. दरअसल, शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाने का यही एक जरिया है कि डिप्लोमा और डिगरी पाठ्यक्रम साथसाथ चलाए जाएं जिस से ये दोनों अलगअलग दुनिया का प्रतिनिधित्व न करें.
अकेले डिगरी काफी नहीं
देश में वोकेशनल शिक्षा की पृष्ठभूमि में पौलिटैक्निक्स का ऐतिहासिक महत्त्व है. आईटीआई ने देश को जितने प्रशिक्षित कामगार दिए हैं उस से ज्यादा शायद ही किसी और ने अब तक के इतिहास में दिए हों. आईटीआई से निकले छात्र भले डिगरियों के लिहाज से बहुत चमकदार शैक्षणिक प्रोफाइल न रखते हों, फिर भी देश की उत्पादकता और औद्योगिक परिदृश्य में इन का जबरदस्त योगदान है. हालांकि यह भी सही है कि सूचना प्रौद्योगिकी के श्रम परिदृश्य में छाने के पहले तक इस वोकेशनल एजुकेशन का उतना महत्त्व नहीं था. मगर पिछले कुछ दशकों में जब से सूचना प्रौद्योगिकी अर्थव्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण जरिया बनी है, इस ने वाकई नए सिरे से और व्यापक रूप से अपना महत्त्व हासिल किया है.
सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के बाद सेवा क्षेत्र में जबरदस्त विस्तार हुआ है और यह विस्तार दोनों ही आयाम में हुआ है यानी अवधारणा के स्तर पर और व्यवहारिक उपयोगिता के स्तर पर. इसी से शिक्षा का एक बिलकुल नए किस्म का विकास संभव हुआ है और इस के महत्त्व के नए माने भी उभरे हैं. ज्यादा साफ और सरल शब्दों में कहें तो कैरियर ओरिएंटेड या नौकरी दिलाने वाले पाठ्यक्रम पर नए सिरे से जोर दिया गया है. 
ऐसा नहीं है कि आज डिगरी बेमतलब हो गई है, डिगरी का आज भी महत्त्व है लेकिन अब अकेली डिगरी को कोई बहुत ज्यादा भाव नहीं मिलता. आज डिगरी तब तक महज औपचारिकता है जब तक उस के साथ व्यावहारिक ज्ञान देने वाला कोई डिप्लोमा भी न जुड़ा हो, खासकर बड़े और मैट्रो शहरों में.
नौकरी की गारंटी
इस समय 145 से ज्यादा विभिन्न तरह के डिप्लोमा पाठ्यक्रम अलगअलग विश्वविद्यालयों/संस्थानों से संचालित हो रहे हैं और उन में से कोई भी ऐसा डिप्लोमा नहीं है जो नौकरी दिलाने में सक्षम न हो या दूसरे शब्दों में कहें तो नौकरी दिलवाने में महत्त्वपूर्ण न हो. फिर भी अगर डिप्लोमाओं की इस भारीभरकम सूची में से उन सब से महत्त्वपूर्ण डिप्लोमाओं को चुनना हो जिन्हें हासिल करने के बाद नौकरी की लगभग शतप्रतिशत गारंटी होती है तो ऐसे डिप्लोमा 25 से ज्यादा हैं. जी हां, विभिन्न किस्म के डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में ये ऐसे पाठ्यक्रम हैं जिन में नौकरी की लगभग गारंटी है. अगर आप किसी वजह से नौकरी नहीं करते या नहीं हासिल कर पाते तो भी यह गारंटी है कि ये डिप्लोमा पाठ्यक्रम आप को शानदार ए श्रेणी का प्रोफैशनल टैग प्रदान करते हैं. आमतौर पर ये तमाम डिप्लोमा पाठ्यक्रम स्नातक स्तर या उस के बाद के हैं.
अगर इन्हें विभिन्न क्षेत्रों के आधार पर वर्गीकृत करें तो इन 25 डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में से 10 पाठ्यक्रम ऐसे हैं जिन्हें किसी भी क्षेत्र का स्नातक सहजता से कर सकता है और 15 ऐसे डिप्लोमा पाठ्यक्रम हैं जिन में कला और मानविकी, विज्ञान और वाणिज्य क्षेत्र के स्नातक डिप्लोमा हासिल कर के महत्त्वपूर्ण ऊंचाई तक पहुंच सकते हैं. विशेष तौर पर कंप्यूटर के क्षेत्र में ये डिप्लोमा पाठ्यक्रम अनिवार्य हो गए हैं.
नौकरी के लिहाज से जो डिप्लोमा पाठ्यक्रम हौट केक हैं, उन में 10 वे पाठ्यक्रम हैं जिन्हें किसी भी क्षेत्र का स्नातक कर सकता है, ऐसे क्षेत्र हैं एडवरटाइजिंग/पीआर, सेल्स ऐंड मार्केटिंग, ट्रैवल ऐंड टूरिज्म, औफिस मैनेजमैंट, कंप्यूटर अप्लीकेशंस, फिटनैस ऐंड योगा, काउंसलिंग ऐंड गाइडैंस, फूड ऐंड न्यूट्रीशन, एनीमेशन और जर्नलिज्म. इन्हें किसी भी क्षेत्र का स्नातक कर सकता है और करने के बाद उस के नौकरी हासिल करने के 100 प्रतिशत अवसर मौजूद होते हैं.
अलगअलग क्षेत्र विशेष के डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में कला और मानविकी के क्षेत्र में जो डिप्लोमा नौकरी दिलाने की गारंटी देते हैं उन में क्रिएटिव राइटिंग, डिजाइन, ट्रांसलेशन, लैंग्वेज और पब्लिश्ंिग हैं. जबकि विज्ञान के क्षेत्र में बायोइन्फौर्मेटिक्स, सर्विस इंजीनियरिंग, क्वालिटी इंश्योरैंस, आईपी सर्टिफिकेशन, क्लीनिकल रिसर्च जैसे डिप्लोमा शामिल हैं. इसी तरह वाणिज्य के क्षेत्र में ई-कौमर्स ऐंड अकाउंटिंग, टैक्सेशन, इंश्योरैंस, फाइनैंशियल प्लानिंग, इन्वैस्टमैंट एडवायजरी आदि शामिल हैं.
हालांकि यह कहना कभी भी सही नहीं होगा कि एक दिन व्यावहारिकता के तकाजे के चलते डिगरी पाठ्यक्रम अर्थहीन हो जाएंगे. लेकिन इस बात में कोई दोराय नहीं है कि जिस तरह से पढ़ाईलिखाई में व्यावहारिकता का पुट बढ़ा है, उसे देखते हुए आज डिप्लोमा डिगरी से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गए हैं.

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