जीवन को खेल और खेल को जीवन समझने वालों को धक्का तब लगा जब उन्हें पता चला कि मैदान में जिस खिलाड़ी को प्रतिभावान समझ कर वे जोरजोर से तालियां बजाते हैं, दरअसल, वे खिलाड़ी उस के हकदार हैं ही नहीं क्योंकि वे तो पैसे ले कर जीत रहे होते हैं या यों कहिए कि पैसे ले कर उन्हें जिताया जाता है. चाचा सिंह ने नुक्कड़ की चाय की दुकान पर जमा अपने युवा भतीजों को यह बात बताई थी.

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