बाजार की मंदी के चलते हमारी फैक्टरी में छंटनी हो गई. मैं उतरे मुंह जब घर पहुंचा तो देखा हमारी आदर्श महिला, हमारी एकमात्र पत्नी अपनी मां के साथ गरमागरम पकौड़े खा रही थी. बड़े मग में चाय भरी थी और उस की भाप उड़उड़ कर कमरे में खुशबू फैला रही थी.
हमारे उतरे चेहरे को देख कर हमारी सास ने कहा, ‘‘क्यों दामादजी, क्या हाल हैं? हमारे आने की कोई खुशी नहीं
हुई क्या?’’

हम ने चेहरे पर झूठी हंसी ला कर कहा, ‘‘ऐसी बात नहीं है.’’

‘‘फिर क्या बात है?’’ पकौड़े को पकौड़े जैसे मुंह में रखते हुए उन्होंने कहा. मैं जानता था कि वे बहुत तिकड़मी महिला हैं. पूरे महल्ले में उन की तूती बोलती है, लेकिन मेरी वे क्या मदद करेंगी? इसलिए मैं चुप था, तो वे फिर बोल उठीं, ‘‘बोलिए भी, यह क्या बासी भजिए जैसा मुंह उतार रखा है.’’
हम ने दिल पर पत्थर रख कर कहा, ‘‘आज हमारी कंपनी ने छंटनी कर के हमें हटा दिया.’’

‘‘हायहाय, यह क्या कह रहे हैं? वे मेरे लिए सोने का हार लाने वाले थे, उस का क्या होगा?’’ यह स्वर मेरी धर्म की पत्नी का था, उस की आवाज में दुख कम, हार न पाने का दर्द अधिक था. मेरी सास ने उसे आंखों ही आंखों में चुप रहने के लिए कहा. पत्नी वहीं सोफे पर धम्म से बैठ गई. मुंह और आंखों पर पल्ला रख कर दुख प्रकट करने का अभिनय करने लगी.

मैं ने विस्तार से सासूजी को बताया कि आज कुल जमा 20 हजार रुपए की राशि दे कर हमें घर भेज दिया गया. वैसे भी हमारी नौकरी संविदा की थी. वैश्वीकरण के चलते हमारी कोई यूनियन भी नहीं है. इसलिए हम तो कौंट्रैक्ट बेस मजदूर श्रेणी में थे.

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