कई दिनों से बड़े बाबू का चेहरा लटकालटका देख रहा था. नीम के पेड़ पर सूखी, लटकी, सड़ीगली लौकी जैसा. पर उन से इस बारे में कुछ पूछने का दुसाहस मुझ में न हो सका. औफिस में भी सहमेसहमे से रहते. सोचा, होगी घरबाहर की कोई प्रौब्लम. राजा हो या रंक, घरबाहर की प्रौब्लम आज किस की नहीं? घरबाहर की प्रौब्लम तो आज सासबहू की तरह घरघर की कहानी है. जो जितना बड़ा, उस के घरबाहर की प्रौब्लम उतनी बड़ी. हमारे जैसों के घर की प्रौब्लम हमारे जैसी. यहां मोदी से ले कर मौजी तक, सब अपनेअपने घर की प्रौब्लम से परेशान हैं. और कोई प्रौब्लम न होना भी अपनेआप में एक प्रौब्लम है.

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